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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 669

साखी । ( ६३१ )
बसै कौन ? पिण्ड औ ब्रह्मांड कौन ? आत्म परमात्म कौन ? जरा मरण काल
कौन ? गुरु शिष्य बोध कौन ? क्षर अक्षर निरक्षर कौन ? तबकबीरजीबोले ।
नाद् बिंदु योग स्वप्न, जीव ईश्वर भोग स्वप्न, भौमी अवतार स्वप्न,
निराकार स्वप्न है ।
पाप पुण्य करै स्वप्न वेद औ बेदान्त स्वप्न बाचा औ अबाचा स्वप्न चंद्र
सूर स्वप्न है ॥ इत्यादिक बहुत बाक्यहैं ॥ २८६ ॥
नष्टैका यह राज्यहै, नफरक वरतै द्वैक ॥
सारशब्द टकसारहै, हिरदयमाहिं विवेक ॥ २८७ ॥
नष्टजो है धोखा ताहीको यहराज्यहै अर्थात् अहंब्रह्मास्मि कहिकै सब नष्टभये
औ नफरजो है काल ताही को छेक संसार बरत रह्यो है अर्थात् सब संसारको
काल छेकिछेकि खाये जायहै सारशब्दजो रामनाम टकसार ताको हृदय में
कोई कोई विवेक करतभये अर्थात् कोई साहेबको न जानतभये संसारते न
छूटतभये ॥ २८७ ॥
दृष्टमान सब बीनशै, अदृष्टलखै ना कोइ ॥
हीनकोइ गाहकमिलै, बहुतैसुख सो होइ ॥ २८८ ॥
जहांभरदृष्टमानहै सो सबबिनशै है नाशहोयहै औ मनबचन के अगोचर जो
ब्रह्महै ताकोतौ कोई देखतै नहीं है धोखही है सो दृष्ट अदृष्ट के परे हीन
कोई कहे कोई हीनहोइ अर्थात् दीन होई ताको गाहक ऐसें जे साहब श्रीराम-
चन्द्रते मिलैं जो जीवको तौ बहुतसुख सो होय अर्थात् जननमरण छूटिजाय
साहबके समीप सेवामें बनोरहै तामें प्रमाण ॥ गोसाईंजीकोदोहा ॥ “ पदगहि
कहति सुलोचना, सुनहु बचनरघुवीर ॥ तुमहिं मिले नहिं होइ भव, यथा सिन्धु-
करनीर ” ॥ २८८ ॥
दृष्टिहि माहिं विचारहै, बूझै बिरला कोइ ॥
चरमदृष्टि छूटै नहीं, ताते शब्द्दी होइ ॥ २८९ ॥
जोकहो साहबको देखै कैसे हैं तौ दृष्टिही में विचारहै साहब को देखै है
या चर्मदृष्टिकरिकै साहबको नहीं देखै या बात कोई बिरला बूझै है या जीवकी