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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 689

साखी । (६५३)
सब लोग या कहै हैं तुम्हारी गति तुम्हीं जानो हममें सामर्थ्य नहीं है जौन
हमको गुरु बताय दियो है ताही मे लगें हैं : तिनको कबीरजी कहैं हैं कि इन
सबकी भूल ईश्वर तो बताबै न आवेंगे औ जीवका तो आपने साहबको जानबै
चाही नाहक संशयमें परे हैं साहबको जानैं तौ साहब छुड़ाइ लैइँगे ॥ ३५६ ॥
खालीदेखिकै भरमभा, ढूंढ़ताफिरै चहुँ देश ॥
ढूंढ़त ढूंढ़तमरगया, मिला न निर्गुणभेश ॥ ३५७ ॥
जौने संशयमें सब बूड़िगये हैं सो संशय कबीरजी देखावै हैं खाली कहें
शून्य देखिकै सब जीवन को भरम भयो सो देवता परोक्षहै वाको अर्थ जानै
नहीं हैं औ चारों देशमें ढूंढत फिरै हैं औ केते वा निर्गुण धोखाब्रह्म को ढूंढ़त
ढढ़त मरि गये खोज न लाग्यो ॥ ३५७ ॥
बूझ आपनी थिररहै, योगी अमर सो होइ ॥
अब बूझै भरमै तजै, आपै और न कोइ ॥ ३५८ ॥
देखादेखी सबजग भरमा, मिला न सतगुरु कोइ ॥
कहै कबीर करत नितसंशय, जियरा डाराखोइ॥३५९॥
गुरुवा लोग कहैं हैं कि जो बूझ थिर रहै तौ योगी अमर है जाय जोजग-
त्के नाना भ्रमछोड़िकै अबहूं बूझै तौ एक आपही है दूसरानहीं है मारैगा कौन
ऐसे कहि कहि देखादेखी श्रीकबीरजी कहैं हैं कि सबजगत् भरमि गयो सतगुरु-
कहे साहबके जाननवारे इनको कोई न मिलो हमहीं ब्रह्महैं यही संशय में डा-
रिकै आपने जीवन को खोइ डारे अर्थात् नरकमें डारिदिन्हे ॥ ३५८॥३५९॥
ह्रांकी आश लगाया, झूठी ह्रांकी आश ॥
गृहताजि वनखंड मानिया, युगयुग फिरै निराश॥३६०॥
वा ब्रह्म जो धोखा ताकीआश लगाये है सो आश तेरी झूठी है गृहत्या-
गिकै जाके हेत तुम बनखण्डमें टिकेहु सो युग युग निराश फिरौगे अर्थात्
ठिकान न लगैगो वह मिथ्याहै बिना साहबके जाने संसारते न छूटैगो ॥३६०॥
नेइके बिचले सबघर बिचला, अब कछु नाहिं बसाइ॥
कहैकबीरजोअबकीसमुझे, ताकोकालनखाइ ॥३६१॥