कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) बीजक कबीरदास ।
हबके सब सामग्री साहबको लोक साहिबैको रूपवर्णन करि आये हैं । जो साहब-
के लोकको प्रकाश सर्वत्र पूर्णरहा तैसाहब पूर्णईरहे सर्वत्र सो जीव
रामनाम को और और अर्थ करिकै और और मतनमें लग्यो तेहिते साहब
छपायगये साहबको जीव न जानतभये । सो तौनै संधिलेकै मैं आयों कि
जीवते "संधि कहे बीच" परिगयो है, रामनाम को सांच अर्थ भूलिगयो
सो जौने संसारमें यह सोवै है तौनी जगह में आयो कि मैं याको सोवत ते
जगाय देहुं कि, जौने २ मतनमें तुम लगेहौ सो रामनाम को अर्थ नहीं है,
ये संसारके देनवारे हैं, तुम संसारी ह्वैगये, सब स्वप्न देखौ हौ, वह अर्थ नाम
को मिथ्या है, तुम जागिकै रामनामार्थ जे साहब हैं तिनको जानौ ॥ २२ ॥
दोहा-सात मूरतिके बाहिरे, सोरह संख्यके पार ॥
तहँ समरथको बैठका, हंसनकेर अधार ॥ २३ ॥
साहब कैसेंहैं कि सात सूरति जे कहियाये तिनके बाहिरहैं औ षोड़शकला
जीवको छान्दोग्य उपनिषदमें तत्वमसिके पूर्व्वलिख्योहै सोइहां कहै हैं कि
सोरहसंख्यके कहे सोरहसंख्यक जे जीवहैं अर्थात् षोड़शकलात्मक जे समष्टि
जीव जे लोकके प्रकाशमें रहैं हैं शुद्धरूप तिन के साहब पार हैं सो जहां
सोरह संख्यकहे षोड़शकलात्मक जीवहै तिनके पार वह लोक साहब कौहै
तहां समर्थ जे साहबहैं तिनको बैठकाहै कहे वहीलोक में रहैहैं । समर्थ जो
कह्यो सो समर्थ साहिबही हैं जीव समर्थ नहीं है उन्हींके किये जीव समर्थ
होइहै यह आपको झूठही समर्थ मानिलियो है याही हेतुंते जीव संसारी भयो
है । सो हंसन के आधार तो परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहीहैं तेहिते जब हंसरूप
पावै तब साहब के पास वह लोकमें बसै जाय ॥ २३ ॥
दो०-घरघर हमसबसों कही, शब्द न सुनैं हमार ॥
ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासीधार ॥ २४ ॥
सोकबीरजी कहैहैं कि घर २ हम सब सों बातकही हमारो कह्यो सांच
शब्द को अर्थ कोई नहीं समुझैहै नासुनै है ते संसाररूपी सागरके चौरासी-
लाख योनि जो हैं धारा तामें डूबिजायहैं ॥ २४ ॥