कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ६४७ )
सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिंलभते पराम् ॥ १ ॥ भक्तिमेंछागुण हैं ॥ " क्लेशघ्नी
शुभदामोक्षलघुताकृत्सु दुर्लभा । सांद्रानन्दविशेषात्मा श्रीकृष्णakarshani मता" ॥
भक्तिमें छे गुण हैं । १। एक तो सम्पूर्ण क्लेशको दूर कर देइ है । अर्थात् संसार
दूर करि देइ है । फिर भक्ति कैसी है २ कि शुभदा है कहै सम्पूर्ण शुभ गुण
दिव्य गुण देइ है । और ३ अपने आनन्द ते मोक्षके सुखको लघु करि देई है।
और ४ दुर्लभा है अर्थात् जब ब्रह्म ह्वैगयेह्र के ऊपर होइ है। और सान्द्रानन्द
विशेष आत्मा है कहै परमानन्द रूपा है और श्रीकृष्ण को आकर्षण करिलै
आवै है कहै जाकी भक्ति होइ है तो श्रीरघुनाथजीको दर्शन होई है । सो श्री-
कबीरजी भक्ति को सिद्धान्त राख्यो है कि, बिना भक्ति रघुनाथजी कोई प्रकार
से मिलि सकते नहीं हैं और जहां भक्त पहुंचे है तहां दूसरो पहुंचि सकै नहीं
है । सब ते ऊंची भक्तिकी सीढ़ी है । बिना भक्ति साहब नहीं मिलैं तामें
प्रमाण श्रीकबीरजीको भवतरण ग्रन्थको ॥ " सुनु धर्मदास भक्ति पद ऊंचा ।
तिन सीढ़ी नहिंकोउ पहुंचा ॥ वर्त एक है भक्तिको पूरा । और वर्त सब
कीजै दूरा ॥ और वर्त सब जमकी फाँसी । भक्तिहि वर्त मिलैं अविनासी ३३९
जासों नाता आदिको, बिसरि गयो सब ठौर ॥
चौरासीके वश परे, कहत औरको और ॥ ३४० ॥
जौनै साहबको आदिको नातारहै कहै जाको सदाको दास अंश तौने राम
चन्द्रको भक्ति बिसरी गयो मायामें परि चौरासी लाख योनिके वश ह्वै और
को और कहै हैं अर्थात् कहूं कहै हैं कि वा ब्रह्म मैंहीं हौं कहूं आत्मैकों
मालिक मानै हैं कहूं नाना देवतन को स्वामी मानै हैं परंतु संसार काहूकों
छुड़ायो न छूट्यो ॥ ३४० ॥
१ अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश यही पाँच क्लेश हैं अनित्य पदार्थोंमें
नित्य बुद्धि अनात्म पदार्थोंमें आत्म बुद्धिका नाम अविद्या है तात्पर्य यह कि अज्ञान
जन्य जो २ कार्य हैं सब अविद्या कृत है । मैं राजा, मैं पण्डित मैं ज्ञानी मैं कुलीन
इत्यादि अहङ्कार युक्त कार्यको अस्मिता कहते प्रिय वस्तुमें प्रीति होना राग ।
और अनिष्ट पदार्थमें अप्रीतिका होना द्वेष । एवं बिना विचारे किसी कार्यको एक
प्रकारका मान कर उस में आग्रह बुद्धिको अभिनिवेश कहते हैं ।