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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

आदिमंगल। ( १३ )
प्रकटे जे चारोंवेद ते ब्रह्मा के चारिउ मुखतें निकसतभये। तौने वेदनकों अक्षर
जो समष्टि जीव है सो जगतमुख दृष्टि कियो अर्थात् जगत्मुख अर्थ देख्यो
तब द्वारे ह्वैकै “ वह मायाते सबलित जो है ब्रह्म जाको आगे बाप कहि आये
हैं जों शुद्धतें अशुद्ध जीवन को कैकै उत्पन्न करै है ” सो दश द्वारेते कहे
दशौ इन्द्रिनतें कढ़त भये। तब इन्द्रिन के विषय ह्वैकै इन्द्री ह्वैकै चिदंश ह्वैकै
चिदचिदात्मक जगत् होत भयो अर्थात् वेदन को अर्थ जब जगतमुख देख्यो तब
वह जीव चिदचिदात्मक जगत्‌को धोखा ब्रह्मही देखत भयो । सो जगत् तौ
साहब के लोक प्रकाश को शरीरहै, तौने को वेदार्थ करिकै धोखा ब्रह्मही
देखत भयो यही धोखा है तात्पर्य कैकै वेद जो साहब को कहै है ताको न जानत
भये। लघु रकार की अकार ते नारायण भये तिनते ब्रह्मा की उत्पत्ति भई
सो कहि आये। अरु बहि ते जेतो जगत् के उत्पन्न को प्रयोजन रह्यो सो
कहि गये । अब फेरि सिंहावलोकन करिकै पंचम ब्रह्म की प्राकट्य कहैहैं ॥ १४॥
दोहा—तेहिते ज्योति निरंजन, प्रकटे रूप निधान ॥
काल अपरबल बीरभा, तीन लोक परधान॥१५॥
तेहिते कहे वही रामनामतें व्यञ्जन मकारको जो अर्थकरि आये हैं तामें
जो अकार रही है ताको महाविष्णु अर्थ करतभये। जे विरजा के पार पर
बैकुण्ठ में रहे हैं। जिनके अंशते रमा बैकुण्ठवासी भगवान् भये हैं । सो
अंजन जो अविद्या माया ताते वे रहित हैं काहेते कि, अविद्या माया विरजा-
के यही पार भर बनतहै। पै पुराणादिक में सो व्यञ्जन मकार की अकार-
को महाविष्णु अर्थ करत भये, औ वह अकार शत्रुघ्नबाचक है सो अर्थ न स-
मुझत भये। ते अकाररूप महाविष्णु ते महाकाल अपरबल बीरभा कहे जे-
हिते प्रबल बीर कोई नहीं है अथवा अकार जे विष्णुहैं तेई हैं परमबल जि-
नके सो तीनलोक में प्रधान होत भयो । इहाँपाँचों ब्रह्मकी प्राकट्य
ह्वैगई ॥ १५ ॥
दोहा—ताते तीनों देवभे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
चारि खानि तिन सिरजिया,मायाके उपदेश॥१६॥