कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६२८ ) बीजक कबीरदास ।
गुरुके बताये साधनसीढ़ीमें चढ़ो फिर उतरि और और साधनमें लगो राम
नामते बिमुख द्वैगयो ताको कालनरकमें घसीटिकै डारिही देइगो कोई नहीं
राखिसकैगो ॥ २७७ ॥
आगि जो लगी समुद्रमें; जरै सो कांदौ झारि ॥
पूरब पश्चिम पण्डिता, मुये बिचारि बिचारि ॥२७८॥
या संसार समुद्रमें अज्ञानरूपी अग्नि लगीहै सोपूरंबपश्चिमके पंडित कहे
उदय अस्तके पण्डित बिचारि बिचारिमरे परंतु अज्ञान रूपी अग्नि न बुतानि
उपासना करिकै ज्ञानहू करिकै संसार समुद्र सूखि हू गयो परंतुबामूल अज्ञानरूप
कांदौमें फँसेजरे जायहैं ॥ २७८ ॥
जो मोहिं जानै त्यहिमैं जानौं।लोक वेदका कहा न मानौं ॥
भूमुरघाम सबै घटमाहीं।सबकोउबसै शोककी छाहीं २७९॥
गुरुमुख ।
अज्ञानरूपी घामते अंतःकरणरूपी भूमि सबकै तपिंरही है शोकरूपीजें
नाना उपासना तिनकी छाया चाहै है परंतु वहीते और तप्त होयहै शीतल नहीं
होइहै सो मोको तो जानतही नहीं हैं मैं वाको काहेको जानौं जो कोई मोको
जानै तौ मैं वाको जानौं जानबही करौं लोकवेदतो कहतही है कि जो जाको
है सो ताहूको जनै है सो या लोक वेदको कहा मानबहीकरों अथवा कैसो पापी
होइ जो मेरी शरण आवै तौ मैं लोक वेदका कहा न मानूं वाको शरणमें राख
बई करौं वाके सम्पूर्ण पापमैंहौं छुड़ाय देउँ तामें प्रमाण ॥ “ सकृदेव प्रपन्नाय
तवास्मीति च याचते ॥ अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतमम ” ॥ २७९ ॥
जौन मिलासो गुरुमिला, चेलामिला न कोइ ॥
छहउलाखछानबे रमैनी, एकजीव परहोइ ॥ २८० ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि एकजीवके उपदेशपर मैं छः लाखछानबे रमैनी
युगयुग कह्यो पै मेरो कह्यो कोई न समझ्यो जो मिलो सो गुरुही मिलो चेला
कोई न मिलो जो मेरो कह्यो बूझै साहबको जानै संसारतें छूटै छानबे रमैनी में
प्रमाण ॥ “ सहसछानबे और छःलाखा ॥ युगपरमाण रमैनी भाखा॥२८०॥