कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 641, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाखी। ( ६०३ )
नाम न जाने ग्रामको, भूला मारग जाय ॥
काल गड़ेगा कांटवा, अगमन कस न खोराय ॥२०२॥
अरे साहबके तो नगरको नामही नहीं जाने है और मतन मारगमें काहे भूला
जायहै यह काल रूप कांटा तेरें गड़ेगा काल तोकों मारि डारैगा तेहिते अगमन
कहे आगे वह खोरिकहे राहमें आवै जेहिते कालते बचिजाय ॥ २०२ ॥
संगति की जै साधुकी, हरै और की व्याधि ॥
ओछी संगति क्रूरकी, आठौ पहर उपाधि ॥ २०३ ॥
जो साधुकी संगति करिये जे साहबकों जनाय देनवारे हैं तौ साहबको
जानिकै औरकी ब्याधि हरै औजो क्रूर जे असाधु तिन की संगति करै तौ
आठौ पहर उपाधिही लगी रहै है ॥ २०३ ॥
जैसी लागी औरकौ, तैसी निबहै थोरि ॥
कौड़ी कौड़ी जोरिकै, पूज्यो लक्ष करोरी ॥ २०४ ॥
और ते जो थोरहूथोर साहबमें लगे भक्ति करै औ तैसे छोरलों निबहिजा
यहै तो जो थोरऊ थोर साहबमें लगे औ साहबकी भक्तिकैरै तौ जैसे कौड़ी
कौड़ी जोरे केतो करोरि है जायहै ऐसे वाकी भक्ति हू हैजायहै अनेक जन्मकी
संसिद्धिते मुक्तहै जायहै ॥ २०४ ॥
आजु काल्हि दिन एकमें, अस्थिर नहीं शरीर ॥
केते दिनों राखिहौ, काचे बासन नीर ॥ २०५ ॥
आजु काल्हि यहि कलिकालमें एको दिनमें शरीर स्थिर नहीं है केतनीबेरधौं
शरीर छूटिजाय आगे तो प्रमाण रह्यो है कि येती आयुर्दाय मनुष्यकी है
अबतो कछू प्रमाणै नहीं है केती बेर शरीर छूटिजाय तेहिते साहब को भजन
करो कच्चे बासन शरीरमें केते दिन नीर राखौगे ॥ २०५ ॥
करु बहियां बल अपनी, छाडुबिरानी आस ॥
जाके आंगन नदी बहै, सो कस मरै पिआस ॥२०६॥