सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 68

आदिमंगल ! ( १७ )
इहां कबीर जी, कहै हैं कि तेहिंपीछे कहे जब संसारकी उत्पत्ति हैगई औ
जीव नाना दुःख पावन लगे तब साहिब जे दयालुहैं तिनके दयाभई कि हमतें
अपने नामको उपदेशकियो कि हमारे रामनाम को जो यह अर्थ लक्षमण जान-
की हम भरत शत्रुघ्न हमारे हंसरूप पार्षद तिनको जानिकै हमारेपास आवै औयें
सबजीव संकर्षण आद्यापराशक्ति शब्दब्रह्म नारायण महाविष्णु जीव इनके पक्षमें
रामनामकी छवोमात्रा लगाइकै औरे औरे मतनमें लगिके संसारी है कै
नानादुःख पावन लगे । तब रामनाम को यथार्थ अर्थ बतावनको हमको भेज्यो
सो हम सारशब्द जो है रामनाम ताको सत्यकहे सांच जो अर्थहै ताके बताव-
नके हेतु आये सो आदि अंतकी उत्पत्ति हम तुमसे कहे देयहैं । आदिकौन
है जोयह उत्पत्ति है आई संसारभयो औअंतकौन है जो हम रामनामको सांच-
अर्थ बतायो सो अर्थ समुझिलेइ साहबके पासजाय वाको संसारको अंत हेजाइ
है । फिरि संसारमें नहीं आवैहै । सो यह आदिअंतकी उत्पत्ति हमतुम सों
कहिदियो किं यहिभांतिते जगत्की उत्पत्ति होयहै जीवसंसारी होइहैं औयहि
भांतिते जब रामनामको सांचअर्थ जानै है तब संसारको अंत है जाइहै ॥२०॥
दोहा-सात सुरति सब मूलहै, प्रलयहु इनहीं माहिं ॥
इनहीं मासे ऊपजै, इनहीं माहिं समाहिं ॥ २१ ॥
इहांमंगलको उपसंहारकरैहै सबकीमूल सातसुरतिजे प्रथम वर्णन करि आयेहैं
सो वेतो सोई सुरति स्थूलरूप सात रूपते प्रकटभईहै सातकौनहै; दुइच्छा एक-
योगमाया एकजगत्‌को अंकुरकारणरूपा औ पांचौंब्रह्मरूपा येई सातौसबकेमूलहैं
इनहीँते उपजैँहैं इनहीं ते प्रलय हैजायहै कहे नाशह्वैहै जायहै औ इनहींमें पुनि-
समाइहै सातो सूरतिमें प्रमाण साखी शंकरगुष्टकी ॥ “निरंजनअक्षर अचित
दोहंसोहंजान ॥ औपुनिमूलअँकूरकहि सात सूरति परमान” ॥ २१ ॥
दोहा-सोई ख्याल समरथ कर, रहेसो अछप छपाइ ॥
सोई संधिलै आयउ, सोवत जगहि जगाइ ॥ २२ ॥
सो समष्टिजीव अपनेको समर्थ मानिकै साहबको न जानि कै यह ख्याल
करतभयो अछपकहे रामनामके अर्थमें साहब न छपे रहे औ संर्वत्र पूर्णरहे सा-