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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 639

साखी। (६०१)
मानुष तेरा गुण बड़ा, मास न आवै काज ॥
हाड़ न होते आभरण; त्वचा न बाजन बाज ॥१९५॥
: हे मानुष! जो तैं देहको अभिमान करै है सो नाहक करै है यह देह तेरी
कौने कामकी है तेरो मांस काम नहीं आवै कोई नहीं खायहै हाड़नके आभरण
नहीं होते हैं त्वचाके बाजन नहीं बाजते हैं सो तेरे एकगुण है या देहते साहब
मिलते हैं सो मिलिबे की यतन करु ॥ १९५ ॥
जौलंगि ढोला तवलगि बोला, तौलंगि धनव्यवहार ॥
ढोलाफूटाधनगया, कोई न झांकै द्वार ॥ १९६ ॥
सबकी उतपति धरणिमें, सब जीवन प्रतिपाल ॥
धरती न जानै आपगुण, ऐसा गुरुदयाल ॥ १९७॥
एकको अर्थ प्रकटै हैं एकको कहैं हैं दुःखसुख नीकनागा सबकी उत्पत्ति
धरतीहीते है कहे शरीरहीते है जौने ज्ञानते सब जीवनको प्रतिपाल है ऐसें
ज्ञानको तू जान अपने गुणको धरती जो शरीर ताको न मानु ते पांचो शरीर
दै बाहिरे हैं ऐसे गुरु दयालुहैं साहब छुड़ावन वारे ताको जानु तैं अंशहै साहब
अंशी हैं ॥ १९६ ॥ १९७ ॥
धरती जानतआपगुण, तौ कधी न होतअडोल ॥
तिलतिलहोतोगारुवा, ह्वैरहत ठिकौकीमोल ॥१९८॥
धरती जो शरीर ताके धरैया जो जीव धरती सो आपनो गुण नहीं जानत
कि मोमें साहबकी प्राप्ति होयबो यही गुणह उत्पत्ति जो करौहै सो साहबकी
शक्तिते मेरीशक्ति नहीं है तौ कधी डोल न होतो अर्थात मनादिकनको उत्पत्ति
करि संसारी न होतो शुद्धै बनो रहतो धरती जीव आपनो गुण कहा जानै जो
आपनोगुण साहबको प्राप्त होइबो जानतै । ता तिल तिलमें गरुई होतजातो कहै
तिलतिल वह ज्ञान बढ़तौ औ ठीक जो है शुद्ध साहबके जनैया जीवात्मा ताकें
मोल है जातो कहै यहै अमर है जातो जे साहबसों मेल किये रहै हैं शरीरहू