कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ६२५ )
यकसाधे सबसाधिया, सबसाधे यकजाय ॥
उलटिजो सींचै मूलको, फूलै फलै अघाय ॥ २६७ ॥
एक जो साहबकी भक्तिहै ताके साधे सब सधिजायहै अर्थात् लोकौ परलोक
बनिजायहै और सब साधेते अर्थात् नानामतनमें लागते एक जो साहबकी भक्ति
सो जातरहै है औ ऊपरते वृक्षके जलमें डारिराखै तौ पत्ता फूलफल सरिजायहैं
औ जो वृक्ष को मूलते सींचै तौ फूलैफलै अघायकै ऐसे सबके मूल साहबहैं
तिनकी भक्ति कीन्हे सब फूलैफलै है दूसरेकी चाह नहीं रहिजायहै दूसरे की
उपासना में संसार नहीं छूटै है ॥ २६७ ॥
जेहि वन सिंह न संचरै, पक्षी नहिं उड़िजाय ॥
सोबन कबीरन हीठिया, शून्यसमाधि लगाय ॥२६८॥
जेहि बाणी रूप बनमें कहे जेहि बाणीतें ब्रह्म ज्ञानौ कथै है तौनी बाणीमें
सिंहजे हैं शुद्धजीव साहबके जाननवारे ते नहीं संचरै हैं कहे नहीं जायहैं औ
पक्षी जे हैं नानामतवारे नानाशास्त्रवारे ते अपने अपने पक्षकारि ब्रह्मको बिचा-
रकरै हैं उड़ै हैं पार कोई नहीं पावै हैं सो तौने बनको कबीर जे हैं जीव सोहीं
ठिया कहे हीठत भयो वही शून्य समाधि लगायकै साहबकी प्राप्ति न भई
तामें प्रमाण चौरासी अङ्गकी साखी ॥ “ शून्य महलमें सुन्दरी, रही अकेले
सोइ । पीउ मिल्यो ना सुखभयो, चली निराशा रोइ ” ॥ २६८ ॥
बोली एकअमोलहै, जो कोइ बोलै जानि ॥
हिये तराजू तौलिकै, तब मुख बाहर आनि ॥ २६९ ॥
सो वे शून्य समाधि लगायकै शून्य ब्रह्ममें जायहैं तिनकों कहि आये अब
ज्ञान करिकै जे ब्रह्ममें लीनहैं तिनको कहै हैं कि वह बोली सोहं अमोल
ताको जो कोई जानिकै हियेके तराजूमें तौलिकै मुखके बाहर लैआइकै बोलै
कहे श्वास श्वासमें यही जपै जातमैं सो आवत में हृदय तराजूमें यँही तौलै
कि सो पारषदरूप हंस साहब को है ॥ २६९ ॥
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