कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२ ) बीजक कबीरदास ।
दोहा-जबअक्षरकेंनींदगई, दबीसुरतिनिर्वान ॥
श्यामवरणयकअण्डहै, सोजलमेंउतरान ॥ १२ ॥
योगमाया में सोय रहे अक्षर कहे नाशरहित जे नारायण तिनकों जब
योगमाया जगायो नींद गई तब उनको निर्वाण सुरति देत भई । काहेते
ई जे हैं नारायण तिनको निर्वाण रूप कहे निराकार रूप कैकै अंतर्यामी
रूपते सबके भीतरदबाइ देत भई अर्थात् चेष्टारहित दिव्यगुणविशिष्ट सर्व्वत्र-
व्यापक अंतर्यामी तत्त्वरूप जे निर्वाण नारायण तिनको सबके अन्तर दबाइ
देत भई कहे सबके अन्तर्यामी करि देत भई तेई प्रकट होतभये । श्यामवर्ण
अण्ड कहे चतुर्भुज रूप धारण करिकै जल में उतरान कहे जल में रहतभये । सो
इनके शरीरमें शरीर जे हैं निराकार नारायण तिनको नित्य सम्बन्ध होतभयो ।
सो रकारमें जोहै अकार ताको नारायण अर्थ करत भये औ भरतबाची जो
है अकार सो अर्थ न समुझत भयें यहां चौथे ब्रह्म की प्राकथ्य भई ॥ १२ ॥
दोहा-अक्षरघटमेंऊपजै, व्याकुलसंशयशूल ॥
किनअण्डानिरमाइया, कहाअण्डकामूल ॥१३॥
अक्षर जे नारायण हैं तिनके घटते ऊपजे अर्थात् तिनकी नाभि में कमल
होइ है तेहिते ब्रह्मा होइहै ते ब्रह्मा सब जगत् करै हैं तब समष्टि जीव शुद्ध तें
अशुद्ध है कै ब्रह्मा ते उत्पन्न हैकै बहुत शरीरधारण करैहैं ते ब्रह्म जब उत्प-
न्नभये तब ब्याकुलभये औ संशय करतभये कि कहां अण्डका मूलहै औ को
अंडाको बनायो है औ हम कहांते उत्पन्नभये हैं सो खोज्यो खोजे ना पायो
तब तपस्या करत भयो तब नारायण प्रकटभये ते ब्रह्मा ते कह्यो कि तुम
जगत् की उत्पत्ति करौ यहकथा पुराण में प्रसिद्धहै ॥ १३ ॥
दोहा-तेही अण्डके मुख पर, लगी शब्दकी छाप ॥
अक्षरदृष्टिसे फूटिया, दश द्वारे कढ़िबाप ॥ १४ ॥
तैने ब्रह्मरूपी अण्डके मुखपर शब्दकी छाप लगी अर्थात् शब्द ब्रह्म जो
वेदसार ताको नारायण बताय दियो । तौने को ब्रह्म जपत भये तब वाहीतें