कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६४० ) बीजक कबीरदास ।
मरतेमरते जगमुवा, बहुरि न किया बिचार ॥
एकसयानी आपनी, परबशमुवा संसार ॥ ३२० ॥
मरत मरत सबजग मरिगया औ मरत चलोजायहै पै बहुरि कै कहे उल-
टिकै कोई न बिचार कियो कि काहेते मरे जाय हैं अपनी अपनी सयानी तें
एकएक खाविन्द खोजि लियो साहब को न जान्यो जे जीवके मालिक हैं तेहिते
काल के बशह्वै सब मरे जायँ हैं ॥ ३२० ॥
पैठाहै घर भीतरै, बैठाहै साचेत ॥
जब जैसी गति चाहता, तब तैसीमति देत ॥ ३२१ ॥
साहब जो है सो सब के घटमें पैठाहै औ साचेत बैठाहै जब जैसी गति
जीवचाहै है तबतैसीमति जीवको देइहै जीव अणुचैतन्य है साहब विभुचैतन्यहैं
सो जीव जौनेकर्मको सम्मुख होइहै तब चैतन्यता बढाय देइहै तैसेमति बढ़ाय
देइहै औ बिना साहब के समर्थ जीव कछुनहीं करिसकै तामें प्रमाण ॥ "कर्तृ-
त्वं करणत्वं च स्वभावश्चेतनाधृतिः ॥ यत्प्रसादादिमे संति न संति यदुपेक्षया॥
इतिश्रुतेः " ॥ ३२१ ॥
बोलतहीपहिंचानिये, चोरशाहुके घाट ॥
अंतरकी करणी सबै, निकसै मुखकी बाट ॥ ३२२ ॥
जे साहब में लगै हैं ते औ जे धोखाब्रह्म में लगे हैं ते इनको कैसे पहिंचानि-
ये तौ उनके बोलते अन्तरकी करणी मुखकी बाट निकसै है तबहीं चोर शाहु
पहिंचाने परै हैं इहां चोर जो कह्यो सो यह जीव साहबको है तिनको चोराइकै
कहे छोड़िकै धोखामें लग्यो ताते चोरकह्यो है तामें प्रमाण ॥ " नारिकहावैपी-
उकी, रहै और सँग सोइ॥ जारपुरुष हिरदे बसै, खसमखुशीक्योंहोइ"॥३२२॥
दिलकामहरमकोइनमिलिया, जो मिलियासोगरजी ॥
कहकबीरअसमानैफाटा, क्योंकरिसीवै दरजी॥३२३॥
मन दिलका महरमी कहे निःकामह्वै साहब में लगैया कोई न मिल्यो जो
मिल्यो सो गरजवाला मिल्यो ताको तेतनै मँजूरी दै कै साहब अनृण है जाय हैं