कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६३६ ) बीजक कबीरदास ।
पूरासाहब सेइये, सबविधि पूरा होइ ॥
ओछे नेह लगाइये, मूलौआवै खोइ ॥ ३०५ ॥
पूरा साहब जे सर्वत्र पूर्ण हैं तिनको जो सेइये तौ सबविधि पूरोहोइ
औ ओछे जेहैं नानामत धोखा तौने में जो लगाइये तो नफाकी कौनचालै मू-
लौकी हानिहैजाय है ॥ ३०५ ॥
जाहुबैद्य घरआपने, बात न पूछै कोइ ॥
जिन यहभार लदाइया, निरबाहै वा सोइ ॥ ३०६ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि हे बैद्य ! गुरुवालोगौ तुम अपने घरको जाहु तुमकों
बात कोई नहीं पूछै है जिन यह संसाररूपी भारलदाया है कहे संसार उत्पत्ति
कियाहै तौने निर्बाहैगा अर्थात् न निर्बाहैगा येतो सबमायिकहैं अधिक बाँधनेवारें
हैं छुड़ावनेवारे नहीं हैं ॥ ३०६ ॥
औरनके समुझावते मुखमें परिगो रेत ॥
राशि बिरानी राखते, खाये घरको खेत ॥ ३०७ ॥
औरेनको उपदेश करत करत तुम्हारे मुखमें रेत कहे धूरिपरिगई अर्थात्
कुछ न तुमसों बनिपर्चो बिरानी राशि तो तुम राखतेहौ कहे औरे औरेकों
उपदेश करिकै समुझावतेहौ आपने घरको खेत जो स्वरूप ताको नहीं ताकतेहौ
काल खाये लेइहै सो तुम्हारो स्वरूपखेततौ ताको नहीं रहे औरकी राशिकहें
आत्मा तुमकैसे ताकौगे ॥ ३०७ ॥
मैं चितवतहौं तोहिंको, तुम कह चितवै और ॥
नालत ऐसे चित्तको, चित्त एक दुइ ठौर ॥ ३०८ ॥
गुरुमुख ।
साहब जीवसों कहै हैं कि मैं तो तेरी ओर चितवै हौं सदा सन्मुख बनेरहौं
हौं औ तू कहा और और में चित्त लगावै है सो ऐसे तेरे चित्तकों नालति है
कि एक आपने चित्तकों माया में औ ब्रह्ममें दुइठौर लगाये है ॥ ३०८ ॥