सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

आदिमंगल (१९)
दो०-मङ्गलउतपतिआदिका, सुनियो संतसुजान ॥
कह कबीरगुरुजायत, समरथकाफुरमान ॥ २५ ॥
सो आदिकी उत्पत्तिका मङ्गल हमयह कह्योहै सो हेसंतसुजानौ सुनत जाइयो।
हम आपनो बनायकै नहीं कह्योहै हम यह मङ्गल गुरुकहे सबते श्रेष्ठ औ तीनों-
कालमें जायत कहेब्रह्ममनमायादिकनकेभ्रमतेरहित ऐसेजे समर्थ सत्यलोकनिवासी
श्रीरामचन्द्रहैं तिनको फुरमान कहे उनके हुकुमते मैं कह्यों है औ सबके पर सा-
हबहैं औ साहबकोलोकहै तामेंप्रमाणआदिबाणीकोशब्द ॥ “बलिहारी अपने
साहबकी जिन यह जुगुति बनाई । उनकी शोभाकेहि बिधि कहिये मोसों
कही न जाई ॥ बिनाज्योति की जहँ उजियारी सो दरशे वहदीपा ।
“निरते हंसकैरकौतूहलवोहिपुरुषसमीपा ॥ झलकै पदुम नाना विधिवानी
माथे छत्रविराजै । कोटिनभानु चन्द्रतारागण एक फुचरियन छाजै ॥
करगहिबिहँसि जबैमुखबोलैतबहंसा सुखपावै । वंशअंश जिन बूझ बिचारी
सो जीवनमुक्तवै । चौदहलोकवेदकामण्डल तहँलगकालदोहाई । लोक वेद
जिन फंदाकाटी ते वह लोक सिधाई ॥ सातशिकारी चौदहपारथ भिन्नभि-
न्निरतावै । चारिअँशाजिनसमुझि बिचारी सोजीवन मुकतावै ॥ चौदहलो
क बैठे यम चौदह तहँलगकाल पसारा । ताके आगे ज्योति निरंजन बैठे
सुन्नमझारा ॥ सोरॅहखंड अक्षरभगवाना जिनयह सृष्टिउपाई । अक्षरकला सृ-
ष्टिसे उपजी उनही माँह समाई ॥ सँत्रहसंख्यपर अधरदीप जहँ शब्दातीत
बिराजै । निरतैसखी बहूविधि शोभा अनहदबाजाबाजै॥ताकेऊपर परमधामहै
मरम न कोईपाया। जोहमकहीनहीं कोउमानै ना कोइ दूसराया ॥ वेदनसाखी
सब जिउअरुझेपरमधामठहराया । फिरि फिरि भटकै आपचतुरहै वह घर काहु
न पाया ॥ जोकोईहोइ सत्यका किनका सोहमका पतिआई । औरन मिलैकोटि
करथाकै बहुरिकालघरजाई॥ सोरहसंख्यकेआगे समरथ जिनजग मोहिं पठवाया।
कहैकबीर आदिकीबाणीवेद भेद नहिंपाया” ॥ २५ ॥
१ सात सुरति । २ चौदह यम । ३ चारवेद । ४ सोरह कलाजीवकी । ५ सत्रहतत्व
सूक्ष्म शरीरके ।