कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( १२ ) बीजक कबीरदास ।
दोहा-जबअक्षरकेंनींदगई, दबीसुरतिनिर्वान ॥
श्यामवरणयकअण्डहै, सोजलमेंउतरान ॥ १२ ॥
योगमाया में सोय रहे अक्षर कहे नाशरहित जे नारायण तिनकों जब
योगमाया जगायो नींद गई तब उनको निर्वाण सुरति देत भई । काहेते
ई जे हैं नारायण तिनको निर्वाण रूप कहे निराकार रूप कैकै अंतर्यामी
रूपते सबके भीतरदबाइ देत भई अर्थात् चेष्टारहित दिव्यगुणविशिष्ट सर्व्वत्र-
व्यापक अंतर्यामी तत्त्वरूप जे निर्वाण नारायण तिनको सबके अन्तर दबाइ
देत भई कहे सबके अन्तर्यामी करि देत भई तेई प्रकट होतभये । श्यामवर्ण
अण्ड कहे चतुर्भुज रूप धारण करिकै जल में उतरान कहे जल में रहतभये । सो
इनके शरीरमें शरीर जे हैं निराकार नारायण तिनको नित्य सम्बन्ध होतभयो ।
सो रकारमें जोहै अकार ताको नारायण अर्थ करत भये औ भरतबाची जो
है अकार सो अर्थ न समुझत भयें यहां चौथे ब्रह्म की प्राकथ्य भई ॥ १२ ॥
दोहा-अक्षरघटमेंऊपजै, व्याकुलसंशयशूल ॥
किनअण्डानिरमाइया, कहाअण्डकामूल ॥१३॥
अक्षर जे नारायण हैं तिनके घटते ऊपजे अर्थात् तिनकी नाभि में कमल
होइ है तेहिते ब्रह्मा होइहै ते ब्रह्मा सब जगत् करै हैं तब समष्टि जीव शुद्ध तें
अशुद्ध है कै ब्रह्मा ते उत्पन्न हैकै बहुत शरीरधारण करैहैं ते ब्रह्म जब उत्प-
न्नभये तब ब्याकुलभये औ संशय करतभये कि कहां अण्डका मूलहै औ को
अंडाको बनायो है औ हम कहांते उत्पन्नभये हैं सो खोज्यो खोजे ना पायो
तब तपस्या करत भयो तब नारायण प्रकटभये ते ब्रह्मा ते कह्यो कि तुम
जगत् की उत्पत्ति करौ यहकथा पुराण में प्रसिद्धहै ॥ १३ ॥
दोहा-तेही अण्डके मुख पर, लगी शब्दकी छाप ॥
अक्षरदृष्टिसे फूटिया, दश द्वारे कढ़िबाप ॥ १४ ॥
तैने ब्रह्मरूपी अण्डके मुखपर शब्दकी छाप लगी अर्थात् शब्द ब्रह्म जो
वेदसार ताको नारायण बताय दियो । तौने को ब्रह्म जपत भये तब वाहीतें
आदिमंगल। ( १३ )
प्रकटे जे चारोंवेद ते ब्रह्मा के चारिउ मुखतें निकसतभये। तौने वेदनकों अक्षर
जो समष्टि जीव है सो जगतमुख दृष्टि कियो अर्थात् जगत्मुख अर्थ देख्यो
तब द्वारे ह्वैकै “ वह मायाते सबलित जो है ब्रह्म जाको आगे बाप कहि आये
हैं जों शुद्धतें अशुद्ध जीवन को कैकै उत्पन्न करै है ” सो दश द्वारेते कहे
दशौ इन्द्रिनतें कढ़त भये। तब इन्द्रिन के विषय ह्वैकै इन्द्री ह्वैकै चिदंश ह्वैकै
चिदचिदात्मक जगत् होत भयो अर्थात् वेदन को अर्थ जब जगतमुख देख्यो तब
वह जीव चिदचिदात्मक जगत्को धोखा ब्रह्मही देखत भयो । सो जगत् तौ
साहब के लोक प्रकाश को शरीरहै, तौने को वेदार्थ करिकै धोखा ब्रह्मही
देखत भयो यही धोखा है तात्पर्य कैकै वेद जो साहब को कहै है ताको न जानत
भये। लघु रकार की अकार ते नारायण भये तिनते ब्रह्मा की उत्पत्ति भई
सो कहि आये। अरु बहि ते जेतो जगत् के उत्पन्न को प्रयोजन रह्यो सो
कहि गये । अब फेरि सिंहावलोकन करिकै पंचम ब्रह्म की प्राकट्य कहैहैं ॥ १४॥
दोहा—तेहिते ज्योति निरंजन, प्रकटे रूप निधान ॥
काल अपरबल बीरभा, तीन लोक परधान॥१५॥
तेहिते कहे वही रामनामतें व्यञ्जन मकारको जो अर्थकरि आये हैं तामें
जो अकार रही है ताको महाविष्णु अर्थ करतभये। जे विरजा के पार पर
बैकुण्ठ में रहे हैं। जिनके अंशते रमा बैकुण्ठवासी भगवान् भये हैं । सो
अंजन जो अविद्या माया ताते वे रहित हैं काहेते कि, अविद्या माया विरजा-
के यही पार भर बनतहै। पै पुराणादिक में सो व्यञ्जन मकार की अकार-
को महाविष्णु अर्थ करत भये, औ वह अकार शत्रुघ्नबाचक है सो अर्थ न स-
मुझत भये। ते अकाररूप महाविष्णु ते महाकाल अपरबल बीरभा कहे जे-
हिते प्रबल बीर कोई नहीं है अथवा अकार जे विष्णुहैं तेई हैं परमबल जि-
नके सो तीनलोक में प्रधान होत भयो । इहाँपाँचों ब्रह्मकी प्राकट्य
ह्वैगई ॥ १५ ॥
दोहा—ताते तीनों देवभे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
चारि खानि तिन सिरजिया,मायाके उपदेश॥१६॥
( १४ ) बीजक कबीरदास ।
तौने कालते कहे वही कालमें काल पाइकै एकएक ब्रह्माण्डमें तीनतीन
देवता ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पन्नहोतभये सो कोटिन ब्रह्माण्डनमें कोटिन ब्रह्मा-
दिक भये तैं माया के उपदेश ते कहे मायाको ग्रहणकरिकै संसारमें चारि-
खानि जे जीव हैं तिन को सिरजिया कहे उत्पत्ति करतभये सो उत्पत्तिको
क्रम ब्रह्मोते पहिले कहिआये हैं ॥ १६ ॥
दोहा-चारिवेद षट्शास्त्रऊ, औ दशअष्ट पुरान ॥
आशा दै जग बाँधिया, तीनों लोक भुलान॥ १७॥
चारोंवेद, छवोंशास्त्र औ अठारहौ पुराणमें मायाजो है सो औरई और
फलकी आशा बताइकै औरई और नाना मतन में लगाइदियो और संपूर्ण
जगत् मुख अर्थकरिकै जगत्को बांधिलियों । साहबको भुलाय दियो ये सब
तात्पर्य कैकै साहबको कहैहैं सोसाहबकों न जानन पाये । ताते तीनों लोकके
जीव भुलायगये ॥ १७ ॥
दोहा-लखचौरासी धारमा, तहां जीव दियवास ॥
चौदह यम रखवारी, चारिवेद विश्वास ॥ १८ ॥
चौरासीलाख जो योनिहैं सोईहैं धारा ताहीमें जीवको बास देतभये
कहेवही चौरासीलाख योनिरूपी धारामें सबजीव बहे जाइहैं अर्थात्
नानारूप धारण करैहैं सो चारिवेदके विश्वासते कहे चारिवेदके मतते
नानामतहोतभये ॥ “ शतिलेत्वंजगन्माता शतिलेत्वंजगत्पिता ॥ ” इत्यादिक
नानादेवतनकी उपासनागुरुवालोग बतावत भये । वेद जो तात्पर्य्यकरिकै बतावै
है साहब को सो अर्थ न जानतभैये। औ चौदह यम जीवकी रखवारी करत भये
यहजीव निकसिकै साहबके पास न जानपाये। चौदह यमके नाममें प्रमाण ज्ञान-
सागरको॥ दुर्गदचित्रगुप्तबरियारा । ईतोयमके हैं सरदारा ॥ मनसा मल्लअपरबल
मोहा। कामसैनमकरन्दी सोहा॥चितचंचल औ अंधअचेता। मृतकअंधजोजीतेखेता ॥
सूर सिंह औरो क्रमरेखा । भावीतेजकालकापेखा ॥ अघनिद्रा औ क्रोधितअंधा ।
जेहिमाजीवजंतुसबबंधा ॥ परमेश्वर परबल धर्मराजा । पाप पुण्यसबते अळछा-
जा ॥ यह सब यमै निरंजनकीन्हा । लिखनीकागदरचिकै दीन्हा ॥ १ ॥ ”
आदिमंगल । ( १६ )
अर्थ-“प्रथम दुर्गंद कहैं हैं दुर्गकहावै कि जो कोई पुण्यकरैहै ताको स्वर्गदैके
पुण्यभोग करावैहै औ जो पापकरैहै तिनको नरकनमें पापको भुगताइकै किला-
रूपी जो है शरीर सो जीवकोदेयहै याते दुर्गद यम एक १ औ दूसर चित्रगुप्त
जे कर्मनके लेखाकरैहैं २ तीसर मलिनमन ३ औ चौथ मोह ४ औपांचौ काम काल-
की सेनाका मकरन्दीकहे बसंतते सहित ५ औछठौ अंधअचेत जोहै चित्त सो
६ औ सातौ मृत्यु भई जोखेतको जीतहै कहैसबको मारैहै ७ औ आठौंसूरकहे
अंधा अर्थात् अशुभकर्मकी रेखा ८ औ नवौ सिंहकहे समर्थ शुभकर्मकी रेखा ९
औ दशौ यमभावी जो कालको पेखाहै कहे जो कर्म होनहारहै सो काल करिकै
होइहै अर्थात् कालकी अपेक्षा राखैहै १० औ ग्यारहौ अघकहे पापरूपनिद्रा ११
औबारहौ अंधको देनवारो क्रोध जामें सबजीव जंतु बंधेहैं १२ तेरहौ प्रबल परमेश्वर
रमाबैकु
( १६ ) बीजक कबीरदास ।
रामनाममें छामात्रा है तामें प्रमाण ॥ रामनाममहाविन्ध्ये षड्भिर्वस्तुभिरावृत-
म् ॥ जीवब्रह्ममहानद्यैस्त्रिभिरन्यंवदामितं ॥ स्वरेणार्धमात्रेणदिव्ययामाययापिच
॥ इतिमहारामायणे ॥ और रामनामको जो अर्थ भूलिगये हैं तामें प्रमाण
सब मुनिन को भ्रमभयो श्रुतिनको प्रमाणदै कोई कहै हमारोमत ठीक है
कोई कहै हमारो मत ठीक है । तब सब मुनि वेदन ते पूछयो जाइ । वेदहू
विचारेउ कि सबमें तौ हमारही प्रमाण मिलैहै सोवेदहूको भ्रमभयो । तब
सबमुनि औ वेद ब्रह्माके पासगये । तबब्रह्मा ते पूंछयो तब ब्रह्मौके भ्रमभयों
कि, साँच मत साँच साहब कौन है । सो महादेवजी पार्वती जी ते कहै हैं
कि, तब सबकोई साहब श्रीरामचन्द्रको ध्यान कियो तब साहब कह्यो कि
यह बात सबके आचार्य जे संकर्षण है ते जानैहैं तिनके पास सबको पैठे
देहुवे समझाय देयँगे । तब ब्रह्मा की आज्ञाते सब संकर्षण रूप
शेषके इहांगये सो वेद उहां पूंछयो, संकर्षण ते, तब संकर्षण जी एक सि-
द्धांत जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिनको बतायो है राम नाम को यथार्थ अर्थ
तौन सदाशिवसंहिता के ये श्लोक हैं ॥
“ रामनाम्नोऽथमुख्योऽथभगवत्स्वेतप्रतिष्ठितम् ॥ विस्मृतंकंठमणिवद्वेदाश्रृणुततत्त्व
तः १ तात्पर्य्यवृत्त्याविज्ञेय बोधयामिविभागः ॥ रामनाम्निशुचिर्ज्ञेयाः षण्मात्रांत
त्त्वबोधकाः २ रामनाम्निस्थितोरेफो जानकीतेनकथ्यते ॥ रकारेणतुविज्ञेयः श्रीरामः
पुरुषोत्तमः ३ आकारेणतथाज्ञेयोभरतोविश्वपालकः ॥ व्यंजनेनमकारेण लक्ष्मणो
ऽत्रनिगद्यते ४ ह्रस्वाकारेणनिगमाःशत्रुघ्नःसमुदाहृतः ॥ मकारार्थोद्विधाज्ञेयःसानु-
नासिकभेदतः ५ प्रोच्यतेतेनहंसौवैजीवाश्चैतन्यावग्रहाः ॥ संसारसागरोत्तीर्णापुनरावृ
त्तिवर्जिताः ६ दास्याधिकारिणःसर्वेश्रीरामस्यमहात्मनः ॥ एतत्तात्पर्यमुख्यार्थाद-
न्यार्थोयोनभूपते ७ सोऽनर्थइतिविज्ञेयःसंसारप्राप्तिहेतुकः ॥ इतिसदाशिवसंहितायां-
विंशाध्यायेवेदान्प्रतिशेषवचनम् ॥ सो जौननाम साहब बतायो ताके औरई औ-
रअर्थकरिकै जीव संसारीहैगयेसाहबकोनजान्यो ॥ १९ ॥
दोहा—तेहि पाछे हम आइया, सत्य शब्द के हेत ॥
आदिअन्तकीउतपति, सोतुमसोंकहिदेत ॥ २० ॥
आदिमंगल ! ( १७ )
इहां कबीर जी, कहै हैं कि तेहिंपीछे कहे जब संसारकी उत्पत्ति हैगई औ
जीव नाना दुःख पावन लगे तब साहिब जे दयालुहैं तिनके दयाभई कि हमतें
अपने नामको उपदेशकियो कि हमारे रामनाम को जो यह अर्थ लक्षमण जान-
की हम भरत शत्रुघ्न हमारे हंसरूप पार्षद तिनको जानिकै हमारेपास आवै औयें
सबजीव संकर्षण आद्यापराशक्ति शब्दब्रह्म नारायण महाविष्णु जीव इनके पक्षमें
रामनामकी छवोमात्रा लगाइकै औरे औरे मतनमें लगिके संसारी है कै
नानादुःख पावन लगे । तब रामनाम को यथार्थ अर्थ बतावनको हमको भेज्यो
सो हम सारशब्द जो है रामनाम ताको सत्यकहे सांच जो अर्थहै ताके बताव-
नके हेतु आये सो आदि अंतकी उत्पत्ति हम तुमसे कहे देयहैं । आदिकौन
है जोयह उत्पत्ति है आई संसारभयो औअंतकौन है जो हम रामनामको सांच-
अर्थ बतायो सो अर्थ समुझिलेइ साहबके पासजाय वाको संसारको अंत हेजाइ
है । फिरि संसारमें नहीं आवैहै । सो यह आदिअंतकी उत्पत्ति हमतुम सों
कहिदियो किं यहिभांतिते जगत्की उत्पत्ति होयहै जीवसंसारी होइहैं औयहि
भांतिते जब रामनामको सांचअर्थ जानै है तब संसारको अंत है जाइहै ॥२०॥
दोहा-सात सुरति सब मूलहै, प्रलयहु इनहीं माहिं ॥
इनहीं मासे ऊपजै, इनहीं माहिं समाहिं ॥ २१ ॥
इहांमंगलको उपसंहारकरैहै सबकीमूल सातसुरतिजे प्रथम वर्णन करि आयेहैं
सो वेतो सोई सुरति स्थूलरूप सात रूपते प्रकटभईहै सातकौनहै; दुइच्छा एक-
योगमाया एकजगत्को अंकुरकारणरूपा औ पांचौंब्रह्मरूपा येई सातौसबकेमूलहैं
इनहीँते उपजैँहैं इनहीं ते प्रलय हैजायहै कहे नाशह्वैहै जायहै औ इनहींमें पुनि-
समाइहै सातो सूरतिमें प्रमाण साखी शंकरगुष्टकी ॥ “निरंजनअक्षर अचित
दोहंसोहंजान ॥ औपुनिमूलअँकूरकहि सात सूरति परमान” ॥ २१ ॥
दोहा-सोई ख्याल समरथ कर, रहेसो अछप छपाइ ॥
सोई संधिलै आयउ, सोवत जगहि जगाइ ॥ २२ ॥
सो समष्टिजीव अपनेको समर्थ मानिकै साहबको न जानि कै यह ख्याल
करतभयो अछपकहे रामनामके अर्थमें साहब न छपे रहे औ संर्वत्र पूर्णरहे सा-
( १८ ) बीजक कबीरदास ।
हबके सब सामग्री साहबको लोक साहिबैको रूपवर्णन करि आये हैं । जो साहब-
के लोकको प्रकाश सर्वत्र पूर्णरहा तैसाहब पूर्णईरहे सर्वत्र सो जीव
रामनाम को और और अर्थ करिकै और और मतनमें लग्यो तेहिते साहब
छपायगये साहबको जीव न जानतभये । सो तौनै संधिलेकै मैं आयों कि
जीवते "संधि कहे बीच" परिगयो है, रामनाम को सांच अर्थ भूलिगयो
सो जौने संसारमें यह सोवै है तौनी जगह में आयो कि मैं याको सोवत ते
जगाय देहुं कि, जौने २ मतनमें तुम लगेहौ सो रामनाम को अर्थ नहीं है,
ये संसारके देनवारे हैं, तुम संसारी ह्वैगये, सब स्वप्न देखौ हौ, वह अर्थ नाम
को मिथ्या है, तुम जागिकै रामनामार्थ जे साहब हैं तिनको जानौ ॥ २२ ॥
दोहा-सात मूरतिके बाहिरे, सोरह संख्यके पार ॥
तहँ समरथको बैठका, हंसनकेर अधार ॥ २३ ॥
साहब कैसेंहैं कि सात सूरति जे कहियाये तिनके बाहिरहैं औ षोड़शकला
जीवको छान्दोग्य उपनिषदमें तत्वमसिके पूर्व्वलिख्योहै सोइहां कहै हैं कि
सोरहसंख्यके कहे सोरहसंख्यक जे जीवहैं अर्थात् षोड़शकलात्मक जे समष्टि
जीव जे लोकके प्रकाशमें रहैं हैं शुद्धरूप तिन के साहब पार हैं सो जहां
सोरह संख्यकहे षोड़शकलात्मक जीवहै तिनके पार वह लोक साहब कौहै
तहां समर्थ जे साहबहैं तिनको बैठकाहै कहे वहीलोक में रहैहैं । समर्थ जो
कह्यो सो समर्थ साहिबही हैं जीव समर्थ नहीं है उन्हींके किये जीव समर्थ
होइहै यह आपको झूठही समर्थ मानिलियो है याही हेतुंते जीव संसारी भयो
है । सो हंसन के आधार तो परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहीहैं तेहिते जब हंसरूप
पावै तब साहब के पास वह लोकमें बसै जाय ॥ २३ ॥
दो०-घरघर हमसबसों कही, शब्द न सुनैं हमार ॥
ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासीधार ॥ २४ ॥
सोकबीरजी कहैहैं कि घर २ हम सब सों बातकही हमारो कह्यो सांच
शब्द को अर्थ कोई नहीं समुझैहै नासुनै है ते संसाररूपी सागरके चौरासी-
लाख योनि जो हैं धारा तामें डूबिजायहैं ॥ २४ ॥
आदिमंगल (१९)
दो०-मङ्गलउतपतिआदिका, सुनियो संतसुजान ॥
कह कबीरगुरुजायत, समरथकाफुरमान ॥ २५ ॥
सो आदिकी उत्पत्तिका मङ्गल हमयह कह्योहै सो हेसंतसुजानौ सुनत जाइयो।
हम आपनो बनायकै नहीं कह्योहै हम यह मङ्गल गुरुकहे सबते श्रेष्ठ औ तीनों-
कालमें जायत कहेब्रह्ममनमायादिकनकेभ्रमतेरहित ऐसेजे समर्थ सत्यलोकनिवासी
श्रीरामचन्द्रहैं तिनको फुरमान कहे उनके हुकुमते मैं कह्यों है औ सबके पर सा-
हबहैं औ साहबकोलोकहै तामेंप्रमाणआदिबाणीकोशब्द ॥ “बलिहारी अपने
साहबकी जिन यह जुगुति बनाई । उनकी शोभाकेहि बिधि कहिये मोसों
कही न जाई ॥ बिनाज्योति की जहँ उजियारी सो दरशे वहदीपा ।
“निरते हंसकैरकौतूहलवोहिपुरुषसमीपा ॥ झलकै पदुम नाना विधिवानी
माथे छत्रविराजै । कोटिनभानु चन्द्रतारागण एक फुचरियन छाजै ॥
करगहिबिहँसि जबैमुखबोलैतबहंसा सुखपावै । वंशअंश जिन बूझ बिचारी
सो जीवनमुक्तवै । चौदहलोकवेदकामण्डल तहँलगकालदोहाई । लोक वेद
जिन फंदाकाटी ते वह लोक सिधाई ॥ सातशिकारी चौदहपारथ भिन्नभि-
न्निरतावै । चारिअँशाजिनसमुझि बिचारी सोजीवन मुकतावै ॥ चौदहलो
क बैठे यम चौदह तहँलगकाल पसारा । ताके आगे ज्योति निरंजन बैठे
सुन्नमझारा ॥ सोरॅहखंड अक्षरभगवाना जिनयह सृष्टिउपाई । अक्षरकला सृ-
ष्टिसे उपजी उनही माँह समाई ॥ सँत्रहसंख्यपर अधरदीप जहँ शब्दातीत
बिराजै । निरतैसखी बहूविधि शोभा अनहदबाजाबाजै॥ताकेऊपर परमधामहै
मरम न कोईपाया। जोहमकहीनहीं कोउमानै ना कोइ दूसराया ॥ वेदनसाखी
सब जिउअरुझेपरमधामठहराया । फिरि फिरि भटकै आपचतुरहै वह घर काहु
न पाया ॥ जोकोईहोइ सत्यका किनका सोहमका पतिआई । औरन मिलैकोटि
करथाकै बहुरिकालघरजाई॥ सोरहसंख्यकेआगे समरथ जिनजग मोहिं पठवाया।
कहैकबीर आदिकीबाणीवेद भेद नहिंपाया” ॥ २५ ॥
१ सात सुरति । २ चौदह यम । ३ चारवेद । ४ सोरह कलाजीवकी । ५ सत्रहतत्व
सूक्ष्म शरीरके ।
( २० ) बीजक कबीरदास ।
अथ षट् लिंग वर्णन ।
"उपक्रमोपसंहारावभ्यासोपूर्वता फलम्॥ अर्थवादोपपत्तिश्चलिंगंतात्पर्यनिर्णये"
उपक्रमउपसंहार अभ्यास अपूर्वता फल अर्थबाद उपपत्ति इहांबस्तु तात्पर्यके
बर्णनमें लिंगकहे बोधकहै ॥ उपक्रम उपसंहार को लक्षण यह है "प्रकरणके
विषे प्रतिपाद्य जोबस्तु ताको आदिअंतके बिषयजोहै बर्णनसो उपक्रम औ उपसंहार
कहावै" १ औ प्रकरणके बिषे प्रतिपाद्य जो है बस्तु ताको फेरि फेरिजोहै
वर्णन सोअभ्यास कहावैहै २ औ प्रकरणकेबिषे प्रतिपाद्य जो है बस्तुसो औरै
प्रमाणकरिकैवर्णनमें न आवै सोकहावै अपूर्वता ३ प्रकरणके बिषे प्रतिपाद्य जो
है बस्तु ताकेंज्ञानैकरिकै ताकी जोहै प्राप्ति सो कहावै फल ४ औ प्रकरणमें प्रति
पाद्यजोहै बस्तु ताकीजोहै प्रशंसा सो कहावै अर्थवाद ५ औ प्रकरणमें प्रतिपाद्य
जो है बस्तु ताकोदृष्टांतकरिकै फेरिजोहै प्रतिपादन सोकहावै उपपत्ति ॥ ६ ॥
इहांकबीरजीके बीजककेप्रकरणकेआदिमें औ आदिमंगल में कहाहै कि
शुद्ध जीव साहबके लोकके प्रकाशमें पूर्णरहै है जब साहब सुरति देइहै तब
जीव उत्पन्नहोयहै यह जीव शुद्ध है साहब को है मन मायादिक यामें नहीं
है ये बीचहीते भयेहैं । मनमायादिको कारण यामें बनोरह्योहै तांतेसाहबमें
नालगेसंसारमुख ह्वैगये । जब श्रीरामचन्द्रकीप्राप्ति होई तबहीं शुद्धजीवहोइ ।
सो साहब हक्यो सो नामान्यो मन माया ब्रह्म में लगिकै संसारी है गयो। (जीवरूप
यक अंतरवासा । अंतर ज्योति कीनपरकासा १ इच्छारूप नारि अवतरी । तासु-
नाम गायत्रीधरी ) २ यहउपक्रम वाक्यहै । औ पदन के अंतमें बिरहुलीहै ॥
(बिषहरमंत्र न मानबिरहुली । गाडुरी बोलै और बिरहुली ॥ बिषकी
क्यारीबोयो बिरहुली । जन्म जन्म अवतरे बिरहुली ॥ फल यक कनरइल
डाल बिरहुली । कहैं कबीर सचुपायबिरहुली । जो फलचाखहु मोर
बिरहुली १) सोबिरहुली में यहलिख्यो है कि तुम तौ प्रथम शुद्ध रह्यो
१ सर्वज्ञ पुरुषोंके लिखे जितने ग्रन्थ हैं सबमें षट्लिङ्ग अवश्य होतेहैं और यह
ग्रन्थ सर्वज्ञ सत्यगुरु कबीर साहब विरचितहै इस कारण षट्लिंग का स्वरूप प्रदर्शित
करते हैं ॥
है तुम्हीं मनमायादिकन को बनायकै फँसि गयेहौ यह उपसंहार भयो ।
औ साखिन के आदिमें यह साखीहै । ( जहियाजन्म मुकताहता तहिया
हता न कोय । छठीतिहारी हौं जगा तू कहँचलाबिगोय ) १ औ एक पोथीके
अंतमें यह साखीहै । ( जासोंनाता आदिकाबिसरिगयोसोठौर । चौरासीकेबशपरेक-
हतऔरकेऔर ) १ सोयेहूंमेंवहीबातहैऔदूसरी पोथीकेअंतमेंयहसाखीहै ॥
( धोखे २ सबजगबीता द्वैतअंगकेसाथ । कहै कबीर पेड़ जोबिगरचो अबका
आवैहाथ १ ) सोयहूमेंवही बातहै । औ अट्ठाइस साखी कौनिऊँ पोथीमें
औरहैं ताते दुइसाखी अंतकी लिख्यो है यह उपक्रम उपसंहारभयो १ ।
औरप्रकरणमें यहहै कि श्रीरामचन्द्रको जब जीवजानै तबछूटै सोग्रन्थभेर-
मेंबारबार यहीउपदेशहै ॥ ( लखचौरासी जीव योनिमें भटकि भटकि दुखपावै
कहैं कबीर जोरामाहिजानै सो मोहिनीकेभावै १ राम बिन।नरहै। कैसा । बा-
टमांझ गोबरौरा जैसे २ ) इत्यादिक बहुतवाक्यहैं याते अभ्यास भयो ।
औ सगुण जेहैं ईश्वर परमेश्वर अवतार अवतारीसब निर्गुणजोहै ब्रह्मजौन
मनबचनकेपरे है ताहूतेपरे नित्यसाकेतरासविहारी रामचन्द्रहैं यह अपूर्वताभई ॥
“अवधू छोड़हु मन विस्तारा । सोपदगहौजाहिते सद्गति पारब्रह्मेतेन्यारा ॥ नहीं
महादेव नहीं महम्मद हरीहजरत तवनाहीं । आदम ब्रह्मनहिं तबहोते नहीं
धूपनहिं छाहीं ॥ अससिहसपैगम्बर नहीं सहसअठासीमुनी । चंद्रसूर्य तारागण
नाहीं मच्छ कच्छ नहिंद्वूनी ॥ वेदकिताबस्मृतिनहिंसंयम नाहिं यमनपर-
साही । बागुनिमाज नहींतवकलमा रामौनहिंखोदाही ॥ आदिअंतसन
मध्य न होते आतश पवन न पानी । लखचौरासी जीव जंतुनहिंसाखी
शब्द न बानी ॥ कहहिं कबीर सुनौहोअवधू आगेकरहुबिचारा । पूरनब्रह्म
कहांत प्रकटेकिरतम किनउपचारा” ॥ १ ॥ यहपद यही बीजकग्रन्थको है
सोजहां यापदहै तहांअर्थलिख्यो है सो देखिलीजियो यातें अपूर्वताभई १
औ रामनामहीं के जपेते श्रीरामचन्द्रहीके जानेते मनबचनके परे श्रीरामच-
न्द्ररूप फल की प्राप्तिहोइहै यह फल है ॥ “छच्छाआहि छत्रपति पासा ।
छकि किनर है छोड़िसबआसा । मैंतोहींक्षणक्षणसमुझाया । खसमछो-
ड़िकस आपबँधाया ॥ १ ॥ ररारारिरिहाअरुझाई । रामकहेदुखदारिद जाई ॥
ररांकहै सुनौरेभाई । सतगुरुपूँछिकैसेवहूआई॥२॥” इत्यादिक बहुत वाक्यहैं
यहफलहै।औ अर्थबाद कबीरजी तो साहबके पासके हैं उनको संसारका कौन
डर है यह प्रशंसा करै है याते अर्थबादभयो ॥ “डरपतअहों यहझूलिबेको
राखुयादंव राय । कहकबीर सुनु गोपाल बिनती शरण हरितवपाय” ॥ औ
प्रकरणमें प्रतिपाद्य जोहै कि रामनामैकोजानैहै सोई छूटिजायहै औजे नहीं जानै
हैं औरऔरमतनमें लगेहै तेईसंसारी होयहैं यहबात दृष्टांतदै कै रामनामही को दृढ़
कियो है । “राम नाम बिन मिथ्याजन्म गँवाईहो । सेमरसेइसुवाजोहँड़यों
ऊनपरेपछिताईहो ॥ ज्यों मदिपगांठि अरथदै घरहुकी अकिलगँवाईहो ।
स्वादहुउदरभरैजो कैसे वोसहिप्यास न जाईहो” ॥ इत्यादिककहरामें लिख्यो हैं
यह उत्पत्तिभई। येई षट्लिंगहैं जे इनको देखिकै अर्थकरै हैं सो सत्यहै, जे इनको
नहीं जानिकै अर्थकरैहैं वहग्रन्थको तात्पर्य औरहै और अर्थ करैहै सो अनर्थहै ।
जैसे बीजकको कोई निराकार ब्रह्ममें लगावैहै कोई जीवात्मामें लगावै कोई नये
नयेखामिन्द बनाइकै अर्थलगावैहै इत्यादि । वेमनमुखी अपने अपने मनते नाना
मत्तनमें अर्थलगावैहैं ते अनर्थ हैं अर्थनहीं हैं । वेगुरुजे हैं सबते गुरु परमपुरुष
श्रीरामचन्द्र तिनके द्रोहीहैं ताते प्रमाण ॥ “गुरुद्रोही औमनमुखी नारिपुरुष
अबिचार । तेनरचौरासीभ्रमाहिं जबलगिशशिदिनकार” ॥ १ ॥
अरु हम जो बीजकको यह अर्थ करैहैं तामें छउलिङ्ग श्रीरामचन्द्रमें घटितहैं
तेहितेजो अर्थ हम करैहैं अनिर्वचनीय श्रीरामचन्द्रको प्रतिपादन सोई ठीकहै काहें
तें कि जहांभारिप्रभुहैं तिनहूंके प्रभुहैं तौनेमें प्रमाण बाल्मीकीयको ॥ “सूर्य्य-
स्यापिभवेत्सूर्योह्यग्नेरग्निःप्रभोःप्रभुः” । अर्थ जोयेईसूर्यमें येईअग्निमेंअर्थलगावै तौ
पुनरुक्तिहोयहै काहेते जबबड़ोप्रकाशमान सूर्यको कह्यो तब अग्नि को कहिवे कोहै
तातेयहअर्थहै जो कर्मनमें लोकनँकी प्रेरणाकरै सोकहावै सूर्य अर्थात् अन्तर्यामी
औसबकेआगेरहतभयो यातेअग्निकहावै ब्रह्मसोसूर्यके सूर्यकहै अंतर्यामीके अंतर्यामी
औ अग्निकहे ब्रह्मकेब्रह्मअंतर्यामी परिछिन्नहै तातेबड़ो ब्रह्महै जो सर्वत्र पूर्णहै औप-
रिछिन्नहै ताते बड़ोजाको प्रकाश यह ब्रह्महै जामें सबजीव भरे रहेहैं ऐसासाहब-
कोलोकहै सबकोप्रभुपरब्रह्मस्वरूप ताहूकेप्रभुवह लोकके मालिक श्रीरामचन्द्रहैं ।
वहब्रह्मजोहै सोई मनबचनके परेहै पुनिजाको वो प्रकाशहै ब्रह्मसोलोककैसेमन
आदिमंगल। ( २३ )
बचनमें आवै साहब तौदुहुनका मालिकहै उनकी कहबाई कहाकरै जो कहौं
सब कें मालिक श्रीरामचन्द्रहैं यह कहतई जाउहौ औकहौ कि मनबचनमें नहीं
आवैहैं यहबड़ो आश्चर्य है सो सत्यहै ये कबीरहूजीकहैं "किरामो नहीं खोदाई"
काहेते रामो नहीं खोदायहौ कहै हैं "रामै नाम अहै निज सारू । औ सब
झूठ सकल संसारू" ॥ इत्यादिक बहुत प्रमाणदै कै बीजक भरैमें रामैनामको
सिद्धांतकियेहै ताही में याको समाधानहै औताही में कबीरजीको बीजकलागै हैं
औरीभांति अर्थ किये नहींलागै है। सोसुनो जो साहबको रामनामहै ताके साध-
नकीन्हे ते वहमनबचन के परेजोरामनाम ताकोसाहब देइ है सो वह नाम याकें
बचनमें नहीं आवैहै साहिबै क दीन्हेते पावैहै । जब याको संसार छूटयो तब
अपने लोकको साहब हंसस्वरूप देइहै तौनेहंसस्वरूप में टिकिकै साहबकोदेखै-
हैंनामलेइहैं साहब साहबको नाम साहबको लोक साहबकोदियो हंसस्वरूप या
प्राकृत अप्राकृत मन बचनके परे हैं तामेंप्रमाण ॥ “ यतोवाचोनिवर्तंतेयत्पर-
म्ब्रह्मणःपरम् ॥ अतःश्रीरामनामादिनभवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः ”॥ औ यह रामना-
मके जपन की विधिजैसी २ कबीर जी अपने शब्दनमेंकह्योहै तेहिरीतिते जो
जपक रै तौ रामनाममन बचनकेपरे जोआपनो स्वरूप सोयाके अंतःकरणमें अस्फ़ू-
र्तिकरि देयँ हैं औ साहब को रूपअस्फूर्ति करिदेयँ हैं अर्थात् आपहीअस्फूर्ति हैजायहै
तामेंप्रमाण ॥ “ नामचिन्तामणीरामश्चैतन्यपरविग्रहः । नित्यशुद्धोनित्यमुक्तोन
भिन्नन्नामनामिनः ॥ अतःश्रीरामनामादि नभवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः ॥ स्फुरतिस्वयमे-
वैतज्जिह्वादौश्रवणेमुखे” ॥२॥ सो यही रामनाम जो मनबचनके परैहै ताही को
कबीर जानै ॥ “ सो जानै जेहिमहीं जनाऊं । बांह पकरि लोकै लै आऊं ॥
सहज जाप धुनि आपै होई । यह सँधिबूझै बिरला कोई ॥ रग २ बोलै रामजी
रोम रोम राकार । सहजै धुनि लागीरहै सोई सुमिरणसार ॥” ओठकंठहालैनहीं
जिह्वानाहिंउच्चार । गुप्तबस्तुको जो लखै सोईहंसहमार ॥ जो हंसरूपमें टिकिकै
जपत रहेहैं तौनेमें प्रमाण भक्तमालके टीकामें श्रीप्रियादासजीलिख्योहै ॥ “बिनै
तानो बानो हिय राममड़रानो” ॥ श्रीमहाराजाधिराजरामसिंहबाबा पूंछ्योहै
तब कबीर साहबकह्योहै॥ “राअक्षरघट रम्योकबीरा ॥ निजघरमेरोसाधुशरीरा” १
तातेरामनामही को परत्व बजिकमें है मुक्ति रामनामहीमें है और साधनमनह!
( २४ ) बीजक कबीरदास ।
है यह कबीरजी बीजकभरमें कह्यो है। और अर्थ जे करैं हैं ते बीजक को अर्थ
नहीं जानैंहैं काहेते भागूदास बीजक लैभागेहैं सो बघेलवंश विस्तार में कबीरहीं
जी कहि दियो है कि अर्थ नहीं जानै हैं तामें प्रमाण ॥ “भागूदासकी खबरि-
जनाई ॥ लैचरणामृत साधूपियाई ॥ कोउ आयकह कलिंअर गयऊ । बीज-
कग्रन्थचोराइलैगयऊ॥सतगुरु कहैं वहनिगुरापन्थी । काह भयो लै बीजकग्रंथी ॥
चोरी करि वह चोरकहाई काह भयो बड़ भक्त कहाई ॥ बीज मूल हम
प्रगट चिन्हाई ॥ बीज न चीन्हो दुर्मति ल्याई ॥ बघेलवंश में प्रगटी हंसा ।
बीजक ज्ञान को करी प्रशंसा ॥ सबसों पूछी प्रेम हिंताई । आप सुरति आपैमें
ल्याई ॥ बीजकलाय गुफा में राखी । सत्यै कहौं बचन मैं भाखी "॥ सो
और २ अर्थ जे कबीरहा करैं हैं ते भागूदास औ भगूदास के शिष्य प्रशिष्य,
ते बीजक को बितंडाबाद अर्थ करिकै कबीरजी के सिद्धांत को अर्थ जो राम-
नामहै ताते जीवन को बिमुख करिदारयो नरककी राहबताय दियो काहेते
दूसरी पोथीतौ रही नहीं वोही पोथी रही तौने को मनमुखी अर्थ करिकै
आपबिगरे औ शिष्यन प्रशिष्यनको बिगारयो जे उनके सत्संग किये ते सब याही
ते नाम तोरहै भगवानदास पै भागूदास कबीरजी कह्योहै । औ मैं जो तिलक
करौंहौं बीजक को सो एकतो साहबके हुकुमई ते कियो है सो आगैलिखि आये
हैं दूसरे तिलक बनाइ बांधौगढ़में आयो तहां बयालिसवंश बिस्तार ग्रंथदेख्यो
ताकोप्रमाण तिलकमैं लिखिदियोहै पोथी पंद्रहसैकैइस के सालकी धर्मदासकें
हाथकी लिखीहै औ येहीपोथी में कबीरजी राजारामते आगम कहिदियो है ॥
“तुमसे दशौ बंश जो ह्वै हैं । सो तौ शब्द हमारो गहि हैं ॥ परमसनेही अनु-
भव बानी । कथिहैं शब्द लोक सहिदानी॥२॥तेहिते मैं जो अर्थ करौं हौं सोई
कबीर जी का सिद्धांत है” अनुबन्ध चतुष्टय-अधिकारी औ यह ग्रंथ में
चारि साधन करिकै युक्त जो पुरुष है सो अधिकारी है चारि साधन कौन हैं
नित्यानित्य बस्तु विवेक १ औ इहामुत्रार्थफल भोग बिराग २ औ दम शम
उपरति तितिक्षा औ श्रद्धा समाधान ई षट्संपत्ति ३ औ मुमुक्षुता ४
नित्यानित्यविवेक का कहावै, जीवात्मा नित्य औ देह इन्द्रिय आदि
दैके जो संसार सो अनित्यहै यहै कहावै नित्यानित्यविवेक औ इहामुत्रार्थ फल-
भोग विराग का कहावै यह लोकके औ परलोकके विषे जेहैं स्रक् चन्दन बनि-
ता यह आदि दै कै जेहैं तिनको अनित्यता बुद्धिकैकै तिनते जो है बैराग्य सो
इहामुत्रार्थफलभोग विराग कहावै औ लौकिक व्यापारते मनकै जो है निवृत्ति
सो कहावै शम औबाह्य जे इन्द्रियहैं तिनकी श्रीरामचन्द्रके संबंधते व्यतिरिक्त
जो विषय है तेहिते निवृत्तिहोब जोहै सो कहावै दम औ श्रीरामचन्द्रको जौं
ज्ञान है तेहि पूर्वक उपासनाके अर्थ विहितजैहैं नित्यादिक कर्म तिनको जो हैं
त्याग सो कहावै उपरति औ शीत उष्ण आदि दैकै जेहैं द्वन्द तिनको जो है
साहब सो कहावै तितिक्षा औ निद्रा आलस्य प्रमाद इनको जो है त्याग तेहि
पूर्वक मनकै जोहै स्थिरता सो कहावै समाधान औ गुरु वेदांतवाक्यमें अवि-
चल विश्वास सो कहावै श्रद्धा औ संसारते छूटिबेकी जो है इच्छा सो कहावै
मुमुक्षुता ई साधना चतुष्टय जामें होय सो कहावै अधिकारी ।
१ विषय-औ यह जीव साहबको है औरको नहीं है यह जो है ज्ञान
सो यह ग्रंथमें विषय है २ सम्बन्ध-औ ग्रन्थको, विषय सो संबंध कौन है तात्पर्य
करिकै प्रतिपाद्य प्रतिपादकभाव ॥३॥ प्रयोजन-औ यह ग्रंथमें प्रयोजन का है
कि मन माया औ अहंब्रह्म जो है ज्ञान तौनेमें बँधा जौहै जीव सो मन
माया ब्रह्मते छूटिकै रघुनाथजीको प्राप्त होय सो प्रयोजन ॥ ४ ॥
जीवको मन माया ब्रह्मते छोड़ायकै श्रीरघुनाथजीके पास प्राप्त करिबेको
कही, अपनी उक्तिते कही, साहबकी उक्तिते कही, मायाकी उक्तिते कही, जी-
वकी उक्तिते कही, ब्रह्मकी उक्तिते कबीरजी उपदेश कियो है । औ उत्पत्ति
प्रकरण कैयो प्रकारते अपने ग्रंथनमें कबीरजी कह्योहै । सो यहां कबीरजी प्रथम
रमैनी में आदिकी उत्पत्ति कहैहैं । जबकुछ नहीं रह्यो है तब वही साहबकों-
लोक रह्यो है ताहीको परम अयोध्या कहै हैं । औ सत्यलोक सांतनकलोक
नौपैदलोक आदि दैकै नाना नामहैं तौने लोकमेंजे हंस हंसनी हैं गुल्मलता
तृणआदि दैकै तेसब चिन्मय हैं औ परमपुरुष श्रीरामचन्द्र सबके मालिक हैं
तामें प्रमाण॥"राजाधिराजःसर्वेषां रामएवनसंशयः ॥ इतिश्रुतेः॥दूसरोप्रमाण ॥
“यत्र वृक्षलतागुल्मपत्रपुष्पफलादिकम् ॥ यत्किंचित्पक्षिभृंगादितत्सर्वंभातिचिन्म-
यम् ॥” इतिवसिष्ठसंहितायाम्॥कबीरौजी कह्यो है ॥“सदा बसंतजहँफूलहिंकुंज
( २६ ) बीजक कबीरदास ।
सोहावही । अक्षयवृक्षतरसेज सोहंस बिछावहीँ ॥ धरती आकाशजहांनहीं जग
मंगै । वहियांदीनदयाल हंसकेसँगलगै ॥”तौने श्रीअयोध्याजी को जो है प्रकाश
तामें शुद्ध जीव जे हैं तेभरे हैं तिनको साहबको औ साहबके लोकको ज्ञान
नहींहै जो साहबको जानै औ साहब के लोक जाय तौ ना उलटि आवै सों
साहबको तौ जानै नहींहै याही ते माया उनको धरि लैआवैहै सो प्रथम साहब
दयाल उनमें दयाकरिकै अपनी शक्ति दैकै उनके सुरति उत्पत्ति करतभये
कि हमको जानै हमारे पास आवै तौ मायातें बचि जाय सो आदिमंगलमें
कहि आये हैं जब उनके सुरति भई तब वे धोखा ब्रह्ममें औ माया में लगिकै
संसारी भये सो साहब बहुत हटक्यो सो हटको ना मान्यो सो आगे
बोलिमें कहेंगे ॥ “ तू हंसामनमानि कहौ रमैया राम । हटल न मान्यों
मोर हो रमैया राम । जसकीन्ह्योतसपायोहो रमैया राम । हमरदोषज
निदेहु हो रमैया राम ॥ ” औ साहबके लोकमें मनादिकनको कारण
नहींहै, तामें प्रमाण ॥ “ नयत्रशोकोनजरान मृत्युर्नकालमायाप्रलयादिवि-
भ्रमः ॥ रमेतरामेतुसतत्रगत्वास्वरूपतांप्राप्यचिरंनिरंतरम् ॥ इति वसिष्ठसं-
हितायाम् ॥१॥ कबीरौ जीकह्यो है ॥ “ तत्वभिन्ननिहतत्वनिरक्षरमनैप्रेमसेन्या
रा । नाद बिंदुअनहदनिरगोचरसत्यशब्द निरधारा ॥”औ साहब को लोक सबके
पार है सो मंगल में कहिआये हैं जो साहब को जानै औ साहबके लोक जाइ
तौ संसार में ना आवै सो तौनै उत्पत्ति श्रीकबीरजी प्रथम रमैनी में संक्षेप तें
कहै हैं औ सबकी उत्पत्ति साहब के लोकके प्रकाश के बहिरेहीते होइहै तामें
प्रमाण ज्ञानसागरको ॥“जानैभेद न दूसरकोई । उतपतिसबकीबाहरहोई॥१॥”
अथ बीजक प्रारम्भः।
अथ रमैनीप्रथम ॥ १ ॥ २ ॥
चौ० जीवरूपयकअन्तरबासा। अन्तरज्योतिकीनपरगासा १
इच्छारूपनारि अवतरी। तासु नाम गायत्री धरी २
तेहिनारीकेपुत्रतिनभयऊ। ब्रह्माविष्णुमहेशनामधरेऊ ३
तबब्रह्मापूंछतमहतारी। कोतोरपुरुषकाकरितुमनारी ४
तुमहमहमतुमऔरनकोई। तुममोरपुरुषहमैंतोरिजोई५
साखी–बाप पूतकी एकै नारी औ एकै माय बिआय ॥
ऐसापूत सपूत न देख्यो जोबापै चीन्है धाय ॥ १ ॥
चौ० जीवरूपयकअंतरवासा। अंतरज्योतिकीनपरगासा १
श्रीरघुनाथजीके लोकको जो है प्रकाश तेहिकै अन्तर जे हैं जीव एक
रूपते कहे समष्टिरूप ते बास किये रहे, यहां यह भाव प्रगट है कि, जीवनकी
सुरति औरई है और वह (जीव) औरई है सो-अंतरज्योति कहे साहबके
लोकको जोहै प्रकाश तेहिकै अंतरकहे भीतरै अपनई प्रकाश करतभये अर्थात्
सुरतिकी चैतन्यता पाय मनादिक उत्पन्नकै संसार प्रकटकै संसारी ह्वैगये।
साहबको न जानत भये या बात मंगलमें विस्तारते कहिआयेहैं याते इहां
प्रसङ्गमात्र सूचित कियो है। जब प्रलयहोयहै तबहूं वही ब्रह्ममें लीन होइ
है उहैंते पुनि उत्पत्ति होइहै औ अनुभव धोखा ब्रह्ममें ज्ञान करिकै जे मुक्त-
( २८ ) बीजक कबीरदास ।
होयहैं ते सनातनज्योति जोहै अयोध्याजीको प्रकाश वही ब्रह्म जहां पूर्वलीन
रहे है तहैं जाय लीनहोयहै औ जे श्रीरामचन्द्रको जाने हैं तेज्योति वह
भेदिकै श्रीरामचन्द्रके पास जायहैं तामें प्रमाण ॥ ( सिद्धाब्रह्मसुखेमग्नादैत्या-
श्चहरिणाहताः ॥ तज्ज्योतिर्भेदनेशकारसिकाहािरवेदिनः ॥ तामें कबीरजीको
प्रमाण ( जैसे माया मन मिल्यो ऐसेरामरमाय । तारामंडलभेदकै तबैअमरपुर-
जाय ) ॥ औ धोखाको अर्थयहहै जो औरेको और देखे सो कौनहै कि, एक
जोहै सर्वत्रपूर्ण लोकप्रकाशब्रह्म ताके अंतर कहे भीतर अनुरूप जेजीव ते सम-
ष्टिरूपते बास कियेरहे । सो अंतरज्योति प्रकाश कहे जब साहब सुरतिदियो
सोई अंतरप्रकाश करतभई तबजीवको जान परनलग्यो चैतन्यता आई तब
संकल्प विकल्पकियो कि मैं कौन हौं यही मनकी उत्पत्तिभई सो जीवकोरू-
पतौ ॥ ( बालाग्रशतभागस्य शतधाकल्पितस्यच । भागोजीवःसविज्ञेयः सच्हानं-
त्यायकल्पते ) ॥ इतिश्रुतेः ॥ तामें कबीरजीकों प्रमाण-(बहुत बडा ना तनकसा,
तनकी भी है नाहि । औरत मरद् न कहिसके, औ रह सबही माँहि ॥) इत्या-
दिक प्रमाण करिकै वाको स्वरूप तो अणुहै सोतो वाको न देखिपर्यो सर्वत्र
प्रकाशरूप ब्रह्मदेख्यो सो मान्यो कि महीं ब्रह्महौं यही धोखा ब्रह्महै ।
जीव ब्रह्मविषयक शंकासमाधान॥ जो कहो जीव ब्रह्मतों बने है जीव
कहना यहीयाकी भूलहै । जब याको ज्ञानभयो ज्ञानते बिज्ञानभयो अनुभवानन्द
प्राप्त भयो जबभर अनुभवानन्द बनोरहै है तबभर याकोजीवत्वको लेश बनोरहैहै
जब अनुभवानन्दरूप ही द्वैगयो तबयाको जीवत्व मिटिगयो संसारऊ मिटिगयो
एक आपही आप रहतभयो ? तुमकैसे कहौहौ कि “ जीवको ब्रह्महोना धोखा-
है”। जो ऐसे कहौ तौ सुनौ ! जोपदार्थ बीचकोहोय है सो मिटिजायहै औ
जो पदार्थ सनातनहै सो नहीं मिटिजायहै कैसे जैसे तुमकहौहौ कि जीवत्व
बीचहीको है वही ब्रह्म अनेकरूप धारण कैलियो है, एकते अनेक होइगयौहै,
जब जीवत्वको भ्रम मिटिगयो तब ब्रह्मही रहिजायहै,जो प्रथम रह्यौहै सोईरहि-
जायहै । जो पदार्थ बीचको होयहै सो मिटिजायहै । तैसे हमहूं कहैंहैं कि आदि
में तो जीवह्यो है सो जब संसार छूट्यो तब शुद्धजीवको जीवही रहिजायहै ।
जोकहो ब्रह्मही जीवद्वैजायहै तौ हम तुमसों या पूछे हैं कि प्रथम तो ब्रह्मही
रमैनी । ( २९ )
रहतभयो सो ब्रह्म अकर्ताहै निर्धर्महै, मनमायादिकते रहितहै, देशकाल
बस्तु परिच्छेदते शून्यहै सो ऐसे ब्रह्मको जीवत्वको भ्रम कहांतेभयो जो
कहो वह ब्रह्म जीवत्वको धारणनहींकियो वाको तो भ्रमही नहींहै काहेते कि ॥
सत्यंज्ञानमनंतंब्रह्म ॥ यह श्रुतिलिखै है वाको भ्रमतो संभवितै नहीं है भ्रमतो
जीवनको भयो है, जिनको ब्रह्मको विज्ञानहै, तिन को न जीवत्व है न संसार
है । जैसे अज्ञानी जीवनको संसारही देखिपरे है तैसे ज्ञानी जीवनको ब्रह्मही
देखिपरे है । तौ सुनो तुमही दुइज्जीव कहौहौ एक अज्ञानी जीव एकज्ञानी
जीव । सो अज्ञानी जीवको या कह्यो कि संसारही देखाय है सो ब्रह्मके तौ
अज्ञान होताहीं नही है, जाते आपको जीवत्व मानिकै संसारीहोय । जो
कहो मायाते शबलित ह्वैकै ब्रह्मही जीव होई संसारी है जाय है तौ माया
को तौ मिथ्या कहौंहौं । मायाशब्दको अर्थः मिथ्यैव । फिर ब्रह्मको तौ ज्ञान-
स्वरूप कहि आये
( ३० ) बीजक कबीरदास ।
तामें प्रमाण ॥ "येन्येऽरविन्दाक्षविमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः ॥
आरुह्यकृच्छ्रेणपरंपदंततः पतंत्यधोनादृतयुष्मदंघ्रयः" ॥ इतिभागवते ॥ तेहिते
साहबके लोक प्रकाशमें भरे जे जीवहैं तहेंतेव्यष्टि होतहै औ तहँ समष्टिरूप
करि लीनहोतहै । अनादिकाल यहीक्रमहै । सो जैसोहम वर्णनकरिआये हैं
ताही रीतिमें प्रकाशरूप जो ब्रह्महै तामें निर्विकारत्वनिर्धर्मत्वादि जे वेदांतमें
विशेषणहैं ब्रह्मके ते बन रहेहैं औरीभांतिनहीं संघटित होयहै औ प्रकाशरूप
जो ब्रह्महै सो निर्विकारहै निर्धर्म है अकर्त्ताहै, वाकी करी रक्षा जीवकी नहीं
होयहै । दूनोंते परे जे साहबहैं तिनको जोजानैहै, जानिकै उनके लोकको
जाय है सो फेरि नहीं आवैहै वे रक्षाकरिलेयहैं काहेते वहां मन मायादिकन
की गति नहीं है ॥ तामेंप्रमाण ॥ “यद्गत्वानानिवर्तंतेतद्धामपरमं मम” ॥
औ जगत्की उत्पत्ति जो उपनिषदन्में लिखैहै सो समष्टिरूप जीवही ते लिखैहै
सोकहेंहैं ॥ "सदेवसौम्येदमग्रआसीदेकमेवाद्वितीयं" ॥ इतिश्रुतेः ॥ एककहे
सजातीयभेदशून्य अद्वितीय कहे विजातीयभेदशून्य एवकारते स्वगत
भेदशून्य यद्यपि सूक्ष्म भेद वामें बने हैं परन्तु समष्टिरूपकरिकै जीव एकही-
रहै है । प्रलयमें अथवा जीवत्व करिकै एक रहैहै यह श्रुति सतनाम कैकै
कहैहै ताते अनामा जोब्रह्म है तामें नहीं लगै है औ दूजी श्रुति है ॥ “सऐ-
क्षतएकोऽहं बहुस्याम्” ॥ तौनै जो है समष्टि जीव सो सुरति पायकै इच्छा
करतभो कि, एकते बहुत होउं सो या ब्रह्मारूप जो समष्टि जीव ताहीमें
लगैहै औ ब्रह्मपद यह समष्टि जीवहीमें घटित होय है काहेते बृहिबृद्धौ यह
धातु है व्यष्टिते समष्टि हैजायहै समष्टिते व्यष्टिहोइजायहै । औ वहजो लोकप्र-
काश ब्रह्मएक रस न घटै न बढै तामें एकोऽहंबहुस्याम् या अर्थ नहीं लगै है।
औ अनुभव करि आपनेको जो ब्रह्म मान्यो है सो तो धोखैहै नाममिथ्यैहै । सो एकतो
समष्टि जीव रूप सगुण ब्रह्म तौन औ एक लोक प्रकाश रूप निर्गुण ब्रह्म तौन ई दूनोंते
साहब परेहैं । औ मंगलमें पांच ब्रह्मकहिआयेहैं सोनारायणजेंहैं साकार ते औ
तिनके अंतर्यामीजेहैं निराकारतत्त्वरूप नारायणते ई दूनों जे साकार निराकारहैं
तिनते साहब परे है औ निराकार साकार ये दोऊ साहबके शरीरहैं तामें प्रमाण
"यामिच्छसिमहाराज तांतनुंप्रविशस्वकाम । वैष्णवींतामहातेजो यद्वाकाशंसनात
रमैनी । ( ३१ )
नम् ॥ इतिवाल्मीकीये ॥ औ साहब साकारद्विभुजनराकृतिहै । तामें प्रमाण ॥
स्थूलंचाष्टभुजं प्रोक्तं सूक्ष्मंचैवचतुर्भुजम् । परन्तुद्विभुजंरूपंतस्मादेतत्त्रयंजयेत् ॥ इतिआ-
न्दसंहितायां ॥ आनन्दोद्विभुजःप्रोक्तोमूर्त्तश्चामूर्त्तएवच । अमूर्त्तस्याश्रयोमूर्त्तःपर-
मात्मानराकृतिः ॥ इतिआनंदसंहितायां ॥ औ मुसलमाननके जे अच्छे समझ-
वारेहैंतेसाकारहीमानैहैं, काहेतेकिकुरानमें लिखै है—अल्लाह कहैहै कि "महम्मद
मोको एकबार जब लड़काईमेंदेखा है औ एक बार मैंने बुलाया मेरे सामने च-
लाआया दुइकमानते कम फरक रहिगया" सो महम्मद देखा यातौअल्लाहकेसूरति
है यह आयो औ महम्मदकीहदीस "खलकलईंनसान"अल्लाहके सूरतहीमें बना-
याहै ईनसान अपनी सूरतिका यहिसे यह आयाकि अल्लाह द्विभुजहै ।
यहिसे या मालूम भया कि अल्लाह कहिकै द्विभुज श्रीरामचन्द्रही वर्णन
करैहै । औ जे अल्लाहकी सुरतिकहतेहैं कि नहीं है, कुरानकी जबानी नहीं
मानते हैं तिनको काफरकहतेहैं औ वह जो है निर्गुण सगुणके परे साहब
नराकृति सो जाके ऊपर कृपा करै है, ताको आपनोहंसरूप अपनीइन्द्री
देइहै आपै देखिपरे है तामैं प्रमाण ॥ ब्रह्मणैवाजिघ्रतिब्रह्मणैव पश्यति ब्रह्मणै-
वशृणोतीतिश्रुतेः ॥ औ साहबको रूप साकार निराकारते बिलक्षणहै
यातेअरूपीरूप कहैहैं- औजेसोयहनामहै तैसोनामनहीं है वहनामविलक्षण- मन
वचनकेपरे है यातेवाको अनामानामकहै हैं तामेंप्रमाण । "अनामासोऽप्रसिद्धत्वाद-
रूपोभूतिवर्जनात् ॥ इतिअग्निपुराणे ॥ अमाकृतशरीरत्वादरूपीभगवान्विभुः ॥
इतिवायुपुराणे॥ औ साहबके हाथ पांय नहीं हैं निराकार आयो औ चलैहै ग्रह-
ण करिलेइहै याते साकारआयौतामेंप्रमाण॥ "अपाणिपादो जवनोग्रहीतापश्यत्यच-
क्षुःसशृणोत्यकर्णः"इतिश्रुतेः॥सो ऐसे साहबके लोक प्रकाश है ब्रह्मको यह जी-
वना समुझ्यो कि साहबको लोकःप्रकाश है मनते अनुभवकरि वह ब्रह्म आपही
को मानतभयो यही धोखा ब्रह्म है । सो जीवपै कहे एकरूपते औ कहेसमष्टिरूप
जीवलोक प्रकाशके अंतरमेंबास कियेरहै, सो अंतर ज्योति कहे सुरतिपाय प्रका-
शकीन कहे मतादिक उत्पन्न करि समष्टिते व्यष्टि होवेकी इच्छाकरत भये सो
आगे कहै हैं ॥ १ ॥