कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished766 पृष्ठ
पृष्ठ 667, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 667
साखी । ( ६२९ )
जहँ गाहक तहँहौं नाहिं, हौं जहँ गाहक नाहिं ॥
बिनबिबेकभटकताफिरै, पकरिशब्दकीछाहिं ॥ २८१ ॥
गुरुमुख ।
जहां नाना ईश्वर नाना उपासना नाना ज्ञान इन एकहूकों जहां गाहकहै
तहां मैं नहीं हौ अथवा जहां कौनिहूं बस्तुकी चाहहै तहां मैं नहीं हौं जहां
कौनिहूं बस्तुकी चाह नहीं है तहांमैं हौं सो बिना बिबेक कहे बिना सांच
असांचके जाने अर्थात् सांच जो रामनाम ताके बिना जाने गुरुवालोगनके
शब्दकी छांह पकरिकै संसार भटकत फिरै है जनन मरण नहीं छूटै है जब
रामनाम जानै तब संसारते छूटै तामें प्रमाण “सप्तकोटि महामन्त्राश्चित्तवि भ्रम
कारकाः ॥ एक एव परो मन्त्रो राम इत्यक्षरद्वयम् ॥ २८१ ॥
शब्दहमाराआदिका, इनते वली न कोइ ॥
आगे पाछे जोकरै, सो बलहीना होइ ॥ २८२ ॥
गुरुमुख ।