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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

आदिमंगल । ( १६ )
अर्थ-“प्रथम दुर्गंद कहैं हैं दुर्गकहावै कि जो कोई पुण्यकरैहै ताको स्वर्गदैके
पुण्यभोग करावैहै औ जो पापकरैहै तिनको नरकनमें पापको भुगताइकै किला-
रूपी जो है शरीर सो जीवकोदेयहै याते दुर्गद यम एक १ औ दूसर चित्रगुप्त
जे कर्मनके लेखाकरैहैं २ तीसर मलिनमन ३ औ चौथ मोह ४ औपांचौ काम काल-
की सेनाका मकरन्दीकहे बसंतते सहित ५ औछठौ अंधअचेत जोहै चित्त सो
६ औ सातौ मृत्यु भई जोखेतको जीतहै कहैसबको मारैहै ७ औ आठौंसूरकहे
अंधा अर्थात् अशुभकर्मकी रेखा ८ औ नवौ सिंहकहे समर्थ शुभकर्मकी रेखा ९
औ दशौ यमभावी जो कालको पेखाहै कहे जो कर्म होनहारहै सो काल करिकै
होइहै अर्थात् कालकी अपेक्षा राखैहै १० औ ग्यारहौ अघकहे पापरूपनिद्रा ११
औबारहौ अंधको देनवारो क्रोध जामें सबजीव जंतु बंधेहैं १२ तेरहौ प्रबल परमेश्वर
रमाबैकु