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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 680

( ६४४ ) बीजक कबीरदास ।
कंचन भो पारस परसि, बहुरि न लोहा होइ ॥
चंदन बास पलास विधि, ढाक कहै नहिं कोई॥३३४॥
पारसको परसिकै कंचनभयो जो लोह है सो फिरि लोहा नहीं होइहै औ
चंदनकें बासते पलाश जो छिउल है सो बेधिगयो ताको ढाक कोई नहीं कहै है
चंदनै कहै है ऐसे जोंजीव साहबकों ह्वैगयो साहब के पासगयो ताको जीव
नहीं कहै है पार्षद रूप कहन लगै है ॥ ३३४ ॥
बेचूनै जग राचिया, सांई नूर निनार ॥
तब आखिरके बखतमें, किसका करौ दिदार ॥३३५॥
बेचून निराकार जौन जगत्को रचिसि है सो सांई के नूरतें कहै प्रकाशते
निनारहै जुदा है अर्थात् साहबकों प्रकाश न होइ वा नूरही अल्लाह है ऐसा
जो मानो तो हे मुस्लमानौ मैं पूछता हौं कि आखिरके बखतमें कहै क्याम-
तिके बखतमें वह इनसाफ करैगा ऐसा कुरानमें लिखता है सो उसको बेचून
मानते हौ निराकार मानते हौ तौ भला वा किसतरहसे इनसाफ करैगा औ
किसका दीदार करौगे अर्थात् किसकी सूरति देखौगे भावयहै कि वा निराकार
नहीं है साकार है तुमको भ्रम भया है सो या बात सत्ताईस रमैनीके मूलमें
ह साहबको नूरजो है प्रकाश सो सबके भीतर बाहर भराहै कोई जगह उससे
खाली नहीं है औ साहब औ साहबकी सामग्री औ साहबको लोक सब नूरही-
नूर कहै वहां बहुतसा नूर समिटिकै एकसल देखि परै है जिसतरहकी मिसाल
कि जैसा साहबहै तैसासाहबै है दृष्टांतकाकोदेइ सो कबीरजी पूछै हैं कि भला
तुमहूँ तो विचारिदेखो कि जो उसके हाथै पांड न होते तौ जगत्को कैसे रचतो
सो साहबसाकार है तुमको निराकारकी भ्रमभई है तामें प्रमाण ।
कलिमा बाँग निमाज् गुजारै । भरम भई अल्लाह पुकारै ॥
अजब भरम यक भई तमासा । ला मकान बेचून निवासा ।
बे नमून् वै सबके पारा । आखिर काको करौ दिदारा ॥
रगरै महजिद नाक अचेता । भरमाने बुत पूजां होता ।
बावनतीसबरण निरमाना । हिन्दू तुरुक दोउ परमाना ॥