कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ६३९ )
लघुताई सबते भली, लघुताइहिसबहोइ ॥
जसद्वितीयाकोचन्द्रमा, शीशनवै सब कोइ ॥ ३१६ ॥
लघुताई सबते भली है लघुताइन ते सब होइहै सर्वत्र साहब को देखै
अपनेको दासमानै तौ वाकी प्रीति साहबमें बढ़ते जाय है औ सब माथनावै हैं
तामें प्रमाण कबीरजीको ॥ "लघुताते प्रभुता मिलै, प्रभुताते प्रभु दूरि ॥
चींटीलै शक्करचली, हाथी के शिरधूरि" ॥ ३१६ ॥
मरतेमरते जगमुवा, मरण न जानै कोइ ॥
ऐसा है के नामुवाजो, बहुरि न मरना होइ ॥ ३१७ ॥
मरते मरते सब जग मराजायहै मरण कोई नहीं जानै है ऐसा हैकै कोई न
मुवा जाते फेरि मरण न होय अर्थात् इंद्रिनते मन ते शरीरते भिन्न हैकै साहबमें
न लगे जाते पुनि जनन मरण नहीं होय ॥ ३१७ ॥
वस्तुअहै गाहकनहीं, वस्तु सो गरुवामोल ॥
बिनादामको मानवा, फिरै सो डामाडोल ॥ ३१८ ॥
वह गरुवा मोलको जो साहबहै सर्वत्र पूर्ण है परंतु वाको गाहक कोई
नहीं मिलै है औ बिना दामको कहे बिना मोलको यह जीव साहबके ज्ञान
बिना डामाडोलमें फिरै है अर्थात् जैसे बाजार में गयो औ सब साज उहां बनी
है औ हाथमें दाम नहीं है तौ डामाडोल फिरै है लै नहीं सकैहै तैसे साहब
सर्वत्र पूर्ण हैं परंतु सतगुरुको उपदेश रूप दाम नहीं है डामाडोल फिरै है॥३१८॥
सिंह अकेला वनरमै, पलकपलककैदौर ॥
जैसा बनहै आपना, तैसा बनहै और ॥ ३१९ ॥
बन जो है शरीर तामें सिंह जो है जीव सो अकेला रमै है औ पलक पल-
कमै दौरकरिकै गुरुवनसों पूछै है सो असनहीं बिचारै है कि जैसा बन कहै
शरीर मेरोहै तैसे औरहूको है जैसे मोको अज्ञानहै तैसे इनहूंको अज्ञानहै येई
नहीं संसारते छूटें हमको कैसे छुड़ावेंगे ॥ ३१९ ॥