कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 687, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाखी । (६५१)
धोखाही तें सम्पूर्ण जगत् व्यतीत होगया और धोखाही ते सिराय गया औ
यह मन अपनी स्थिति नहीं पकरै है स्थिर नहीं होयहै सो अपनी भूल कासों
कहै यादुःख काहूसों नहीं कह्यो ॥ ३४८ ॥
मायाते मन ऊपजै, मनते दश अवतार ॥
ब्रह्माँविष्णु धोखेगये, भरमपरा संसार ॥ ३४९ ॥
साहब औ साहबकें पास पहुँचेहैं जे तिनको छोड़ै और सब मनके फन्दमें
परे हैं और अर्थ स्पष्टही है ॥ ३४९ ॥
रामकहतजगबीते सिगरे, कोई भये न राम ॥
कहकबीर जिनरामाहिं जाना, तिनके भे सबकाम३५०
हमहीं रामहैं हमही रामहैं या कहत कहत सब सब जग बीतिगये कहैं
मरिगये परन्तु कोई राम न भये औ कबीरजी कहैहैं कि जिन श्रीरामचन्द्रकों
मालिक जान्यो है तिनके सब काम ह्वैगये हैं ॥ ३५० ॥
यहदुनिया भै बावरी, अदृश्यसों बाँध्यो नेह ॥
दृश्यमानको छोड़िकै, सेवै पुरुष विदेह ॥ ३५१ ॥
यह दुनिया बावरी है गई अदृश्य जो निराकार ब्रह्म तासों नेहबाँध्यो है सो
वातो धोखाहै काको मिलै जीव ब्रह्म होतही नहीं है सो दृश्यमान जे साहब
श्रीरामचन्द्रहैं तिनको छोड़िकै वा बिदेह पुरुष निराकार ब्रह्मको सेवै है अर्थात्
वाहीमें लागैहै ॥ ३५१ ॥
राजा रैयत ह्वैरहा, रैयत लीन्हीं राज ॥
रैयतचाहै सवालिया, ताते भया अकाज ॥ ३५२ ॥
राजा जो साहब है सो रैयत है रहा है अर्थात् वाको कोई जानतही नहीं
है औ रैयत जो धोखाब्रह्म सो सब लेत भयो अर्थात् सब जगत् वाही में लग-
त भयो सो रैयत जो है अहम्ब्रह्मास्मि सो साहबको सब लियो चाहै है अर्थात्
आपै ब्रह्म होन चाहै है ताते अकाज भयो माया के बश है आपनेनको
मालिक मानन लग्यो ॥ ३५२ ॥