कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै तुम्हीं मनमायादिकन को बनायकै फँसि गयेहौ यह उपसंहार भयो ।
औ साखिन के आदिमें यह साखीहै । ( जहियाजन्म मुकताहता तहिया
हता न कोय । छठीतिहारी हौं जगा तू कहँचलाबिगोय ) १ औ एक पोथीके
अंतमें यह साखीहै । ( जासोंनाता आदिकाबिसरिगयोसोठौर । चौरासीकेबशपरेक-
हतऔरकेऔर ) १ सोयेहूंमेंवहीबातहैऔदूसरी पोथीकेअंतमेंयहसाखीहै ॥
( धोखे २ सबजगबीता द्वैतअंगकेसाथ । कहै कबीर पेड़ जोबिगरचो अबका
आवैहाथ १ ) सोयहूमेंवही बातहै । औ अट्ठाइस साखी कौनिऊँ पोथीमें
औरहैं ताते दुइसाखी अंतकी लिख्यो है यह उपक्रम उपसंहारभयो १ ।
औरप्रकरणमें यहहै कि श्रीरामचन्द्रको जब जीवजानै तबछूटै सोग्रन्थभेर-
मेंबारबार यहीउपदेशहै ॥ ( लखचौरासी जीव योनिमें भटकि भटकि दुखपावै
कहैं कबीर जोरामाहिजानै सो मोहिनीकेभावै १ राम बिन।नरहै। कैसा । बा-
टमांझ गोबरौरा जैसे २ ) इत्यादिक बहुतवाक्यहैं याते अभ्यास भयो ।
औ सगुण जेहैं ईश्वर परमेश्वर अवतार अवतारीसब निर्गुणजोहै ब्रह्मजौन
मनबचनकेपरे है ताहूतेपरे नित्यसाकेतरासविहारी रामचन्द्रहैं यह अपूर्वताभई ॥
“अवधू छोड़हु मन विस्तारा । सोपदगहौजाहिते सद्गति पारब्रह्मेतेन्यारा ॥ नहीं
महादेव नहीं महम्मद हरीहजरत तवनाहीं । आदम ब्रह्मनहिं तबहोते नहीं
धूपनहिं छाहीं ॥ अससिहसपैगम्बर नहीं सहसअठासीमुनी । चंद्रसूर्य तारागण
नाहीं मच्छ कच्छ नहिंद्वूनी ॥ वेदकिताबस्मृतिनहिंसंयम नाहिं यमनपर-
साही । बागुनिमाज नहींतवकलमा रामौनहिंखोदाही ॥ आदिअंतसन
मध्य न होते आतश पवन न पानी । लखचौरासी जीव जंतुनहिंसाखी
शब्द न बानी ॥ कहहिं कबीर सुनौहोअवधू आगेकरहुबिचारा । पूरनब्रह्म
कहांत प्रकटेकिरतम किनउपचारा” ॥ १ ॥ यहपद यही बीजकग्रन्थको है
सोजहां यापदहै तहांअर्थलिख्यो है सो देखिलीजियो यातें अपूर्वताभई १
औ रामनामहीं के जपेते श्रीरामचन्द्रहीके जानेते मनबचनके परे श्रीरामच-
न्द्ररूप फल की प्राप्तिहोइहै यह फल है ॥ “छच्छाआहि छत्रपति पासा ।
छकि किनर है छोड़िसबआसा । मैंतोहींक्षणक्षणसमुझाया । खसमछो-
ड़िकस आपबँधाया ॥ १ ॥ ररारारिरिहाअरुझाई । रामकहेदुखदारिद जाई ॥