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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 664

( ६२६ ) बीजक कबीरदास ।
वोहूतौवैसहिभया, तू मतिहोइ अयान ॥
तूगुणवंता वे निरगुणी, मतिएकैमें सान ॥ २७० ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि योगी तौ समाधि करिकै शून्यमें गये औ वहू जे हैं
वह ज्ञानी सहजसमाधिद्वारे तौनौ ज्ञानकारिकै वैसेभये कहे वही शून्यमें समाय
रह्यो तू मति अयान होय कहे अज्ञानी होइ तूतो गुणवंता कहे दिव्यगुण सहित
जे साहब हैं तिनको है दिव्यगुण तेरेहू है निर्गुण जो धोखा ब्रह्म तामें तू काहे
सानै है तू मतिसान साँचाद्वैकै तू असाँच काहे होइहै ॥ २७० ॥
साधू होना चहहुजो, पक्काके सँगखेल ॥
कच्चासरसों पेरिकै, खरी भया नहिं तेल ॥ २७१ ॥
जो तुम साधु होना चाहो तौ पक्के जे साहबकें जाननवारे तिनके संग खेल
कहे सत्संगकरौ जो तुम और नाना देवता नाना मतनमें लगौगे तौ तुम्हारो
न लोकै बनैगो न परलोकै बनैगो जैसे कच्चे सरसों को पेरनो न तेलै भयो न
खरी भई ॥ २७१ ॥
सिंहैकेरीखालरी, मेढ़ा ओढ़े जाय ॥
वाणीते पहिंचानिया, शब्दहि देत बताय ॥ २७२ ॥
सिंहकी खालरीकहे शुद्ध जीवनको वेष गुरुवालोग संसार में बनाये कण्ठी
छापा टोपी दीन्हें हैं सबलोग जानैं किं बड़े साधुहैं जैसे सिंहकी
खालरी मेढ़ाकों वढ़ायदेइ अर्थात् मढ़िदेइ तौ सब सिंहैकी नाईं जानै हैं परंतु
जब भ्याँ भ्याँ बोलन लग्यो तब बाणी ते जानि परेउ कि सिंह नहीं है मेढ़ाहे
ऐसे जब गुरुवनको सत् सङ्गकीन्यो तब बाणीते जानिपरे कि ये साहबको
नहीं जानै हैं वेषैभरि बनाये हैं इनते संसार न छूटैगो तामें प्रमाण चौरासी
अङ्गकी साखी ॥ “स्वामी भया तो का भया, जान्यो नहीं बिबेक ॥ छापा
तिलक बनायकै, दग्धे जन्म अनेक ॥ १ ॥ जप माला छापा तिलक, सरै न
एकौ काम ॥ मन कांचे नाचे वृथा, साँचे राचे राम ” ॥ २७२ ॥