कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरकैरहै औ बहै साउज जो है जीव सो शरीरनको पायके आधिदैविक आधिभौतिक
आध्यात्मिक जे तीनों तापहैं तेई घाम हैं तिनहींमें जरै है सो हे पण्डित तुम
बिचारकरिकै असारको त्यागकरायकै सार जे साहब श्रीरामचन्द्रहैं तिनकोबता
ओ तौ तीनों तापते जीव छूटै ॥ १९१ ॥
पायँन पुहुमी नापते, दरिया करते फाल ॥
हाथन परबत तौलते, तेहि धरि खायो काल॥ १९२॥
जे हाथनते पर्वत तौलते रहे औ पायँनते पुहुमी नापते रहे औ समुद्रको
एकफाल करते रहे हिरण्याक्षादिक तिनहूँको काल धरि खायो ॥ १९२ ॥
नव मन दूध बटोरिकै, टिपका किया विनाश ॥
दूध फाटि कांजी हुआ, भया घीव का नाश ॥१९३॥
नवमन कहे नवीन नवीन जामें होते आये मन ऐसो कै तौ देह धरे अब
यहदूध मनुष्यशरीर पायो सो कांजीका टिपका जो धोखाब्रह्ममें लागिवो तोव
दूध जो मनुष्य शरीर सो कांजी भया कहे पशुतुल्य भया घीवजो साहबकोज्ञान
रहै ताको नाशहै गयो ।
अथवा—ऊपरकी साखीमें बड़ेबड़े पराक्रमीको कालखाइ जाइ है ते कहि
आये हैं। अब या साखीमें कहैं हैं हे दूध जीव ! तैं या शरीरको अभिमान
करिके कहा नाना विषयन कहे मतनमें लागि गये । सो हे दूधजीव ! तैं
कहा नौ मनको बटोरचो, अर्थात् नौ कहिय नवीन मन कहिये जनकी मानी हुई
मनते तैं नाना प्रकारके नवीन मतनको गुरुवनते सुनिके वाहीमें लगिके मन
जो है कांजीकाटिपका (बिन्दु) ताको आश्रय कर्योपर वही मुझको मारि
डारचो अपने में मिलायलियो तूहू मनमें मिलिके मन ह्वै गयो । ताते जौने
मनमें साहबको मिलनकी शक्ति होती घीवसो नाश ह्वै गई। सो आगे तैं शुद्धरहै
स्वच्छ रहे तेरो संग कियो सब जीव सुधरि जाते रहे हैं अर्थात् शुद्धरूप
आपनो जानिके जीव साहबको होते रहे हैं सो तोको गुरुवालोग नाना मतनमें
लगायके कांजी (पानी) बनाई डारयो । अथवा जो छाछको घास खेतनमें
डारिदेई तौ घास जरि जाइ है तैसे तेरो संगकरिके जीव जरि जाइहै कहे