कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ६३५ )
येमरजीवाअमृतपीवा, काधसिमरैपताल ॥
गुरुकीदयासाधुकीसंगति,निकसिआउ यहिकाल३०१
ये मरजीवा कहे तैं तो अमृतको पीवनवारो पातालमें धसिकै कहे संसार
में परिकै कहामरै है औ जियै है नरकको चलाजाइ है सो गुरुकी दयातें
साधुनकी संगतिते तू यहिकालमें संसारते निकसिआउ जो तैं साहबके जाननवारें
साधुनकी शरणहोइ वाही चालचलै ॥ ३०१ ॥
केते बुंद हलफे गये, केते गयो बिलोइ ॥
एक बुंदके कारणे, मानुष काहेको रोइ ॥ ३०२ ॥
हा इति कष्टमें है सो कबीरजी कहै हैं कि हाय केतन्यो जीव लफेकहैं
नैगये अर्थात् ढरकि गये अर्थात् साहबके मार्गचले साहबकी उपासनाकियो पै
गुरुवालोग जो नानामत लखायो तिनहींमें लफेकहै नैगये सो केतौ तौ याभका-
रसों गये औ केतौ पहिलेहीते बिगोयगये कहे बिगरिगये सो हे मानुष! श्रीराम-
चन्द्रको जो आनन्दसमुद्र ताके एकबुन्दके कारण हे संसारीजीव ! तैं काहेरोवै
है धोखाब्रह्मको छांडि साहबको जानु जाते जननमरणछूटै ॥ ३०२ ॥
आगिजो लगीसमुद्रमें, टुटिटुटि खसै जो झोल ॥
रोवै कबिरा डिम्भिया, मोरहीरा जरै अमोल॥३०३॥
या संसारसमुद्रमें अज्ञानरूपी आगिलगी कर्मरूप झोल जे शरीरके कारणहैं
ते या देहते टुटिटुटि वा देहमें गये या देह जारिगई याही रीतिते नानादेह धरै
हैं संसार नहीं छूटैहै सो कबीर जी रोवै हैं कि दम्भीह्वैकै मोर अमोल हीरा-
जीव ते अज्ञानरूपी अग्निमें जरेजायहैं ॥ ३०३ ॥
साँचे शाप न लागिया, साँचे काल न खाय ॥
साँचेसाँचे जो चलै, ताको कहा नशाय ॥ ३०४ ॥
कबीरजी कहै हैं कि दम्भकरिकै काहे अज्ञानरूपी आगिमें जरे जाउहौ
जोसांचे साहबमें लगिकै सांचे साधुहोउ तौ वे सबते जबर होइहैं न वाकोशापलगै
न वाकोकाल खायहै सो जाम्बवंतहनुमानादिक अबतकबने हैं ॥ ३०४ ॥