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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 681

साखी । ( ६४६ )
भरमिरहें सब बरणमहँ, हिन्दुतुरुक बखान ।
कहै कबीर बिचारिकै, बिनगुरूकी पहिंचान ॥
भरमत भरमत सब भरमाना, रामसनेही बिरला जाना ॥ ३३५ ॥
सांई नूरदिल एकहै, सोई नूर पहिंचानि ॥
जाके करते जगभया, सो बेचून क्यों जानि ॥३३६ ॥
सांई जो है साहब श्रीरामचन्द्र ताहिको एक नूर सबके दिलमें है सोई
नूर तैं मकाश पहिंचानु जौनेके करते जग सब उत्पन्न भया है ऐसो जो साहब
ताको तू बेचून कहे निराकार न जान वे साहब साकारहैं औनिर्गुणसगुणके-
परे हैं । तामें प्रमाण कबीरजीको साक्षी ॥
श्रूप अखण्डित ब्यापी चैतन्य शैतन्य ।
ऊंचे नीचे आगे पीछे दाहिन बायँ अनन्य ॥
बड़ा ते बड़ा छोटते छोटा मीहीते सब लेखा ।
सबके मध्य निरन्तर सांई दृष्टि दृष्टि सों देखा ।
चाम चश्मसों नजरिन आवै खोजु रूहकें नैना ॥
चून चगून बजूद न मानु तैं सुभा नमूना ऐना ।
ऐना जैसे सब दरशावै जो कछु वेष बनावै ।
ज्यों अनुमान करै साहबको त्यों साहब दरशावै ॥
जाहि रूह अल्लाहके भीतर तेहि भीतरके ठांई ।
रूप अरूप हमारि आश है हम दूनहुंके सांई ॥
जो कोउ रूह अपनी देखै सो साहबकों पेखा ।
कहें कबीर स्वरूप हमारा साहबको दिल देखा ॥ ३३६ ॥
रेख रूप जेहि है नहीं, अधर धरो नहिं देह ॥
गगन मँडलके मध्यमें, रहता पुरुष बिदेह ॥ ३३७ ॥
कैसो साहब है कि जाके रूप रेखा नहीं है औ बिशेषिकै देह धारण कीन्हे
है अर्थात् रसहीरस देह धारण किये है पाञ्चभौतिक नहीं है । औ अधर जौं
आकाश तामें देह कबहूं नहीं धरै अर्थात् जो कबहूं न रहै तब न देह धारै