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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( ६४२ ) बीजक कबीरदास ।
सो ऐसे संसाररूपी बिटपकी बलिहारी है जामें जरकाटे फलहोइ है अर्थात जौने
जीवको संसार निर्मूल ह्वैगयो तौने जीवको साहब रूपी फल मिलै है ॥३२७॥
सरहर पेड़ अगाध फल, अरु बैठा है पूर ॥
बहुत लाल पचि पाचि मरे, फल मीठा पै दूर ॥३२८॥
या शरीर रूपी सरहर वृक्ष बड़ा ऊँचाहै सरलहूहै सबको मिलै है और
शरीर वृक्षको फल कहा है साहबको जानै सरअगाध है औ सर्वत्र पूर्ण है
अन्तर्यामी रूपते सबके हियेमें बैठाहै सो ऐसो साहबको ज्ञानरूपी फल मीठाहै
परन्तु दूरि है बहुत लाल कहे बहुत जे जीव हैं ते पचिपचि मरे पै पाये नहीं
अथवा साहबको ज्ञानरूपी फल सरहरहै कहे चीकनहै चढ़ने माफिक नहीं है
खसिलि परै है तामे प्रमाण कबीरजी को ॥
बहुतकलोगचढ़े बिनभेदा देखाशिख गहिपानी ।
खसिलां पाउं ऊर्ध्वमुख झूले परेनरककीखानी ॥
औशरीरकोफल साहबको भजनहै तामें प्रमाण गोसांईजीको ।
देहधरेको या फलभाई, भजोराम सबकाम बिहाई ॥ ३२८ ॥
बैठ रहे सो बानियाँ, खड़ा रहे सो ग्वाल ॥
जागत रहे सो पाहरू, तिनहुंन खायो काल॥३२९॥
बनियां बैठ रहे हैं दुकान लगाय ते गुरुवालोगहैं जे जौने देवताको मन्त्र मांगै
हैं ताको तौनहीं मन्त्र देइहैं औ ग्वालखड़े गौवनको चरावैं हैं तेवे हैं जे आत्मैको
मालिक मानै हैं इन्द्रिनको चरावैं हैं जौने विषय चाहै हैं तौने भोगैं हैं दूसरो
लोक नहीं मानै हैं शरीरहीको मानै हैं औ जे जागत रहे हैं ते पाहरू हैं अपनी
बस्तु ताकै हैं ते योगी हैं आपनी इन्द्रीको ताके रहे हैं समाधि लगाये सदा जाग-
तरहैं सोये तीनों साहबको न जान्यो ताते तिनहुंनको काल धरिखायो॥३२९॥
युवा जरा बालापन बीतयो, चौथि अवस्था आई ॥
जस मूसवाको तकै बिलैया, तस यम घात लगाई॥३३०॥
तीनिउं अवस्था बीत गईं चौथि अवस्था आय गई जैसे मूसको बिलारी ताकें
है ताको घात लगायेहै तैसे यम तोको घातलगाये हैं सो अजहूं साहबको चेतु ३३०

साखी । ( ६४३ )
भूलासो भूला बहुरिकै चेतु ॥
शब्दकी छुरी संशयको रेतु ॥ ३३१ ॥
गुरुमुख ।
साहब कहै हैं कि हे जीव ! तैं भूला सो भूला भला यह संसार ते बहुरि कहै
उलटिकै तौ चेत करौ सारशब्द जो रामनाम छुरी तेहितैं अपनी संशय रेत
डारु कहे काटिडारु अर्थात् रामनामको अर्थ तो विचारु तैं मेरोई है और पदार्थ
छोड़िदे तामेप्रमाण॥ “यक रामनाम जाने बिना भव बूड़िमुवा संसार” ॥३३१॥
सबही तरुतर जायकै, सबफल लीन्हो चीखि ॥
फिरिफिरि मांगत कबिरहै, दर्शनहींकी भीखि ॥३३२॥
सबही तरुतर जायकै कहे शरीर धारण करिकै सुख दुःखरूप फल सब
चाख्यो नाना उपासना योगज्ञान बैराग्य सब कैचुक्यो शरीरधरेको फल कोई
न पायो सो शरीर धरे को फल साहब को दर्शन है सो फिर फिर कबीर
मांगै है ॥ ३३२ ॥
श्रोता तो घरही नहीं, वक्ता वदै सो वाद ॥
श्रोता वक्ता एकघर, तब कथनीको स्वाद ॥ ३३३ ॥
श्रोतातो घरहीमें नहीं है अर्थात् सुनतै नहीं है औवक्ता आपनो मत बादि-
बादिबदै है श्रोताको समुझावै है सो जब श्रोतावक्ता एक घरहोइ कहेएकै उपा-
सनाहोइ एकै मतहोय तब कथनीको स्वाद है कहे कथाको स्वादत-
बहीं मिलै है जैसे याज्ञवल्क्य भरद्वाज इत्यादिक तामें प्रमाण ॥ “इष्ट मिलै
अरु मन मिलै, मिलै भजन रस रीति । तुलसिदास सोइ संतसों, हठ करि
कीजै प्रीति” १॥ दूसरो प्रमाण राम सखेजीको॥ “शिष्य सांच गुरु सांचहै,झूठन
जियत न मान॥बध्यो शिष्य साची प्रकृति, छोरत गुरुदै ज्ञान”॥२॥औ कबीर-
हूजीको प्रमाण। साखी चौरासी अंगकी। “नाम सत्य गुरु सत्यहै,आप सत्य जब
होइ ॥ तीन सत्य प्रकटैं जबै, गुरुका अमृत होइ” ॥ ३३३ ॥

( ६४४ ) बीजक कबीरदास ।
कंचन भो पारस परसि, बहुरि न लोहा होइ ॥
चंदन बास पलास विधि, ढाक कहै नहिं कोई॥३३४॥
पारसको परसिकै कंचनभयो जो लोह है सो फिरि लोहा नहीं होइहै औ
चंदनकें बासते पलाश जो छिउल है सो बेधिगयो ताको ढाक कोई नहीं कहै है
चंदनै कहै है ऐसे जोंजीव साहबकों ह्वैगयो साहब के पासगयो ताको जीव
नहीं कहै है पार्षद रूप कहन लगै है ॥ ३३४ ॥
बेचूनै जग राचिया, सांई नूर निनार ॥
तब आखिरके बखतमें, किसका करौ दिदार ॥३३५॥
बेचून निराकार जौन जगत्को रचिसि है सो सांई के नूरतें कहै प्रकाशते
निनारहै जुदा है अर्थात् साहबकों प्रकाश न होइ वा नूरही अल्लाह है ऐसा
जो मानो तो हे मुस्लमानौ मैं पूछता हौं कि आखिरके बखतमें कहै क्याम-
तिके बखतमें वह इनसाफ करैगा ऐसा कुरानमें लिखता है सो उसको बेचून
मानते हौ निराकार मानते हौ तौ भला वा किसतरहसे इनसाफ करैगा औ
किसका दीदार करौगे अर्थात् किसकी सूरति देखौगे भावयहै कि वा निराकार
नहीं है साकार है तुमको भ्रम भया है सो या बात सत्ताईस रमैनीके मूलमें
ह साहबको नूरजो है प्रकाश सो सबके भीतर बाहर भराहै कोई जगह उससे
खाली नहीं है औ साहब औ साहबकी सामग्री औ साहबको लोक सब नूरही-
नूर कहै वहां बहुतसा नूर समिटिकै एकसल देखि परै है जिसतरहकी मिसाल
कि जैसा साहबहै तैसासाहबै है दृष्टांतकाकोदेइ सो कबीरजी पूछै हैं कि भला
तुमहूँ तो विचारिदेखो कि जो उसके हाथै पांड न होते तौ जगत्को कैसे रचतो
सो साहबसाकार है तुमको निराकारकी भ्रमभई है तामें प्रमाण ।
कलिमा बाँग निमाज् गुजारै । भरम भई अल्लाह पुकारै ॥
अजब भरम यक भई तमासा । ला मकान बेचून निवासा ।
बे नमून् वै सबके पारा । आखिर काको करौ दिदारा ॥
रगरै महजिद नाक अचेता । भरमाने बुत पूजां होता ।
बावनतीसबरण निरमाना । हिन्दू तुरुक दोउ परमाना ॥

साखी । ( ६४६ )
भरमिरहें सब बरणमहँ, हिन्दुतुरुक बखान ।
कहै कबीर बिचारिकै, बिनगुरूकी पहिंचान ॥
भरमत भरमत सब भरमाना, रामसनेही बिरला जाना ॥ ३३५ ॥
सांई नूरदिल एकहै, सोई नूर पहिंचानि ॥
जाके करते जगभया, सो बेचून क्यों जानि ॥३३६ ॥
सांई जो है साहब श्रीरामचन्द्र ताहिको एक नूर सबके दिलमें है सोई
नूर तैं मकाश पहिंचानु जौनेके करते जग सब उत्पन्न भया है ऐसो जो साहब
ताको तू बेचून कहे निराकार न जान वे साहब साकारहैं औनिर्गुणसगुणके-
परे हैं । तामें प्रमाण कबीरजीको साक्षी ॥
श्रूप अखण्डित ब्यापी चैतन्य शैतन्य ।
ऊंचे नीचे आगे पीछे दाहिन बायँ अनन्य ॥
बड़ा ते बड़ा छोटते छोटा मीहीते सब लेखा ।
सबके मध्य निरन्तर सांई दृष्टि दृष्टि सों देखा ।
चाम चश्मसों नजरिन आवै खोजु रूहकें नैना ॥
चून चगून बजूद न मानु तैं सुभा नमूना ऐना ।
ऐना जैसे सब दरशावै जो कछु वेष बनावै ।
ज्यों अनुमान करै साहबको त्यों साहब दरशावै ॥
जाहि रूह अल्लाहके भीतर तेहि भीतरके ठांई ।
रूप अरूप हमारि आश है हम दूनहुंके सांई ॥
जो कोउ रूह अपनी देखै सो साहबकों पेखा ।
कहें कबीर स्वरूप हमारा साहबको दिल देखा ॥ ३३६ ॥
रेख रूप जेहि है नहीं, अधर धरो नहिं देह ॥
गगन मँडलके मध्यमें, रहता पुरुष बिदेह ॥ ३३७ ॥
कैसो साहब है कि जाके रूप रेखा नहीं है औ बिशेषिकै देह धारण कीन्हे
है अर्थात् रसहीरस देह धारण किये है पाञ्चभौतिक नहीं है । औ अधर जौं
आकाश तामें देह कबहूं नहीं धरै अर्थात् जो कबहूं न रहै तब न देह धारै

( ६४६ ) बीजक कबीरदास ।
वातों सर्वत्र पूर्ण है गगनमण्डल के मध्यमें कहें तीन आकाश हैं एक नीचे
एक मध्यमें एक ऊपर सो तीनों आकाशमें वा विदेह पुरुष पूर्ण है ॥ ३३७॥
धरचो ध्यान वा पुरुषको, लाये बज्र केवाल ॥
देखिकै प्रतिमा अपनी, तीनों भये निहाल ॥३३८॥
वह परम पुरुष साहब जे श्रीरामचन्द्र हैं,नव दूर्बा दल जिनको रसरूप शरीर
है तिनको ध्यान धरो जो कहो आनन्द को रूप तो सफेदको है है नव दूर्बादल
श्याम कैसे कहौ है तो जहां बहुत श्वेताई है तहां हरित रंग देखही परै है जो
कहो यह कैसे अनुभव होइ तो सुनौ सब ते श्वेत स्वच्छ गंगाको जल है सौ
जहां गंगाहूमें बहुत जल है बड़ी गहिराई है तहां हरितई देखि परै है । जौं
कहो साहबको कैसे जानैं सो वज्र कपाट लगाइबेकी बिधि आगे लिखि आयें
हैं जलन्धर बन्ध लगायकै झटकादैकै वज्र कपाट लगायो सुरति कमलमें जों
रकारको उद्गार ओङ्कारै है सो सुनि परी है तब वही रकार को जो ध्यान करै
तब सो ध्यान किये साहब आपही प्रकट होय है । यही ध्यान करिकै तीनों
ब्रह्मा विष्णु महेश अपनी अपनी प्रतिमा देखिकै निहाल भये हैं अर्थात् साह-
बके समीप हजारन ब्रह्मा विष्णु महेश देखिकै या निहाल भये कि धन्य
हमारी भाग्य है कि श्रीरामचन्द्रके द्वारमें हमहूं हैं यहां तो कोटिन ब्रह्मांडकें
ब्रह्मा विष्णु महादेव मोजूद हैं ठाढ़े स्तुति करै हैं ॥ ३३८ ॥
यह मनतो शीतल भया, जब उपजा ब्रह्म ज्ञात ॥
जेहि बैसन्दर जग जरै, सो पुनि उदक समान॥३३९॥
जब ब्रह्मज्ञान भयो तब यह मन शीतल ह्वैगयो अर्थात् संकल्प विकल्प
छोड़ि दियो तपिवो मिटि गयो सो जौने बैसन्दरते कहे ब्रह्म ज्ञानते मनकों
संकल्प विकल्प छूटि गयो जग जरि गयों अर्थात् न रह्यो तौन जो ब्रह्म ज्ञान
सों उदक जो साहबकी प्रेमा भक्ति तामें समान अर्थात् जब साहबकी भक्ति
भई तब वा ब्रह्माभि न रहि गई यामें ते या आयो कि ज्ञानको फल साहबकी
भक्ति है तामें प्रमाण ॥ “ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ॥ समः

साखी । ( ६४७ )
सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिंलभते पराम् ॥ १ ॥ भक्तिमेंछागुण हैं ॥ " क्लेशघ्नी
शुभदामोक्षलघुताकृत्सु दुर्लभा । सांद्रानन्दविशेषात्मा श्रीकृष्णakarshani मता" ॥
भक्तिमें छे गुण हैं । १। एक तो सम्पूर्ण क्लेशको दूर कर देइ है । अर्थात् संसार
दूर करि देइ है । फिर भक्ति कैसी है २ कि शुभदा है कहै सम्पूर्ण शुभ गुण
दिव्य गुण देइ है । और ३ अपने आनन्द ते मोक्षके सुखको लघु करि देई है।
और ४ दुर्लभा है अर्थात् जब ब्रह्म ह्वैगयेह्र के ऊपर होइ है। और सान्द्रानन्द
विशेष आत्मा है कहै परमानन्द रूपा है और श्रीकृष्ण को आकर्षण करिलै
आवै है कहै जाकी भक्ति होइ है तो श्रीरघुनाथजीको दर्शन होई है । सो श्री-
कबीरजी भक्ति को सिद्धान्त राख्यो है कि, बिना भक्ति रघुनाथजी कोई प्रकार
से मिलि सकते नहीं हैं और जहां भक्त पहुंचे है तहां दूसरो पहुंचि सकै नहीं
है । सब ते ऊंची भक्तिकी सीढ़ी है । बिना भक्ति साहब नहीं मिलैं तामें
प्रमाण श्रीकबीरजीको भवतरण ग्रन्थको ॥ " सुनु धर्मदास भक्ति पद ऊंचा ।
तिन सीढ़ी नहिंकोउ पहुंचा ॥ वर्त एक है भक्तिको पूरा । और वर्त सब
कीजै दूरा ॥ और वर्त सब जमकी फाँसी । भक्तिहि वर्त मिलैं अविनासी ३३९
जासों नाता आदिको, बिसरि गयो सब ठौर ॥
चौरासीके वश परे, कहत औरको और ॥ ३४० ॥
जौनै साहबको आदिको नातारहै कहै जाको सदाको दास अंश तौने राम
चन्द्रको भक्ति बिसरी गयो मायामें परि चौरासी लाख योनिके वश ह्वै और
को और कहै हैं अर्थात् कहूं कहै हैं कि वा ब्रह्म मैंहीं हौं कहूं आत्मैकों
मालिक मानै हैं कहूं नाना देवतन को स्वामी मानै हैं परंतु संसार काहूकों
छुड़ायो न छूट्यो ॥ ३४० ॥
१ अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश यही पाँच क्लेश हैं अनित्य पदार्थोंमें
नित्य बुद्धि अनात्म पदार्थोंमें आत्म बुद्धिका नाम अविद्या है तात्पर्य यह कि अज्ञान
जन्य जो २ कार्य हैं सब अविद्या कृत है । मैं राजा, मैं पण्डित मैं ज्ञानी मैं कुलीन
इत्यादि अहङ्कार युक्त कार्यको अस्मिता कहते प्रिय वस्तुमें प्रीति होना राग ।
और अनिष्ट पदार्थमें अप्रीतिका होना द्वेष । एवं बिना विचारे किसी कार्यको एक
प्रकारका मान कर उस में आग्रह बुद्धिको अभिनिवेश कहते हैं ।

( ६४८ ) बीजक कबीरदास ।
लीन्ह्यो फंटकि पछोरि यह साखी भर सब पोथिनको पाठ मिलि आवा है
औ लोहे चुंबक प्रीति जस यह साखीते चौरासीके वश यह साखी भी उन्तिस
साखी एक पोथीके क्रमते है आवा अब एक पोथीमें अट्ठाइस साखी औरई
और हैं तिनहूंनको अर्थ लिखैं हैं ॥
बूझौ शब्द कहांतै आया, कहां शब्द ठहराय ॥
कह कबीर हम शब्द सनेही, दीन्हा अलख लखाय ३४१
यह शब्द जो रामनाम है सो बूझौ कहे बिचारौ कहांतै आयाहै औ कहा
ठहरायहै सोहम वही शब्दके सनेही हैं वाशब्द तुम नहीं बूझते हौ कैसो है
शब्द कि साहब के इहां ते आयो है ॥ रामनामलै उचरीवाणी ॥ यह रमैनीमें
लिखि आये हैं सो जब कुछ नहीं रह्यो तब रामनामहीतें सबकी उत्पत्ति भई है
सो राम नाम मंत्रार्थ जो मैं बनायो है तामें बिस्तारते लिखि दियो है । इहां संक्षे-
पते जनाये देउँहौं “अ इ उ ण् ऋ ल् क् ए ओ ङ् ऐ औ च् हयवरट् लण् ञ मङण-
नम् झभञ् घढधष् जबगडदश् खफछठथ चटतव् कपय् शषसर् हल् ये ॥ सबबर्ण
चौदह सूत्रमें पाणिनि लिखिदियो॥आदिरन्त्येन सहता। अन्त्येने ता सहित आदि
र्मध्यगानां स्वस्यच संज्ञास्यात्” यहि सूत्र करिकै अकार आदिकालीन औलकार
अंतकालीन तब अल् प्रत्याहारकीन तेहितें बीच के वरण सब आयगये। सो अल्
प्रत्याहार रामनामको एकदेश ते निकसै है सो रामनामके रकारको बर्ण विपर्यय
कियो तब अकारको यह कैतिलै औ रकारको वह कैतिलै गये तब अर् भयो
सो रकार लकारको अभेदहै तेहिते अल्भयो तेहिते राम नामके एक देश ते सब
निकसि आये तेहिते सबको आदि राम नाम है । सो राम नामको अर्थ
साहिबैके ठहरायहै, अर्थात् राम नाम साहबही को बतावै है । सो श्री कबी-
रजी कहै हैं कि, हम वही शब्दके सनेही हैं । कैसो है शब्द कि, अलखहै
वा सबको लखावै है वाको कोई नहीं लखै है जैसे आंखीते सबको देखै औ
आंखी अपनी कोई नहीं देखै है । जो कहो कबीर कैसे कहै हैं कि हम अल-
खको लखायदियो तौ सुनो जैसे ऐना लैके देखै तौ अपनी आंखीको प्रतिबिंब
देखि परै है सो यह बीजकरूप ऐनाहै तामें अनिर्वचनीय जो राम नाम ताको

साखी । ( ६४९ )
मतिबिंब बीजकमें दिखायो अर्थात् यह बतायदियो कि, रामनामहीते जगत
मुख अर्थ में सबकी उत्पत्ति भई है । औ रामनामही साहबको बतावै है
साहब मुख अर्थमें । औ अनिर्वचनीय साहबको रामनामही देखाय देइहै यह
भी कबीरजी अलखके देखिबेको उपाय बताय दियो यही अलखको लखावनो
है सो जब साहब को ह्वैजाय तब या लखै तामें प्रमाण सुखसागरको ॥ “अ-
लख अपार लखै केहि भांती । अलखलखै अलखैकी जाती ॥ ३४१ ॥
बूझौ करता आपना, मानौ बचन हमार ॥
पंचतत्त्वके भीतरै, जिसका यह बिस्तार ॥ ३४२ ॥
तुम कहांते आये औ तुमको को कियों सो अपने कर्त्ताको तुम बूझौ वह
साखी में तो बचन हम कहि आये ताको तुम मानौ तुम वह शब्द रामनामही
ते भये हौ जिसका यह बिस्तार सब देखतेहौ औ जौन जौन मानिदी तुम
मानिराखेहौ सो सब पंचतत्त्वकेभीतरहै एकवह रामनामही पंचतत्त्वके बाहिर है
औ वही तुम्हारो आदि कर्त्ता है ॥ ३४२ ॥
हमकर्त्ताहैं सकल सृष्टिकै, हम पर दूसर नाहि ॥
कहै कबीर हमैं नहिं चीन्है,सकल समानाताहि ॥३४३॥
हमहीं सम्पूर्ण सृष्टिके कर्त्ता हैं हम मालिक दूसर नहीं है हमहीं सबकें
मालिकहैं सबमेरेहीं में समानेहैं हमहीं ब्रह्महैं ऐसा कोई कोई कबीर कायाके
बीरजीव कहै हैं ताको आपै खंडन करै हैं ॥ ३४३ ॥
सुतनहिं मानै बातपिताकी, सेवै पुरुष बिदेह ॥
कहै कबीर अबहुँ किन चेतौ, छांड़ो झूठ सनेह ॥३४४॥
तैं सुतहै रामनाम प्रतिपाद्य जे साहबहैं ते तेरे पिताहैं तिन की बात तैं
नहीं मानै है औ बिदेह पुरुष जो है ब्रह्म ताको सेवै है कहे आपही ब्रह्म ह्वै
बैठै है सो अबहूं चेतकरु साहब कहि आये हैं कि॥ "अजहूं लेहुँ छड़ाय कालसों जो घट

.( ६५० ) बीजक कबीरदास ।
सुरातिसंभारै"॥ सो ऐसे पिताकी बातमानु यह झूठसनेह छोड़िदे जो अपने को ब्रह्म
मानिकै बैठे हैं कि महीं ब्रह्महौं यह ब्रह्मतौ मनको अनुभवहै झूठा है जीव ब्रह्म
कबहूं नहीं होयहै ॥ ३४४ ॥
सबै आशकरशून्यनगरकी, जहां न कर्त्ता कोई ॥
कह कबीर बूझौ जियअपने, जातेभरम न होई॥३४५॥
सबै वह शून्यनगरकी आशाकरै हैं जहां कोई कर्त्ता नहीं है सो वह तौं
झूठाहै सो कबीरजी कहै हैं कि तुम अपने मनमें बूझौ तौ उहांतौ कर्त्ता हई
नहीं है औ जगत् बनैहै तौ कौन जगत को कियो है तेहिते निराकार अकर्त्ता
ब्रह्म कहनूति जो कहो है सो सब झूठी है सो यह तुम अपने जियमें बूझौ
जेहिते ब्रह्मवालो भ्रम तुमको न होइ ॥ ३४५ ॥
भक्तिभक्ति सबकोई कहै, भक्ति न आई काज ॥
जहँको किया भरोसवा, तँहते आई गाज ॥ ३४६ ॥
भक्तिभक्ति सबकोई कहै हैं और और देवनकी भक्ति करै हैं सो वा भक्ति
कौनौ काज न आई जेहि जेहि देवंको भरोसा कियो तहांत गाजआई कहे वें
सब काल स्वरूपहैं सब याको मारिकै अपने लोक लैगये जब महाप्रलय भई
तब इष्ट औ उपासक दोऊ न रहे पुनि जब जगत्की उत्पत्ति भई तब कर्मा-
नुसार वोऊ उत्पन्न भये ॥ ३४६ ॥
समुझौ भाई ज्ञानियो , काहु न कहा सँदेश ॥
जेइ गये बहुरे नहीं, है वह कैसा देश ॥ ३४७ ॥
हे भाई ज्ञानिउ तुम समुझते जाउ तौन तुम ब्रह्म ब्रह्मकहौ हौ तहां कों
संदेश कोई न कह्यो कहे सब वेदांती ब्रह्मज्ञानी कहैं हैं कि वाको तो हमकही
नहीं सकैहैं धोकेसाहै औ जे उहां गये ते बहुरिकै न आये जो वहां को सन्देश
बतावैं अर्थात् कुछ न हाथ लग्यो ॥ ३४७ ॥
धोखे सबजग बीतिया, धोखे गई सिराइ ॥
स्थितिनाकरै सो अपनी, यहदुख कहा न जाइ३४८॥

साखी । (६५१)
धोखाही तें सम्पूर्ण जगत् व्यतीत होगया और धोखाही ते सिराय गया औ
यह मन अपनी स्थिति नहीं पकरै है स्थिर नहीं होयहै सो अपनी भूल कासों
कहै यादुःख काहूसों नहीं कह्यो ॥ ३४८ ॥
मायाते मन ऊपजै, मनते दश अवतार ॥
ब्रह्माँविष्णु धोखेगये, भरमपरा संसार ॥ ३४९ ॥
साहब औ साहबकें पास पहुँचेहैं जे तिनको छोड़ै और सब मनके फन्दमें
परे हैं और अर्थ स्पष्टही है ॥ ३४९ ॥
रामकहतजगबीते सिगरे, कोई भये न राम ॥
कहकबीर जिनरामाहिं जाना, तिनके भे सबकाम३५०
हमहीं रामहैं हमही रामहैं या कहत कहत सब सब जग बीतिगये कहैं
मरिगये परन्तु कोई राम न भये औ कबीरजी कहैहैं कि जिन श्रीरामचन्द्रकों
मालिक जान्यो है तिनके सब काम ह्वैगये हैं ॥ ३५० ॥
यहदुनिया भै बावरी, अदृश्यसों बाँध्यो नेह ॥
दृश्यमानको छोड़िकै, सेवै पुरुष विदेह ॥ ३५१ ॥
यह दुनिया बावरी है गई अदृश्य जो निराकार ब्रह्म तासों नेहबाँध्यो है सो
वातो धोखाहै काको मिलै जीव ब्रह्म होतही नहीं है सो दृश्यमान जे साहब
श्रीरामचन्द्रहैं तिनको छोड़िकै वा बिदेह पुरुष निराकार ब्रह्मको सेवै है अर्थात्
वाहीमें लागैहै ॥ ३५१ ॥
राजा रैयत ह्वैरहा, रैयत लीन्हीं राज ॥
रैयतचाहै सवालिया, ताते भया अकाज ॥ ३५२ ॥
राजा जो साहब है सो रैयत है रहा है अर्थात् वाको कोई जानतही नहीं
है औ रैयत जो धोखाब्रह्म सो सब लेत भयो अर्थात् सब जगत् वाही में लग-
त भयो सो रैयत जो है अहम्ब्रह्मास्मि सो साहबको सब लियो चाहै है अर्थात्
आपै ब्रह्म होन चाहै है ताते अकाज भयो माया के बश है आपनेनको
मालिक मानन लग्यो ॥ ३५२ ॥

( ६६२ ) बीजक कबीरदास ।
जिसका मंत्रजपैं सब सिखिकै, तिसके हाथ न पाउं ॥
कहै कबीर मातुसुतकाही, दिया निरंजन नाउं॥३५३॥
जिसका मन्त्र सब सिखिकै जपै हैं प्रणव उसका अर्थ ब्रह्मही है जिसके
हाथ पांउ नहीं हैं औ निरञ्जन जो है ब्रह्म ताको निरञ्जननाम मायैको धरायो
है माया वा निरञ्जन ब्रह्मकी माता है काहेते कि या निरञ्जन नाम बचन में
आवै है बिज्ञान करिकै अनुभव जो ब्रह्म होईहै सो मनका अनुभवहै मायै-
को पुत्रहै वह माया मनमें मिलि इच्छारूपहै सो जाको तुम ब्रह्म कहौहौ सोई
माया ते रहित नहीं है तुम कैसे अहम्ब्रह्म मानि माया ते रहित होउगे तामें
प्रमाण कबीरजीके शब्दको ॥ “मनपरपञ्ची मनैनिरञ्जन मनही है ओङ्कारा ।
तीनलोक मनफांसिलियाहै कोई न मनते न्यारा ॥ ३५३ ॥
जनि भूलौरे ब्रह्मज्ञानी, लोकवेदके साथ ॥
कहकबीर यह बूझहमारी, सो दीपकालियेहाथ ३५४॥
कबीरजी कहै हैं कि रे ब्रह्मज्ञानी तुम जनि भूलौ लोक वेदके साथ लोकमें
सरहना पायकै वेद में धोखाब्रह्ममें लगिकै अर्थात् तुम यामें न खराब होउ । सों
कह कबीर यह बूझ हमारी कहे कायाके बीर जीवौ परमपुरुष जे साहब श्रीरा-
मचन्द्र तिनमें तन मन ते लागो जो हमारी बूझहै सोई साहबके अनुराग रूप
दीपकहाथमें लेउ जाते संसाररूप अन्धकारते पारहोउ ॥ ३५४ ॥
देव न देखा सेवकाहि, सेवक देवनदीख ॥
कहकबीर इन मरते देखो, यह गुरु देई सीख॥३५५॥
देवता आपने सेवकको सेवक आपने इष्ट देवताको न दीख तिनको कबी-
रजी कहै हैं कि हम दूनों को मरते देखा है अर्थात् महाप्रलय में नहीं रहैं ताते
हम गुरुकी सीख इनको देते हैं कि धोखा औ नाना मतको त्यागि साहब कों
जानो जाते जनन मरण छूटै या सीख देते हैं ॥ ३५५ ॥
तेरीगति तैं जानै देवा, हममें समरथ नाहीं ॥
कहकबीर यहभूल सबनकी, सबपरे संशय माहीं॥३५६॥

साखी । (६५३)
सब लोग या कहै हैं तुम्हारी गति तुम्हीं जानो हममें सामर्थ्य नहीं है जौन
हमको गुरु बताय दियो है ताही मे लगें हैं : तिनको कबीरजी कहैं हैं कि इन
सबकी भूल ईश्वर तो बताबै न आवेंगे औ जीवका तो आपने साहबको जानबै
चाही नाहक संशयमें परे हैं साहबको जानैं तौ साहब छुड़ाइ लैइँगे ॥ ३५६ ॥
खालीदेखिकै भरमभा, ढूंढ़ताफिरै चहुँ देश ॥
ढूंढ़त ढूंढ़तमरगया, मिला न निर्गुणभेश ॥ ३५७ ॥
जौने संशयमें सब बूड़िगये हैं सो संशय कबीरजी देखावै हैं खाली कहें
शून्य देखिकै सब जीवन को भरम भयो सो देवता परोक्षहै वाको अर्थ जानै
नहीं हैं औ चारों देशमें ढूंढत फिरै हैं औ केते वा निर्गुण धोखाब्रह्म को ढूंढ़त
ढढ़त मरि गये खोज न लाग्यो ॥ ३५७ ॥
बूझ आपनी थिररहै, योगी अमर सो होइ ॥
अब बूझै भरमै तजै, आपै और न कोइ ॥ ३५८ ॥
देखादेखी सबजग भरमा, मिला न सतगुरु कोइ ॥
कहै कबीर करत नितसंशय, जियरा डाराखोइ॥३५९॥
गुरुवा लोग कहैं हैं कि जो बूझ थिर रहै तौ योगी अमर है जाय जोजग-
त्के नाना भ्रमछोड़िकै अबहूं बूझै तौ एक आपही है दूसरानहीं है मारैगा कौन
ऐसे कहि कहि देखादेखी श्रीकबीरजी कहैं हैं कि सबजगत् भरमि गयो सतगुरु-
कहे साहबके जाननवारे इनको कोई न मिलो हमहीं ब्रह्महैं यही संशय में डा-
रिकै आपने जीवन को खोइ डारे अर्थात् नरकमें डारिदिन्हे ॥ ३५८॥३५९॥
ह्रांकी आश लगाया, झूठी ह्रांकी आश ॥
गृहताजि वनखंड मानिया, युगयुग फिरै निराश॥३६०॥
वा ब्रह्म जो धोखा ताकीआश लगाये है सो आश तेरी झूठी है गृहत्या-
गिकै जाके हेत तुम बनखण्डमें टिकेहु सो युग युग निराश फिरौगे अर्थात्
ठिकान न लगैगो वह मिथ्याहै बिना साहबके जाने संसारते न छूटैगो ॥३६०॥
नेइके बिचले सबघर बिचला, अब कछु नाहिं बसाइ॥
कहैकबीरजोअबकीसमुझे, ताकोकालनखाइ ॥३६१॥

( ६५४ ) बीजक कबीरदास ।
कबीर जी कहै हैं कि नेइ जब बिगरि जायहै तब सगरौ घर बिगरि जायहै
ऐसे नेइ जो है धोखाब्रह्म जौनेको गुरुवालोग समुझावै है सोई जब मिथ्या
ठहरयो तब और सब लोकके देवता येई घरहैं ते बिगरिबोई चाहें अर्थात् इनते
अब कौन सांचफल मिलै सो श्री कबीर जी कहै हैं जो कोई साहब को समझै
अर्थात् तन मन ते लागै ताको काल नहीं खाय है और सब कालकों
कलेवा हैं ॥ ३६१ ॥
रामरहे बनभीतरे, गुरुकी पूजि न आश ॥
कहकबीर पाखंडसब, झूठे सदा निराश ॥ ३६२ ॥
बन जो है संसार तौनेके भीतर जब जीव भयो रामरहे कहे वह जीव रामते
राहत भयो रामको पुनि बरिआई पावै है अथवा रामते रहित जब जीवभयो तब
संसारी ह्वै जायहै और परमगुरु जे सुरति कमलमें बैठे रामनाम बतावै हैं तिनकी
आश न पूजतभई वे रामनाम बतावै हैं यह नहीं सुनै हैं वे छुड़ावन चहै हैं
सो नहीं छूटै हैं औ जे साहबको छोड़ि और औरमें लगावै हैं ते सब पाखण्डी हैं
झूठे हैं औ पाखण्डी जे हैं और औरमें लागे हैं तिनकी मुक्ति कबहूं नहीं होईहै
वे सदा निराशरहें तामें प्रमाण चौरासी अङ्गकी साखी॥"चकई बिछुरी रैनि की
जाय मिली परभात ॥ जे जन बिछुरे रामते दिवस मिलैं नहिं रात"॥३६२॥
बिनारूप बिनरेखको, जगत नचावै सोइ ॥
मारै पांचौजोनहीं, ताहिडरै सबकोई ॥ ३६३ ॥
जोमन जगत् को नचावै है सो बिनारूपको है औ बिनारेखको है आकाश
वायु आदिक जेहैं तिनमें रूपनहीं है पै रेख देखी परै है औ वायुको स्पर्श होय है
सोई रेखहै औ मनके रेखऊ नहीं है सो जे पांचौ पांचो ज्ञानेद्रिय कर्मेंन्द्रियकों
नहीं मारै हैं ऐसे गुरुवन को सबजने डेराते जाउ नहीं तौ तुम्हहूं को संसार
में डारि देइँगे ॥ ३६३ ॥
डरउपजा जिय है डरा, डरते परा न चैन ॥
देखा रामहि हैनहीं, यहौ कहै दिनरैन ॥ ३६४ ॥

साखी । ( ६५५ )
यहीं मनते डरउपजा कहे यहीके अनुभवते ब्रह्मभयो सो भूत ब्रह्मको सबै डेंरा-
यहैं सो यही ब्रह्मके डरमें जीव परा है कहे हराहै सो यह ब्रह्मके डरते चैन न
याको परा अर्थात् यह ब्रह्मको ढूंढ़तही रहिगयें न पायो न ब्रह्म भयो न
चैन भयो यह कहै हैं कि राम को कोई देखा है हमतो नहीं देखा जो कोई
हमको देखाइ देइ तौ हम मानैं सो अरे मूढ़ौ तुमतो डरमें परेहौ तुमको कैसें
देखाइदेइँ जाको साहब कृपाकरै हैं ताको देखाइ देइहौं ॥ ३६४ ॥
सुखको सागर मैं रचा, दुखदुख मेलो पांव ॥
स्थिति ना पकरै आपनी, चले रङ्क औ राव ॥३६५॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि मैंतो या बीजक ग्रन्थमें सुखको सागर रच्यो है
कहे साहबको बताइ दियो है तामें नहीं लगे दुःखमें पाँउ मेले है अर्थात् कहूं
ब्रह्ममें कहूं ईश्वरनमें कहूं नानामत में लागे है जहां याकी स्थिति है साहबमें
तिनको नहीं पकरै याही ते राजा रंक सब चले जायहैं कालखाये लेइहै ॥३६५॥
दुख न हता संसारमें, हता न शोक वियोग ॥
सुखहीमें दुखलादिया, बोलै बोली लोग ॥ ३६६ ॥
या संसार जो है सो चित अचितरूप साहबको है सो जो कोई साहबरूप
करि संसारको देखै है ताको न दुःख न शोकहै न वियोगहै साहबतो सर्वत्रपूर्ण है
ऐसो सुखरूप जो है संसार तामें मोर तोरमें परिकै दुखलादिया कहे दुःखभोगन
लग्यो औ वही मोर तोरकी बोली लोग बोलै हैं साहबको नहीं जानै हैं ॥३६६॥
लिखापढ़ीमें परे सब, यहगुण तजै न कोइ ॥
सबै परे भ्रमजालमें, डारा यह जिय खोइ ॥ ३६७ ॥
सब लिखापढ़ीमें परे हैं वेदशास्त्र तात्पर्य्य करिकै साहब को बतावै हैं सो
तो न जान्यो वादविवाद पढ़िपढ़ि करनलगे नये नये ग्रन्थ बनाय लेन लगे लिख-
नलगे वेदशास्त्रको अर्थ फेरि डारनलगे साहब मुख अर्थ जौन तात्पर्य्य करिकै
वेदशास्त्र बतावै हैं ताको छोड़ि अर्थ बदलै हैं या गुणको कोई नहीं छांड़ै
याही ते सब भ्रमजालमें परे आपने जियको खोइ डारचो ॥ ३६७ ॥

(६५८) बीजक कबीरदास ।
बहु परचै परतीति दृढ़ावै सांचेको बिसरावै ।
कळपत कोटि जन्म युग वांगै दर्शन कतहुं न पावै ॥
परम दयालु परम पुरुषोत्तम ताहि चीन्ह नर कोई ।
तत्पर हाल निहाल करतहै रीझतहै निज सोई ॥
बधिक कर्म करि भक्ति दृढ़ावै नाना मतको ज्ञानी ।
बीजक मत कोइ बिरला जानै भूलि फिरै अभिमानी ॥
कह कबीर कर्त्तामें सबहै कर्त्ता सकल समाना ।
भेद बिना सब भरम परे कोउ बूझै संत सुजाना ॥ ३६१ ॥
इति श्रीकबीरजी विरचित बीजक तथा सिद्धि श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीमहाराजा
श्रीराजाबहादुरश्रीसीतारामचन्द्रकृपापात्राधिकारिविश्वनाथसिंहजूदेवकृत-
पाखण्डखण्डनी टीकासमाप्ता । शुभमस्तु ।

बघेलवंशागमनिर्देश ।
दोहा-वंदौं वाणी वीण कर, विधिरानी विख्यात ॥
वरदानी ज्ञानी सुयश, हरि गानी दिन रात ॥ १ ॥
मदन कदन सुत मुद सदन, वारण वदन गणेश ॥
वंदतहों अरविंद पद, प्रद उर बुद्धि विशेष ॥ २ ॥
सवैया-श्रीरघुनंदन श्रीयदुनंदन औध द्वारकाधीसविलासी ।
रावणकंस विध्वंस किये जिन अंश भयअवतारप्रकाशी
पारकयाभवसिंधु अपारको वोहितनामजासंतसुपासी।
वंदत हौं तिनके पद द्वंद्व सुमैं अरविंद अनंदकेरासी ॥
दोहा-शंकर शंकर पद कमल, वंदन करौं निशंक ॥
शिर मयंक शुचि वंक जेहिं, लसति शैलजा अंक ॥३॥
प्रियादास पद पद्म युग, पुनि पुनि करहुँ प्रणाम ॥
विश्वनाथ नरनाथ गुरु, हरि स्वरूप सुखधाम ॥ ४ ॥
सांच मकुंद स्वरूपजे, नाम मुकुंदाचार्य्य ॥
वंदौं नृप रघुराज गुरु, करन सिद्धि सब कार्य्य ॥ ५॥

( ६६० ) बघैलवंशवर्णन ।
रामभक्त शिरताज जे, महाराज विश्वनाथ ॥
करन अनाथ सनाथ पद, पुनि पुनि नाऊं माथ ॥ ६ ॥
सवैया-भूपशिरोमणिश्रीविश्वनाथतनैरघुराजअनाथनिनाथै।
श्रीयदुनाथकोभक्त अनूपमसेवी सदाद्विजसाधुनगाथै ॥
तेज तपै दिननाथसों जासु यशो निशि नाथ दिपै महिमाथै
तापद् पाथजमें सुख साथ है जोरिकैहाथनवावतमाथै ॥ १ ॥
दोहा-पवनपूत जय दुखदवन, राम दूत सुखधाम ॥
शमन धूत सुकृपाभवन, बल अकूथ सब ठाम ॥ ७ ॥
जय कबीर मतिधीर अति, रति जेहिं पद रघुवीर ॥
क्षीर नीर सत असत कर,विवरण हंस शरीर ॥ ८ ॥
जय हरि गुरु हरि दास पद, पंकज मोहिं भरोस ॥
जाकी कृपा कटाक्षते,मिटत सकल अफसोस॥ ९ ॥
संतत संतन भूसुरण, चरण कमल शिरनाय ॥
बार बार विनती करौं, सब मिलि करो सहाय ॥ १० ॥
रच्यो रामरसिकावली, ग्रंथ भूप रघुराज ॥
तामें बहु भक्तन कथा, वरण्यो भरि सुखसाज ॥ ११ ॥
भक्तमाल नाभा सुकृत, ताहीके अनुसार ॥
श्रीकबीरहू की कथा, तामें रची उदार ॥ १२ ॥
छप्पय-जो कबीर बांधव नरेश वंजावलि भाखी ॥
अरु आगमनिर्देश भविष्यहु जो रचि राखी ॥
सोउ समास सहुलास तासु मैं वर्णन कीनो ॥
सुनत गुणत जेहिं सुकवि संत संतत सुख भीनो ॥
तेहि तुम वरणौ विस्तार युत, शासन नृप रघुराज दियो ॥
कह युगलदास धरि शीश सो, वर्णन हौं आरंभकियो॥१॥
घनाक्षरी ।
प्रथम कबीरजी सिधारि पुरी मथुरामें संतन सहित अति हरष बढ़ायकै ॥
तहां धर्मदास आय प्रभु पदपंकजमें बैठो बार बार शीश सादर नवायकै ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ६६१ )
ज्ञान उपदेश ताको कीन्ह्यो श्रीकबीर तहां कह्यो सो न इति भीति विस्तर बुझायकै ॥
मानिकै यथारथ कृतारथ ह्वै धर्मदास चलि मथुरा ते पथ गौन्यों चिते चायकै ॥२॥
दोहा-धर्मदास आवत भये, बांधौगढ़ सहुलास ॥
गुरु विश्वास दढ़ वास किय, जासु हिये आवास॥१३॥
पुनि कछु दिन बीतेसुख छाये । श्रीकबीर बांधव गढ़ आये ॥
तहँ चौहट बजार मधिमाहीं । निरखि एक सेमर तरु काहीं ॥
तहाँ आठ दिन आसन कीन्ह्यो । सेमर तरु उड़ाय पुनि दीन्ह्यो ॥
निरखि लोग सब अचरज माने । भूपति सों सब जाय बखाने ॥
महाराज साधू यक आई । सेमरतरुको दियो उड़ाई ॥
गुणि अचरज भूपति अतुराई । प्रभु पद किय दंडवत सिधाई ॥
सादर नृप कर जोरि सुहाये । पूंछ्यो नाथ कहांसें आयें ॥
तब प्रभु बचन कह्यो अभिरामा । हम कबीर निवसैं यहि ठामा ॥
दोहा-तब राजा पूंछत भयो, कैसे जानैं नाथ ॥
देहु परीक्षा हमहिं जो, तौ लखि होयँ सनाथा॥१४॥
होत अज्ञान नाश जेहिं तेरे । कहिय नाथ सो ज्ञान निवेरे ॥
देवी आदि वेदकी जोई । आदि निरंकारहु जो होई ॥
सादर पूंछत भयो भुआला । दियो बताय कबीरकृपाला ॥
राजाराम कह्यो पुनि बैना । कहिय जो आदि बघेल सचैना ॥
तब तुमकों कबीर हम जानें । अपनो जन्म सफल करि मानैं ॥
सुनि कबीर तब मृदु मुसक्याई । उत्पत्ति जौन बघेल सोहाई ॥
लागे कहन भूपसों सो सब । हम साकेत रहे निवसे जब ॥
तब मोसों कह श्रीरघुराई । तुम कबीर संसारहि जाई ॥
दोहा-जीवनको उपदेश करि, मेरो ज्ञान अशोक ॥
हमरे लोकपठावहू, जो पद आनँद थोक ॥ १५ ॥
छंद-द्वापर अंत आदि कलियुगमें कृष्ण प्रकाश अनूपा ॥
पूरुब दिशि सागरके तटमें धरिहैं बोध स्वरूपा ॥

( ६६२ ) बघेलवंशवर्णन ।
तहां जाय तुम प्रकट होउ यह रघुवर आयसु पाई ॥
प्रगटि वोडैसा जगपतिकेरो दरशन लीन्ह्यों जाई ॥ १ ॥
सागर तीर गाड़ि कुबरी पुनि बाँधि तासु मर्यांदा ॥
पुनि परबोधि सिंधुको बहु विधि गमन्यों युत अह्नादा ॥
चलत चलत गुजरात आयकै नगर विलोक्यो जाई ॥
जहां सुलंक भूप बहु साधुन राखे रहो टिकाई ॥ २ ॥
भक्तिवान अति रही रानि अति नित सब साधुन केरो ।
दर्शन करिलै तिन चरणामृत निज घर करै बसेरो ॥
ते साधुनको दर्शन करिकै एक वृक्षतर जाई ॥
वसि आसन बिछायकै बैठ्यो हरिको ध्यान लगाई॥३॥
यक दिन रानी सब साधुनको भोजन हित बोलवाई ॥
पंगति दिय बैठाय गयो मैं नहिं तहँवां हरषाई ॥
रानी तब मेरे आश्रममें आवतभै अतुराई ॥
महि तजि अंतरिक्ष आसन मम निरखि परम सुख पाई४
विनती किय प्रभु आपहु चलिकै मम घर भोजन कीजै ॥
मैं तब कह नहिं भूख प्यास मोहि हरि अधार गनि लीजै।
रानी कह यकतो सुत बिन मैं दुखित राज्य सब सूनी ॥
दूजे जो न आप पगुधारे तपी ताप तो दूनी ॥ ५ ॥
मैं कह सोच करै नहिं राजा द्वै सुत हैंहैं तेरे ॥
संतनको चरणामृत अबहीं लैआवे ढिग मेरे ॥
साधुन चरण धोय चरणोदक लैआई जब रानी ॥
दियो पियाय रानिको तब मैं निज चरणोदक सानी॥६॥
लहि मेरो वर साधुनकेरो बहु विधि करि सतकारा ॥
परम प्रमोद पायउर रानी गमनत भई अगारा ॥
कह्यो हवाल भूपसों सो सब सुनि नृप अति सुखपाई ।
लै फल फूल द्रव्य बहु सादर मम समीप द्रुत आई॥७॥

बघेलवंशवर्णन । ( ६६३ )
करि दंडवत प्रणाम विनय किय नाथ दया उर धारी ।
कछु दिन आप वास इत कीजै तौ मैं होहुँ सुखारी ॥
कुटी दियो बनवाय भूप तँहँ करतभयो मैं वासां ॥
कछु वासरमें गर्भवतीभै रानी सहित हुलासा ॥ ८ ॥
दोहा-ज्यों ज्यों रानीके उदर, बढ़्यो गर्भ करि वास ॥
त्यों त्यों रानीके वपुष, बाढ़यो परम प्रकाश ॥१६॥
कछु दिन बीते सुदिन जब आयो । तब रानी दुइ सुत उपजायो ॥
भयो जो जेठ पुत्र तेहि आनन । होत भयो सम मुख पंचानन ॥
लहुरों तनय होत जो भयऊ । तेहि नर तनु अति सुंदर ठयऊ ॥
लखि रानी अति अचरज मानी । दिय देखाय भूपति कहँ आनी ॥
मानि शंक भूपालउदासा । कह कबीर आयो मम पासा ॥
सादर करि दंडवत प्रणामा । कीन्हीं विनय भूप मतिधामा ॥
नाथ भये मेरै सुत दोई । है अति कृपा आपकी सोई ॥
पै जो भयो जेठ सुत स्वामी । व्याघ्र वदन सों यह बदनामी ॥
दोहा--सो सुनि मैं वाणी कही, करिकै बहुत प्रशंस ॥
यह सुत वंश वतंसभो, रामलोकको हंस ॥ १७ ॥
व्याघ्र वदन परतो दृग जोई । नाम बघेल ख्याति जग होई ॥
यातें वंश बयालसि तांईं । अटल राज्य रहि है महि ठांईं ॥
तेजवान यह होय महाना । पूरण भक्तिमान भगवाना ॥
वंश बयालसिलों अभिरामा । चलिहै तब बघेल कुल नामा ॥
यह वर लहि सों मेरे मुखते । भूपति आय महळ अति सुखते ॥
द्विजन दान दै तोपन कांहीं । दगवायो बहु बार तहाँहीं ॥
पुनि मोकहँ सो नृपति सुजाना । करि बहु विनय लाय निजथाना ॥
ऊंचे आसन पर बैठाई । पूजन किय अति आनँद छाई ॥
दोहा-रानीलै दोउ पुत्रको, मेरे पग दिय डारि ॥
तब मैं पुनि देतो भयों, बहु अशीस चित धारि १८