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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 668

( ६३० ) बीजक कबीरदास ।
ताहि नकाहिये पारखी, पाहनलखै जो कोई ॥
नग नल या दिलसों लखै, रतनपारखी सोइ ॥२८४॥
जो कोई पाहनरूपी मनको देखै है अर्थात् जब भरम जाके मन बनो रहै
ताको पारखी न कहिये औ जो कोई नर आपनो आत्मारूप जो है नग स्वस्व-
रूप सो आपने दिलमें रामनाममें देखै है अर्थात् मकार स्वरूप जो है आप
नों स्वस्वरूप ताको रकार रूप जै हैं साहब तिनके समीप देखै सोई पारखी
है जब नग मुन्दरी मे जड़ि जायहै तबहीं शोभा होयहै नहीं तो पाहनै है ॥ २८४ ॥
सारीदुनियाँ बिनशती, अपनी अपनी आगि ॥
ऐसा जियरा नामिला, जासों रहिये लागि ॥२८५॥
सारी दुनियाँ अपनी अपनी आगिमें कहे कोई ब्रह्ममें लागिकै कोई नाना
देवतनमें लागिकै कोई नाना मतनमें लागिकै बिशेषते बिनशि रहे है साहब
को नहीं जानै हैं सो कबीरजी कहै हैं ऐसा जियरा कहे रामोपासक सन्त कोई
न मिला जासों लागि रहे अर्थात् सत् सङ्ग करौं कहे जे साहब को नहीं जानैं
ते बिनशि जायहैं तामें प्रमाण ॥ “यश्चरामनपश्येतयं चरामो न पश्यति ॥ निंदितः
सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनंविगर्हते ॥ २८५ ॥
सपने सोया मानवा, खोलि देखै जो नैन ॥
जीव परा बहु लूटमें, ना कछु लेन न देन ॥ २८६ ॥
जो मानुष अपनी आँखि खोलिकै देखै तो सब स्वप्नै है यह जीव बहुत
लूटमें पर्यो है नाना मतनमें नाना उपासननमें लग्यो है साहब को नहीं जानै
ताते न कछु लेन है न देन है यांते या आयो कि इनमें बृथै लागे हैं मुक्ति
काहूकी दई नहीं दैजायहै या सब स्वप्न है तामें प्रमाण गोरख गोष्ठीकों
कबीरजी को गोरख पूंछै हैं ॥
कर्ताकौ स्वरूप कौन! अण्डका स्वरूप कौन! अण्ड पार बसै कौन? नादबिन्दुयोग
कौन ? जीव ईश्वर भोग कौन ? भूमी अवतार कौन ? निराकार पार कौन ?
पाप पुण्य करै कौन ? वेद औ वेदान्त कौन ? बाचा औ अबाचा कौन ?
चंद्र सूर्य भास कौन ? पश्चमें प्रपंच कौन ? ओहं औ सोहं कौन ? स्वर्ग नरक