कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ६४३ )
भूलासो भूला बहुरिकै चेतु ॥
शब्दकी छुरी संशयको रेतु ॥ ३३१ ॥
गुरुमुख ।
साहब कहै हैं कि हे जीव ! तैं भूला सो भूला भला यह संसार ते बहुरि कहै
उलटिकै तौ चेत करौ सारशब्द जो रामनाम छुरी तेहितैं अपनी संशय रेत
डारु कहे काटिडारु अर्थात् रामनामको अर्थ तो विचारु तैं मेरोई है और पदार्थ
छोड़िदे तामेप्रमाण॥ “यक रामनाम जाने बिना भव बूड़िमुवा संसार” ॥३३१॥
सबही तरुतर जायकै, सबफल लीन्हो चीखि ॥
फिरिफिरि मांगत कबिरहै, दर्शनहींकी भीखि ॥३३२॥
सबही तरुतर जायकै कहे शरीर धारण करिकै सुख दुःखरूप फल सब
चाख्यो नाना उपासना योगज्ञान बैराग्य सब कैचुक्यो शरीरधरेको फल कोई
न पायो सो शरीर धरे को फल साहब को दर्शन है सो फिर फिर कबीर
मांगै है ॥ ३३२ ॥
श्रोता तो घरही नहीं, वक्ता वदै सो वाद ॥
श्रोता वक्ता एकघर, तब कथनीको स्वाद ॥ ३३३ ॥
श्रोतातो घरहीमें नहीं है अर्थात् सुनतै नहीं है औवक्ता आपनो मत बादि-
बादिबदै है श्रोताको समुझावै है सो जब श्रोतावक्ता एक घरहोइ कहेएकै उपा-
सनाहोइ एकै मतहोय तब कथनीको स्वाद है कहे कथाको स्वादत-
बहीं मिलै है जैसे याज्ञवल्क्य भरद्वाज इत्यादिक तामें प्रमाण ॥ “इष्ट मिलै
अरु मन मिलै, मिलै भजन रस रीति । तुलसिदास सोइ संतसों, हठ करि
कीजै प्रीति” १॥ दूसरो प्रमाण राम सखेजीको॥ “शिष्य सांच गुरु सांचहै,झूठन
जियत न मान॥बध्यो शिष्य साची प्रकृति, छोरत गुरुदै ज्ञान”॥२॥औ कबीर-
हूजीको प्रमाण। साखी चौरासी अंगकी। “नाम सत्य गुरु सत्यहै,आप सत्य जब
होइ ॥ तीन सत्य प्रकटैं जबै, गुरुका अमृत होइ” ॥ ३३३ ॥