कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 696, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६६२ ) बघेलवंशवर्णन ।
तहां जाय तुम प्रकट होउ यह रघुवर आयसु पाई ॥
प्रगटि वोडैसा जगपतिकेरो दरशन लीन्ह्यों जाई ॥ १ ॥
सागर तीर गाड़ि कुबरी पुनि बाँधि तासु मर्यांदा ॥
पुनि परबोधि सिंधुको बहु विधि गमन्यों युत अह्नादा ॥
चलत चलत गुजरात आयकै नगर विलोक्यो जाई ॥
जहां सुलंक भूप बहु साधुन राखे रहो टिकाई ॥ २ ॥
भक्तिवान अति रही रानि अति नित सब साधुन केरो ।
दर्शन करिलै तिन चरणामृत निज घर करै बसेरो ॥
ते साधुनको दर्शन करिकै एक वृक्षतर जाई ॥
वसि आसन बिछायकै बैठ्यो हरिको ध्यान लगाई॥३॥
यक दिन रानी सब साधुनको भोजन हित बोलवाई ॥
पंगति दिय बैठाय गयो मैं नहिं तहँवां हरषाई ॥
रानी तब मेरे आश्रममें आवतभै अतुराई ॥
महि तजि अंतरिक्ष आसन मम निरखि परम सुख पाई४
विनती किय प्रभु आपहु चलिकै मम घर भोजन कीजै ॥
मैं तब कह नहिं भूख प्यास मोहि हरि अधार गनि लीजै।
रानी कह यकतो सुत बिन मैं दुखित राज्य सब सूनी ॥
दूजे जो न आप पगुधारे तपी ताप तो दूनी ॥ ५ ॥
मैं कह सोच करै नहिं राजा द्वै सुत हैंहैं तेरे ॥
संतनको चरणामृत अबहीं लैआवे ढिग मेरे ॥
साधुन चरण धोय चरणोदक लैआई जब रानी ॥
दियो पियाय रानिको तब मैं निज चरणोदक सानी॥६॥
लहि मेरो वर साधुनकेरो बहु विधि करि सतकारा ॥
परम प्रमोद पायउर रानी गमनत भई अगारा ॥
कह्यो हवाल भूपसों सो सब सुनि नृप अति सुखपाई ।
लै फल फूल द्रव्य बहु सादर मम समीप द्रुत आई॥७॥