कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 665, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ६२७ )
ज्यहि खोजत कलपनभया, घटहीमें सो पूर ॥
बाढ़ॆगर्वगुमानते, ताते परिगो दूर ॥ २७३ ॥
जौने मुक्तिको खोजत खोजत कल्पैभयो अर्थात् कल्पनाकरत करत कल्पना
रूप द्वैगया ब्रह्ममें लीनभया मुक्तिको मूल जों रामनाम सो तेरे घटही में है
ताको अहंब्रह्मास्मिके गर्बते तोको दूरि परिगयो अबहूं समझ तौ तेरे
समीपही हैं ॥ २७३ ॥
दश द्वारेका पीपरा, तामें पक्षी पौन ॥
रहिबेको आश्चर्य्य है, जायतो अचरज कौन ॥२७४॥
रामहि सुमिरहिं रणभिरैं, फिरैं औरकी गैल ॥
मानुषकेरीखालरी, ओढ़िफिरतहैं बैल ॥ २७५ ॥
२७५। रामनामकों तौसुमिरै है परन्तु रामनामजपिबे की बिधिगुरुतें
नहीं पाये बादबिवाद करत साधुनते भिरतफिरै हैं साहबको नहीं जानै हैं ते
मानुषकी खाल ओढ़ेतौ हैं परंतु बैलहैं अर्थात् पशु हैं जानै नहीं हैं ॥ २७५ ॥
खेत भला बीजौ भला, बोइये मुठीफेर ॥
काहे बिरवारूखरा, या गुणखेतै केर ॥ २७६ ॥
खेती तो नौ कई है परंतु तृणादिकनके जरको कारण वामें बनो है त्यहितें
बिरवा उठै नहीं पावै तृणछाय जायहै सो या गुण खेतै को है ऐसे खेत अंतः
करणमें नाना बासनारूप तृण जानिरहे हैं तामें रामनामरूपी बीज फेरि फेरि
बोवै हैं परंतु तृण बासननके मारे लगे नहीं पावै साहबमें प्रीति नहीं होय
देइ जब सत्संग करि कै निराय डारै तौ तृणऔ रामनामरूप अंकुर दृढ़ ह्वैजाय
साहब को जाननलगे संसार छूटिजाय पापजारेमें नामकी बड़ी शक्ति है
तामें प्रमाण ॥ “यावती नाम्निवै शक्तिःपापनिर्दहनेहरेः ॥ तावत्कर्त्तुंनशक्नोति
पातकम्पातकीजनः” ॥ २७६ ॥
गुरु सीढ़ीते ऊतरै, शब्द बिमूखा होइ ॥
ताको काल घसीटिहै, राखिसकै नहिं कोइ ॥ २७७ ॥