कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६४६ ) बीजक कबीरदास ।
वातों सर्वत्र पूर्ण है गगनमण्डल के मध्यमें कहें तीन आकाश हैं एक नीचे
एक मध्यमें एक ऊपर सो तीनों आकाशमें वा विदेह पुरुष पूर्ण है ॥ ३३७॥
धरचो ध्यान वा पुरुषको, लाये बज्र केवाल ॥
देखिकै प्रतिमा अपनी, तीनों भये निहाल ॥३३८॥
वह परम पुरुष साहब जे श्रीरामचन्द्र हैं,नव दूर्बा दल जिनको रसरूप शरीर
है तिनको ध्यान धरो जो कहो आनन्द को रूप तो सफेदको है है नव दूर्बादल
श्याम कैसे कहौ है तो जहां बहुत श्वेताई है तहां हरित रंग देखही परै है जो
कहो यह कैसे अनुभव होइ तो सुनौ सब ते श्वेत स्वच्छ गंगाको जल है सौ
जहां गंगाहूमें बहुत जल है बड़ी गहिराई है तहां हरितई देखि परै है । जौं
कहो साहबको कैसे जानैं सो वज्र कपाट लगाइबेकी बिधि आगे लिखि आयें
हैं जलन्धर बन्ध लगायकै झटकादैकै वज्र कपाट लगायो सुरति कमलमें जों
रकारको उद्गार ओङ्कारै है सो सुनि परी है तब वही रकार को जो ध्यान करै
तब सो ध्यान किये साहब आपही प्रकट होय है । यही ध्यान करिकै तीनों
ब्रह्मा विष्णु महेश अपनी अपनी प्रतिमा देखिकै निहाल भये हैं अर्थात् साह-
बके समीप हजारन ब्रह्मा विष्णु महेश देखिकै या निहाल भये कि धन्य
हमारी भाग्य है कि श्रीरामचन्द्रके द्वारमें हमहूं हैं यहां तो कोटिन ब्रह्मांडकें
ब्रह्मा विष्णु महादेव मोजूद हैं ठाढ़े स्तुति करै हैं ॥ ३३८ ॥
यह मनतो शीतल भया, जब उपजा ब्रह्म ज्ञात ॥
जेहि बैसन्दर जग जरै, सो पुनि उदक समान॥३३९॥
जब ब्रह्मज्ञान भयो तब यह मन शीतल ह्वैगयो अर्थात् संकल्प विकल्प
छोड़ि दियो तपिवो मिटि गयो सो जौने बैसन्दरते कहे ब्रह्म ज्ञानते मनकों
संकल्प विकल्प छूटि गयो जग जरि गयों अर्थात् न रह्यो तौन जो ब्रह्म ज्ञान
सों उदक जो साहबकी प्रेमा भक्ति तामें समान अर्थात् जब साहबकी भक्ति
भई तब वा ब्रह्माभि न रहि गई यामें ते या आयो कि ज्ञानको फल साहबकी
भक्ति है तामें प्रमाण ॥ “ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ॥ समः