कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६३४ ) बीजक कबीरदास ।
हंसजीव बसै है सो या जीवठौरमें न लग्यो कहे साहबकें पास न गयो वहीमन-
के ओटमें रहिगयो अर्थात् मनरूपी सरोवरमें रहिगयो ॥ २९७ ॥
मधुरबचनहैं औषधी, कटुकबचनहैं तीर ॥
श्रवणद्वार ह्वै संचरैं, शालैं सकल शरीर ॥ २९८ ॥
कटुकबचन तीरहैं औ अधुरबचन औषधहैं ते ये दोऊ श्रवण द्वारह्वैकै सञ्चरै
हैं कहे जाइहैं औसिगरे शरीरमें शालै हैं कहे व्याप्त ह्वैजायहैं जो कोई मीठ बचन
कह्यो तौ वासों रागभयो औ जो कोई कटुकबचन कह्यो तौ वामें द्वेषभयो औ
मधुरबचन ते जहां राग कियो जहांमन लग्यो तहँ जन्मतभयो औ कटुकबचन
सुनि कोप करि बधादिक कियो तेहिते आयु हानिभई मरतभयो याते मधुर
बचन कटुकबचन दोऊ बरोबर शालै हैं ॥ २९८ ॥
ई जगतो जहडेगया, भया योग ना भोग ॥
तिलतिलझारिकबीर लिय, तिलठीझारैलोग ॥ २९९ ॥
या जगतो जहडेगयो कहे द्वैगयो काहेते कि न याको योगही सिद्ध भयो
न भोगही सिद्धभयो कैसेउ हजारन वर्षलों योगकै जिये महाप्रलय भररहें
आखिर नाशही ह्वैजाइहै जो धर्मकरि दिविको भोगकियो तौ जब पुण्यक्षीण
ह्वैजाइहै तबतौ मृत्युही लोकको आवै है याते न भोग सिद्धभयो न योग सिद्ध-
भयो सो तिलजो है रसरूपाभक्ति साहबकी ताकोतों श्रीकबीरजी कहैं कि मैं
झारिलियो तिलठी जो है नानाउपासना तिनकी और लोग झारै हैं नभकरै हैं
जामें रस नहीं है ॥ २९९ ॥
ढाढसदेखुमरजीवको, धसिके पैठिपताल ॥
जीवअटकमानैनहीं, गहिलैनिकरयो लाल ॥ ३०० ॥
मरजीवते कहावैं हैं जेसमुद्रमें पैठिरत्न निकारै हैं ताको ढाढस देखो ढाढस
करिकै पातालमें पैठै हैं जीवको अटक नहीं मानै हैं समुद्रते लालगहि लैआवै हैं
तैसे जीव तैहूं मनादिकनको त्यागिदे मरिबेको नडेराय विश्वासकारिकै साहब
रसरूपसागरमें पैठु ॥ ३०० ॥