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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 642, कुल 766 में से

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पृष्ठ 642

( ६०४ ) बीजक कबीरदास ।
अरै और औरै मतनमें जो लगेहै तिनमें न लागु बिरानी आशा छोड़िदें
तैं काहूके छुड़ायें न छूटैगो अपनी बहियांको बल करु तेरे उद्धार करिबेकों
तेरी बंहियां श्रीरामचन्द्रहैं सो आगे कहिआये हैं कि मोटे की बाँहले औ जाकें
आँगन में नदिया है सो का पिआसन मरै है तेरा तो साहब ऐसो रक्षकबनोहै तैं
काहे साहब को भूलि औरै औरे मतनमें लगे है ॥ २०६ ॥
बहु बन्धनते बाँधिया, एक बिचारा जीव ॥
का बल छूटै आपने, जो न छुड़ावै पीव ॥ २०७ ॥
कबीरजी कहै हैं कि ये बिचारे जीव तें बहुत बंधन ते बंध्यो है बहुत
गरीबहैं सो जो तैं आपने बिचारते छूटा चाहै तौ तैं न छूटैगो बिना श्रीराम-
चन्द्रके छोड़ाये वोई तेरे पीउ हैं उनकी या प्रतिज्ञा है कि जो एकहू बार
मोको जीव गोहरावै तौ मैं वाको छुड़ाय लेवहौं ताते तैं साहबकी शरण जाय
जाते संसार ते छूटि जाय जे साहबकी शरण जाय हैं ते कालहूके माथ पै लात
दै चले जाय हैं तामें प्रमाण श्रीकबीरजीको ॥
कालके माथे पग धरी; सतगुरुके उपदेश ।
साहब अङ्क पसारिकै, लैगे अपने देश ॥ १ ॥
गगन मँडल दृग महलमें, द्वे घाटीके ईश ।
नाम लेत हंसा चले, काल नबावै शीश ॥ २ ॥
औ जे राम नाम नहीं लेइ हैं ते नहीं मुक्त होय हैं तामें प्रमाण ।
यहि औतार चेतो नहीं, पशु ज्यों पाली देह ।
रामनाम जान्यो नहीं, अन्त परा मुख खेह ॥ २०७ ॥
जिवमति मारहु बापुरा, सबका एकै प्राण ॥
हत्या कबहुँ न छूटि है, कोटि न सुनै पुराण ॥२०८॥
जीव घात ना कीजिये, बहुरिलेत वह कान ॥
तीरथ गये न बाचिहौ, कोटि हिरादे दान ॥ २०९॥