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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

साखी । ( ५६७ )
कबीर जीको पद ॥
सन्तौ रामनाम जो पावैं । तौ वो बहुरि न भवजल आवैं ॥
जंगमतो सिद्धिहिको धावैं। निशिबासर शिव ध्यानलगावैं ॥
शिवशिवकरतगयेशिवद्वारा । रामरहेउनहूंतेन्यारा ॥
पण्डित चारिउ वेदबखानैं । पढ़ैं गुनें कछु भेदनआनैं ॥
संध्या तर्पण नेम अचारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
सिद्धएकजो दूधअधारा । कामक्रोधनहिंतजैं बिकारा ॥
खोजतफिरैंराजको द्वारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
बैरागी बहुवेश बनावैं । करमधरमकी युगुतिलगावैं ॥
घण्टबजाय करैं झनकारा । रामरहे उनहूतें न्यारा ॥
जंगमजीवकबौंनहिंमारैं । पढ़ैंगुनैं नहिं नामउचारैं ॥
कायहिको थापै करतारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
योगी एकयोग चितधरहीं । उलटे पवन साधना करहीं ॥
योगयुगुतिलै मनमें धारा । रामरहे उनहूंतें न्यारा ॥
तपसी एकजो तनकोदहई । बस्तीत्यागिजङ्गलमें रहई ॥
कन्दमूलफलकरआहारा । रामरहे उनहूंतें न्यारा ॥
मौनी एकजौं मौनरहावैं । और गाउँमें धुनीलगावैं ॥
दूध पूत दैचले लवारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
यती एक बहुयुगुतिबनावैं । पेटकारणे जटाबढ़ावैं ॥
निशिबासर जो करहङ्कारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
फुकरा लैजिय जबह कराहीं । मुखते सबतर खुदाकहाहीं ॥
लैकुतकाकहँ दम मदारा । रामरहैं उनहूंते न्यारा ॥
कहैकबीरसुंनोटाकसारा । सारशब्द हम प्रकटपुकारा ॥
जोनहिं मानहिं कहाहमारा । रामरहे उनहूंतें न्यारा ॥ १०० ॥
काल खड़ा शिर ऊपरे, जाग विराने मीत ॥
जाको घर है गैलमें, क्या सोवै निश्चीत ॥ १०१ ॥

: ( ५७० ) बीजक कबीरदास ।
मानुष ह्वैकै ना मुवा, मुवा सो डाँगर ढोर ॥
एकौ जीव ठौर नहिं लाग्यो, भया सो हाथी घोर १०८॥
जो कोई साहबके पास पहुँचे सोई मानुषहै अर्थात् साहब द्विभुजहैं यहौ
द्विभुज ह्वैकै साहबकें पास जाइहै औ कबहुँ मरै नहीं है सो साहबकें जाननवारें
नहीं मरैं या पीछे लिखि आयेहैं औ जे साहबको नहीं जानै हैं तेई मरै हैं ते वे
डाँगरढोरहैं ते मानुष नहीं हैं अर्थात् पशुहैं एकौ ठौर में नहीं लागैहैं कहे साह-
बके पास नहीं पहुँचे हैं हाथी घोर इत्यादिक नाना योनिमें भटकै हैं ॥१०८॥
मानुष तैं बड़ पापिया, अक्षर गुरुहि न मानि ॥
बार बार वन कूकूही, गर्भ धरे चौखानि ॥ १०९ ॥
हेमानुष ! तैंतो श्रीरामचन्द्रको अंशहै तेरो स्वरूप मानुष को है सो तैं बड़ो
पापी ह्वैगयो काहे ते किं साहब तोको बारबार गोहरायोःकि तैं मेरो है मेरे पास
आउ सो उनके कहे अक्षर न मान्यों आज्ञा भंगकियो तौने पापते बारबार जों
बनकी कुकुही कहे मुर्गी तिनके कैसोगर्भ चारिउ खानिके जीवनमें परिवारके पाल-
न पोषणमें लागिकै पुनि पुनि जन्मधरत भयो नानादुःख सहत भयो इहाँ
मुर्गी याते कह्योहैं कि बच्चा बहुतहोयहैं ॥ १०९ ॥
मनुष बिचारा क्या करै, कहे न खुले कपाट ॥
श्वान चौक बैठायकै, पुनि पुनि ऐपन चाट ॥११०॥
वेद शास्त्र पुराण इनकेकहे जो कपाटनहीं खुलै हैं अर्थात् ज्ञाननहीं होयहै तौ
मानुष बिचारा क्याकरै प्रथम साहबको कह्यो नहीं मान्यो याते मानुष पशुवत्
ह्वैगयो अज्ञान घेरे है सो जो कूकुर कुकुरिया को बिवाहकरै चौकमैं बैठाइये तौ
वे पुनि पुनि ऐपनै चाटै हैं तैसे जीवनको पशुवत् ज्ञान ह्वैगयो है फेरि फेरि
वही बिषयमें लागै हैं साहबकी ओर नहीं लागै हैं ॥ ११० ॥
मनुष बिचारा क्याकरै, जाके शून्य शरीर ॥
जो जिउ झाँकि न ऊपजै, काहि पुकार कबीर॥१११॥

साखी । ( ५७१ )
या मानुष बिचारा क्याकरै जाके शरीरमें शून्य जो धोखाब्रह्म सो समाय रह्यो
है सो धोखाब्रह्मको झाँकिउ कहे देखिउ चुक्यौ कि यहां कुछ बस्तुनहीं है औ
साहबको ज्ञान न उपज्यो तौ कबीरंजी कहै हैं कि मैं काको पुकारौं वहतौ बड़ो
अज्ञानी है बूड़िगयो जो प्रत्यक्ष देखों नहीं मानैहै किं यह शून्यही है यामें कछू
न मिलैगो तो मेरो कह्यो कैसे सुनैगो ॥ १११ ॥
मानुष जन्महिं पायकै, चूकै अबकी घात ॥
जायपरै भवचक्रमें, सहै घनेरी लात ॥ ११२ ॥
चौरासीलाख योनिनमें भटकत भटकत ऐसो मानुष शरीरपायकै अबकी जो
घातचूक्यो साहबकों न जान्यो तौ संसारचक्र में परैगो और यमकी घनेरी
लातैं सहैगो ॥ ११२ ॥
ज्ञान रतनको यतन करु, माटी का श्रृंगार ॥
आया कविरा फिरिगया, झूठा है हंकार ॥ ११३ ॥
साहबके ज्ञानरतनकों यतनकरु जांते साहब को ज्ञानहोय यहजो माटीकहें
शरीरको श्रृङ्गार करै है सो अनित्यहै कबीरांकहे कायाको बीर जीव यह संसा-
रमें आया और फिरिगया तबशरीर पराय जाताहै यह जो अहंकार करताहै
कि हम शरीरहैं हमब्राह्मणहैं क्षत्रियहैं वैश्यहैं शूद्रहैं सोसब झूठे हैं औ जो फीका
है संसार यह जो पाठहोय तौ यह अर्थ है कि साहब के ज्ञानरतनको जों
यतन करै है ताको या संसार फीकै लगेहै जो कोई दाखको खानवारो है ताको महुवा
फीकै लगै है ॥ ११३ ॥
मनुष जन्म दुर्लभ अहै, होय न दूजीवार ॥
पक्का फल जो गिरिपरा, बहुरि न लागैडार ॥ ११४ ॥
यह मानुष जन्म तिहारो बड़ो दुर्लभहै जोन अबैहो तौन फिरि न होउगे
पक्काफल गिरिपरै है तौ पुनि वह डारमें नहींलगै है अबै साहबके जानिबेकों
समयहै सो साहबको जानिलेउ ॥ ११४ ॥

( ५७२ ) बीजक कबीरदास ।
बांह मरोरे जातहौ, मोहिं सोवत लियो जगाय ॥
कहैं कबीर पुकारिकै, यहि पेंडे हैकै जाय ॥ ११५ ॥
मुसलमानमें जे साहबके भक्त होयहैं तें जब भजन न करै हैं तब उनकों पीर
दस्तते दस्त मिलावै है सो दस्तमिलायकै साहब को बताइ देइहैं पास पहुँचाए
देयहैं तिनसों जीव कहै हैं कि हमारी बांहमरोरे चले जाउहौ हम संसारमें सोव
त रहेसो जगाय लियो तब उनके पीर जे हैं कबीर ते कहै हैं कियहि पेंड़े हैकै-
जाउ या कहिकै साहबके जायबेको राहवताय देइहैं तब उनके परमगुरु जे हैं
महम्मद आदिदैके पैगम्बर तिनके इहां पहुँचाय देय हैं तब उनके चेला वह
राहचलि महम्मद के पास पहुँचे हैं तब महम्मद साहबके पास पहुँचावै हैं औ
हिंदुनमें जे श्रीरघुनाथजी को स्मरणकरैं हैं तें गुरुद्वारा हैकै सुमिरनकरै हैं ते
गुरु परमगुरुको मिलावै हैं परमगुरु आचार्यको मिलावै हैं ते साहब को मिलाय
देइहैं जैसे रामानुज मतवारे आपने गुरुकों प्राप्तभये औ गुरु शठकोपाचार्यको
प्राप्तभये औ वे विष्वक्सेनकों प्राप्तकियो जीवको औ वे संकर्षणको प्राप्तकियो औ
वे जानकीजी को प्राप्त कियो जानकीजी श्री रामचन्द्रको प्राप्त कियो कबीरजी
रामानन्दके सम्प्रदायकेँ हैं तेहिते यह सम्प्रदाय संक्षेपते लिखिदियो है ऐसे सब
आचार्य लोग आपने आपने चेलनको साहबमें लगाय देइहैं ॥ ११५ ॥
और १ औरें प्रतिमें इसके पश्चात एक औरि साखी है पर इसमें नहीं दिया ।
बेरा बांधिन सर्पको, भवसागरके माहि ॥
छोड़ै तौ बूडत अहै, गहै तौ डसिहैवाहि ॥ ११६ ॥
पंचमुखी सर्प अहंकार ताके पांचमुखन में पांचमकारकी बाणी निकरी है
प्रथममुख विश्वहै ताते कर्मकांड निकरा औ दूसरामुख तजस तातें योगकांड़
निकरा औ तीसरामुख प्राज्ञ ताते उपासनाकांड निकरा औ चौथामुख प्रत्यगात्मा
१ दूसरी प्रतियोंमें यहाँ पर यह साखी है । पूरन साहबकी टीकाकी ११७वीं
साखी है ।
“साखि पुलंदर ढहि परे, बिवि अक्षर युगचार ।
रसना रम्भन होत है, कै न सकै निरुआर”

साखी। ( ५७३ )

तातें ज्ञानकांड निकरा औ पांचौँमुख निरंजन तातें अद्वैतबिज्ञान निकरा सो ऐसें
पंचमुखी सर्पमें बेराको बांध्यो आपने मनसे कल्पिकै भवसागर अनुमानकियो
ताको मान्यो तब ये नरदेहमें पंचमुखी सर्प अहंकार उठा तौने अहंकारकों
पहिरिकै वामें सब जीवचढ़े भवसागरपार होनके वास्ते सो अब जो बिचार करिकै
छोड़ाचाहै तौ भवसागरकी भय लागै है कि बूड़ि जायँगे औ धरे रहैं हैं तौ
सर्पदसै हैं सो पंचशरीराहंकार सर्पको बेराबने पर सब वाहिमें आरूढ़ हुये बेरा
समुद्रकै पार नहीं जायसकै हैं तीरहीमें रहिगये सो न बेराको गाहिसकै न बेराको
छोड़िसकै संसारसागरमें बूड़ते उतराते हैं ॥ ११६ ॥
कर खोरा खोवा भरा, मग जोहत दिन जाय ॥
कविरा उतरा चित्तसों, छाँछ दियो नहिं जाय ॥ ११७ ॥
गुरुमुख—जे साहबकें जनहैं ते कौनी भांतितें जाने जायहैं कि पूरहैं सर्वत्र साहब
को देखै हैं हाथमें खोवा भरा कटोरा लीन्हे राह जोहैं हैं कि कोई आवै खाय सो
सर्वत्र तो साहिबको देखै हैं ताते जोई आयकै खायहै ताको साहबै जानै है औ
साहिबै मानिकै आदरकरै हैं औ खोवा खवावै हैं औ कबहूं पुरुषबचन नहीं
बोलैहैं ते जीव साहबके प्यारे हैं औ जिनसों मारे दौरै हैं ते कबीर कायाकें बीर
जीव साहबके चित्तते उतरि जाय हैं अर्थात् वे मुक्ति कबहूं नहीं पावै हैं संसार
हीमें परै हैं। अथवा यह साखी गुरुमुख है ताते यह अर्थ है साहबकहैं हैं कि
खोवा भरा कटोरा हाथमें लियेहौं रामनाम उपदेश करौहौं यह कैसो है कि
कहतमें सरल है फिरि कायाको कलेश कौनौ न करनपरै औ सबको अधिकार है
जैसे खोवा खातमें न कौनौ अरसाहै न कौनौ श्रमहै ऐसे रामनाम रूपी खोवा
उपदेशरूप लियेहौं जो कोई याकों खाय अर्थात् स्मरणकरै तो मैं वाको संसारतें
छोड़ायदेउँ जो मेरें पास आवै तौनेकों। सोहे कायाके बीर कबीरजीव ! जो नहीं
ग्रहणकरै हैं तेमेरे चित्तमें उतरि जायहैं उनको छाँछऊ मोसों दियो नहीं जाय अरु
ज्ञानादिक कर्मादिक के फलतौ मैं देउहौं सोउनके उत्तम कर्महूंके फलमोंसो नहीं
दिये दै जायँ अर्थात् मेरो चित्तनहीं चाहै है कि छाँछ जे हैं ज्ञानादिक ते उनकें
उत्तम कर्मादिकके फलदेउँ सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि अबै साहब समुझावै

( ५७४ ) बीजक कबीरदास ।
हैं सो मानिकै रामनाम कहिकै संसार छोड़िदें फेरि जब यमके सोंटा लगेंगे तब
न कहो कहि जायगो तामें प्रमाण॥ “बहुरि न बनि है कहत कछु जब शिरलगिहै
चोट ॥ अबहीं सब यकठौरहै दूधकटोरोटोट” ॥ ११७ ॥
एक कहौं तौ है नहीं, दोय कहौं तो गारि ॥
है जैसा तैसा रहै, कहै कबीर विचारि ॥ ११८ ॥
साहब कहै हैं कि हेजीव! जोमैं तोकों एककहौं कि ब्रह्मई है सब तैंहीं है तौ
वेदमैं लिखै है किं॥ “सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म इति श्रुतिः”॥ ब्रह्म तो ज्ञानमयहै सो जो
ब्रह्म हो तो तौ मायामें बद्ध ह्वैकै कैसे संसारी होतो औ जो दोय कहौं कि तैं
काहू ईश्वरकोदास है तौ गारी तोको परैहै काहेते कि तैं तो मेरो अंशहै सो
हेकबीर कायाके बीर जीव बिचारिकै देखु तो तैं सनातनको मेरो अंश है दासहै
औरको नहीं है तामें प्रमाण ॥ “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः” ॥
औ मैं मालिक एकईहौं दूजो नहीं है तामें प्रमाणचौरासीअंगकीसाखी ॥
“साईं मेरा एक तू और न दूजा कोई ॥ जो साहब दूजा कहै, सो दूजा
कुलको होइ ॥ ११८ ॥
अमृत केरी पूरिया, बहु विधि लीन्हे छोरि ॥
आप सरीखा जो मिलै,ताहिं पिआऊं घोरि ॥११९॥
साहब कहै हैं कि अमृतपुरिया जो या रामनाम सो मैं बहुत भाँतिते छोरि
लीन्हेहौं । और जो दीन्ही पाठहोय तौ यह रामनामकी पुरिया छोरि दीन्ह्यो है
कहे बहुतविधिते प्रकट करिदीन्ह्यो है कि यही संसारते छोड़ावनवारो है दूसरो
नहीं है सो आपसरीखा जो मोको मिलै ऐसी भावना करतहोय किं मैं साहब
को अंशहौं दासहौं सखाहौं दूसरेको नहींहौं ताको मैं रामनामकी पुरिया घोरिकै
पिआइदेउँ कहे अर्थ समेत बताय देउँ औ पुरिया रामनामकी दैकै संसाररोग-
मिटायदेउँ औ रामनाम औषध है तामेंप्रमाण ॥ “राम नाम एक औषधी सत-
गुरु दिया बताय ॥ औषध खावै पथकरै, ताकी वेदन जाय ॥ ११९ ॥
अमृत केरी मोटरी, शिरसे धरी उतारि ॥
जाहि कहौं मैं एक हौं, मोहिं कहै द्वै चारि ॥ १२० ॥

साखी। ( ५७५ )
साहबकहै हैं कि अमृतकी मोटरी जो रामनाम ताको तौ शिर तें उतारि
धरयो कहै वाको तौ कोई बिचारकरै है नहीं जासों मैं कहौहौं कि एक मालिक
महींहौं सो मोको दुइचारि बतावै हैं कहै छःबतावै हैं अर्थात् पञ्चांगोपासना
औछठौं ब्रह्म सबको मालिक जो मैंहौं ताको भूलिगये कोई देवीको कोई सूर्य्यको
कोई गणेश को कोई विष्णुको कोई महादेवको मालिक कहै हैं ॥ १२० ॥
जाको मुनिवर तपकरैं, वेद पढ़ें गुण गाय ॥
सोई देव सिखापना, नहिं कोई पतिआय ॥ १२१ ॥
जाके हेतु मुनिवर तपस्या करै हैं परन्तु नहींपावै हैं औ जाको चारों वेदगा-
वै हैं परन्तु गुणको पारनहीं पावै हैं तौनेन साहबको श्रीकबीरजी कहै हैं कि
मैं सिखापनदैकै बताउंहौं कि उनहींके रामनामको जपौ तबहीं संसारते छूटौगे
ताहू में मोको कोई नहीं पतिआयहै अथवा वोई जौन सिखापन दियो है कि
मेरो नाम जपै तौ संसारते उद्धारह्वैजाय तौनै मैं सिखापनदै बताऊं हौं परन्तु
पतिआय नहीं है सो महामूढ़है ॥ १२१ ॥*
एक शब्द गुरुदेवका, ताको अनँत विचार ॥
थाके पण्डित मुनि जना, वेद न पावैं पार ॥१२२॥
एक शब्द जो है रामनाम ताको अनन्त विचार है अर्थात् ताहीते वेद
शास्त्र पुराण नानामत सबनिकसे हैं सों हमारे राममन्त्रार्थ में लिखो है तौनै
रामनामको अर्थ करतकरत पंडित मुनिवेद थकिगये पार न पाये अर्थात् अन-
न्तकोटि ब्रह्मांड में वेद शास्त्र सब याहीते निकसे हैं ये कैसे पारपावैं॥१२२॥
राउर को पिछवारकै, गावैं चारो सेन ॥
जीव परा बहु लूटमें, ना कछु लेन न देन॥१२३॥
राउर जो है साहबको धाम ताको पिछवारे कैदिये हैं चारोसेन जे चारोवेद
तिनके श्रुतिनको नानां उपासनामें नानामतमें लगायकै तिनहीं मतनको उपास-

  • अन्य प्रतियों में इस साखीके आगे यह साखी है सो यहां छोड दिया है। साखी
    एकते हुआ अनन्त,अनन्त एकैह्वै आया । परचे भई जब एकते, एके माहिं समाया” ॥

( ५७६ ) बीजक कबीरदास ।
नाकरि जीव लूटमें पर्यो न कछु लेनहै न कछुदेनहै अर्थात् कछुवस्तु हाथ-
नहीं लगे है ॥ १२३ ॥
चौ गोड़ाके देखतै, व्याधा भागा जाय ॥
अचरज हो यक देखौ, सन्तौ मुवा कालको खाय १२४॥
चौगोड़ा जोहै जीवात्मा ताकें चारिगोड़ जेहैं मन बुद्धि चित्त अहङ्कार
इनहींतें जीवचलैहै तौनेके देखतै कहे जब अपने स्वरूपको चीन्ह्यो कि मैं साह-
बकोअंशहौं तबव्याधा जो है काल सो भागि जायहै निकट नहीं आवै है सो
हेसन्तौ! एकबड़ो अचरजहै जब जीवात्मा स्वरूपको जान्यो तबतों काल भागतहीं
भर है औमुवा कहे मन बुद्धि चित्त अहङ्कार जे चारो गोड़ तिनको औ पांचोश-
रीर छोड़यो तब कालखायही जाय हैं कहे कालकी भयनहीं रहि जायहै हंसशरी-
रमें बैठिकै साहबकेपास जायहै उहाँकालकीभय नहीं है तामें प्रमाण ॥ “ नय-
त्रशोकोनजरानमृत्युर्नात्तिर्नचोद्वेगऋतेकुतश्चित् । यच्चित्तोदःकृपयानिदंविदां-
दुरंतदुःखम्भावानुदर्शनात् ॥ इतिभागवते ॥ यस्यब्रह्मचक्षत्रञ्चउभेभवतओदनम्।
मृत्युर्यस्योपसेवेत क इत्यावेद यत्र सः॥औ वा लोकमें कौनौ शोकनहीं हैं तामेंप्रमाण
धर्म्मदासजीकों पद नामलीलाग्रंथको ॥
“ जहाँ पुरुष सतिमाव तहाँहंसनकीबासा । नहींयमनको नाम नहींह्वां तृष्णआसा ॥
हर्षशोकवाघरनहीं नहींलाभनहिंहानं । हंसापरमअनन्दमें धरै पुरुषकोध्यान ॥
नहिंदेवी नहिंदेव नहीं ह्वाँवेदउचारा । नहिं तीरथ नहिंबर्त्त नहींषट्कर्मअचारा ॥
उतपतिपरलयह्वांनहीं नहीं पुण्य नहिं पाप। हंसापरम अनंदमें सुभिरैसतगुरुआप ॥
नहिंसागर संसारनहीं ह्वां पवनहुँ पानी । नहिं धरती आकाश नहीं ह्वांऔर निशानी ॥
चाँद सूर वा घरनहीं नहीं कर्म नहिं काल। मगन होय नामै गहै छूटि गयो जंजाल ॥
सुरति सनेही होइतासु यम निकट न आवै।परमतत्त्व पहिचानि सत्य साहब मनभावै॥
अजर अमर बिनशै नहीं परम पुरुष परकास। केवल नामकबीरका गाय कहै धर्मदास
तीनि लोक चोरी भई, सबका सरवस लीन्ह ॥
बिना मूड़का चोरवा, परों न काहू चीन्ह ॥ १२५ ॥

साखी । ( ५७७ )
तीनिलोकमें चोरीहोत भई सबको सर्वस्वैलैलियो सो ऐसों जो बिना
मूड़को चोर निराकार ब्रह्म सो काहू को न चीन्हिपर्यो अथवा बिनमूड़कों चोर
छिन्नमस्ता देवीके उपासक ते अपनेहूं को भावना करै हैं कि, हमारो मूड़ नहीं
है काहेते कि ॥ "देवो भूत्वा देवं यजेत्" ॥ यह लिखै है ते शाक्त काहूको नहीं
चीन्हिपरै हैं मायामें डारिकै सब जीवको भरमाइ देइ हैं ॥ १२५ ॥
चक्की चलती देखि कै, नयनन आया रोइ ॥
दो पट भीतर आयकै, साबित गया न कोइ॥ १२६ ॥
पुण्य औ पाप दूनों चक्की हैं कहे चकरी हैं तामें द्वैत जो है हम हमार सों
किल्ली है तौनै चक्कीके दूनों पटके भीतर आयकै साबित कोई नहीं गया है
पीसिही गयो है जो कोई साहबको सर्वत्र चिदाचित् रूपते देखै है सोई बाचै है
तामें प्रमाण ॥ "पापपुण्य दुइ चक्की कहिये खूँटा द्वैत लगाया है। तेहि चक्की
तर सबै पीसिगे सुरनरमुनि न बचाया है"॥ और प्रमाण सायर बीजकको।
" चक्की चली राम की, सब जगपीसाझारि ॥
कह कबीर ते ऊबरे, जे किल्ली दियो उखारि " ॥ १२६ ॥
चारि चोर चोरी चले, पग पनहींउतारि ॥
चारो दर थून्हीं हनी, पण्डित कहहु विचारि ॥१२७॥
चारि चोर जे हैं विश्व तैजस प्राज्ञ तुरीय ते चोरीको चले अपनी अपनी
पनहीं जो है बिचार ताको उतारिकै कहे छोड़िकै औ चोर चलै है तब पनहीं
उतारिकै छुपाजाय है तैसे येऊ चलै हैं सो विश्वाभिमान कर्म्मकाण्डकी थून्हीं
गाड़ी औ तैजस अभिमान उपासनाकाण्डकी थून्ही गाड़ी औ प्राज्ञाभिमान योगकी
थून्ही गाड़ी औ प्रत्यगात्मा तुरीय अभिमानने ज्ञानकाण्डकी थून्ही गाड़ी सो ताही
को बिचार पण्डितजन करने लगे। अथवा चोर जो है मन बुद्धि चित् अहङ्कार तें
बिचार रूप पनहींको उतारिकैं चोरीको चले सो मन सङ्कल्प बिकल्पकी थून्ही
गाड़ी औ चित्त अनुसंधानकी थून्हीगाड़ी औ बुद्धि निश्चयकी थून्ही गाड़ी औ
अहंकारैं अहंब्रह्मकी थून्हीगाड़ी सों ताहीको सब पण्डित बिचार करने लगे सों
कहैं हैं । मनतो सङ्कल्प बिकल्प करने लग्यो कि संसार कौनी भांति ते छूटै, औ
३७

( ५७८ ) बीजक कबीरदास ।
चित्त अनुसंधान औरै औरै ईश्वरनपर करने लग्यो, औ बुद्धि औरै औरै ईश्वर
नपर निश्चय करनलागी औ अहंकार अहंब्रह्मको बिचार करने लग्यो कि मैं ब्रह्म
हौं । सो हे पण्डितो ! बिचार तौ करो ये चारो जे हैं ते चारोदरमें थून्ही गाड़
दिये बिचार रूप पनहीं उतारिकै कहे साहब को बिचार न करत भये साहबकें
बिचारको पनहीं काहेते कह्यो कि पनहीं पदत्राण कहावै हैं पांयकी रक्षा करै हैं
सो बिचार रूप पनहीं उतारि डार्यो ताते जैसे कांटा बेधि जाय है तैसे नाना
मत नानाप्रकारके भ्रमबेधि गये ॥ १२७ ॥
बलिहारी वहि दूधकी, जामें निकसै घीव ॥
आधी साखि कबीरकी, चारि वेदका जीव ॥ १२८ ॥
वहदूध जो है चारो वेद अथवा और जे भक्तिशास्त्र तिनकी बलिहारी है
जामें घीव रामनाम निकसै है आधी साखी जो है कबीरकी रामनाम सो चारो
वेदका जीव है काहेते जीव है कि चारों वेद याही ते निकसे हैं औ आधी साखी
रामनामै को कह्यो है तामें प्रमाण ॥ “ रामनामलैउचरीबाणी ” । सबको
आदि रामनामही है ॥ १२८ ॥
बलिहारी तिहि पुरुषकी, पर चित परखनहार ॥
सांई दीन्ह्यो खांड़को, खारी बूझ गवाँर ॥ १२९ ॥
कबीरजी कहैहैं कि परचित कहे सबते परे चिद्रूप जो साहब ताकों परखन-
हार जो अणुचित् पुरुष है ताकी बलिहारी है औ जे सांई कहे बयाना तो
खांड़को दीन्ह्यो कि वेदनमें श्रीरामचन्द्रको बूझै ताको छोड़ि खारी जोहैं नाना
मत तिनको वेदन में बूझै हैं वोई मतनकी उपासना करै हैं ते गँवार हैं खारी
जो बहुत खाय तौ पेट काटि देइ है सो नाना मतनमें परिकै नाना दुःख
सहैं ॥ १२९ ॥
बिषके बिरवा घर किया, रहा सर्पलपटाय ॥
ताते जियरै डर भया, जागत रैनि विहाय॥ १३० ॥
बिषको बिरवा जोहै संसार तामें जीव घरकियो जामें कालरूपी सर्प लप-
टाय रह्योहै तेहिते जाके हृदयमें डरभयोहै जागि कै साहबको जान्यो ताकों

साखी। (५७९)
मोहरूपी निशा बिहाय जायहै औ जे नहीं जागे हैं तिनकों काल डसिखायहै सो-
जिनको रामोपासना सिद्धह्वै गईहै ऐसे जे भक्तहैं तिनके शरीरं नहीं छूटे हैं सो
हनुमान् कबीरजी प्रकटै हैं ॥ १३० ॥
जो ई घर है सर्पका, सो घर साधुन होइ ॥
सकल संपदा लै भई, विष भर लागी सोइ॥ १३१ ॥
जो घर सर्पकोहै सोघर साधुको न होइ अर्थात् सर्पको घरबेमौरहै तामें
बहुतछिद्र होइहैं सो या शरीरौ बहुत छिद्रकी बाँबी है तामें काल बसैहै सो
बेमोरमें जो जीव जायहै तिनको सर्प खाय लेइहै औ जे या शरीर में कौनौ
जीव बसैहै तिनको काल खाइलेइहै ॥ १३१ ॥ *
मन भरके बोये कबौं, घुंघुची भर ना होइ ॥
कहा हमार मानैं नहीं, अन्तहु चले विगोइ ॥ १३२॥
शरीरमें जों घुँघुची भर बासना उठै तौ मन भर की हैजातीहै कहे मनसं-
कल्पाविकल्पकारिकै और बढ़ाइ देइहै मनमें वही भरि रहती है औ मनभर उप-
देशकरै तौ घुँघुची भर ज्ञाननहीं रहै यह मननीचै में जायहै ऊंचेको नहींजाय
सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हम केतौ उपदेश करें परंतु कोई नहीं मानैहैं ताते
अन्तमें बिगोइकै कहे बिगरिकै मरिकै नरकमें जायहैं ॥ १३२ ॥
आपा तजो औ हरि भजो, नख शिख तजो बिकार ॥
सब जिउते निरबैर रहु, साधु मता है सार ॥ १३३॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि जबभर तैं यहि शरीरको आपनो मानैगो तब भर
तेरौ जनन मरण न छूटेगो ताते“अहंशरीरः”मैं शरीर हौं यह जोहै आपा ताको
छोड़िदे तैं तो साहबकों पार्षदस्वरूपहै तामें टिकि तिनको भजनकरु औ नख
शिखमें तेरे कामक्रोधादिक बिकारई देखे परैहैं तिनको छोड़दे औ चिदचित

  • इसके आगे की यह साखी छोड़दी है ।
    “घुंघुची भर जो बौ इया, उपजपसेरी आठ । डेरा परा काल घर, सांझ सकारे बाठ”

( ५८० ) बीजक कबीरदास ।
बिग्रहते सर्वत्र साहिबहीहैं यह भावना करिकै सब जीवनते निर्बैररहु साधु मतकों
यही सारांशहै सब साहबके शरीरहैं तामें प्रमाण ॥ “खं वायुमग्निं सलिलंमहीञ्च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशोद्रुमादीन् । सरित्समुद्राँश्च हरेःशरीरं यत्किञ्चभूतं प्रण-
मेदनन्यः । ” चित् जो है जीव सोऊ शरीरहै तामें प्रमाण ॥ “यश्चात्मनि तिष्ठ
न्नयमात्मानं वेद यस्य आत्मा शरीरम्” ॥ १३३ ॥
पक्षा पक्षी कारणे, सब जग रहा भुलान ॥
निरपक्षै है हरि भजै, तेई संत सुजान ॥ १३४ ॥
और तो सबमायैमें भुलानहै जिनके कछू समझहै ते आपने आपने मतको
पक्ष कीन्हे हैं आनको पक्ष खण्डन करि दौरै हैं सो जे पक्षापक्षी छोड़िकै साहबको
भजै हैं तेई सुजान सन्तहैं ॥ १३४ ॥
माया त्यागे क्या भया, मान तजा नहिं जाय ॥
जेहि माने मुनिवर ठगे, मान सबनको खाय ॥ १३५ ॥
सन्तलोग जो मायाको छोड़िउ दिये तौ कहा भयो मान बड़ाई तौ छोड़िबे
न कियो याही चाहैं कि, हमारो मान होय सो जौने मानमें मुनिवर ठगिगये
हैं सोई सबको खाये लेइहै सो हम पूछै हैं कि जो तिहारो बड़ो मान भयो बड़ी
बड़ाई भई कि फलानेके समान उपासनामें कोई नहीं है ज्ञानमें विद्यामें कोई
नहीं है तौ यासों कहाभयो जाके निमित्त घरछोड़्यो सोतो मिलबई न भयो तेहितें
जो कोई साहबके मिलिबे की संसार छूटिबेकी बात कहै तौ मानिलेइ चाहै
आपने मतको होइ चाहै बिराने मतको होइ काहेते कि साधुको मत यही है
कि संसारछूटै साहब मिलैं औ मानै प्रतिष्ठा भये साधुकहावै या कौने शास्त्रमें
लिखाहै तेहिते साधु वही है जो साहबको जानै ॥ १३५ ॥
घुंघुची भरजो बोइया, उपज पसेरी आठ ॥
डेरा परा काल घर, सांझ सकारे बाठ ॥ १३६ ॥
— यहशरीररूपी क्षेत्रकैसो है कि जो घुँघुची भर बोइजाय अर्थात् उठै तौ आठ
पसेरी कहे मन उत्पत्ति होयहै कालके घरमें डेरा परयो है तेहिते यहशरीरकों

साखी । ( ५८१ )
कहूंसांझ होइ है कहूं सकार होइहै अर्थात् कबँहूं मरिजयहै कबँहूं उत्पत्ति
होइहै औ बाठकहावै बरेठ सो मनमायामें मिलो जो आत्मा सो बरेंठ होइगयो
बरेठमें तीनलहर होयहैं यामें त्रिगुणात्मिका माया बरिगई है सो एककैतिपुण्यकी
गैलहै जप यज्ञ दानते खैंचिकै स्वर्गको लैजायहैं औ एककैति पापकी गैलहै
कामक्रोधादिकते खैंचिकै नरकमें डारिदेईं हैं जब बरेठ टूटिजायहै तब ख्याल
गुलहैजायहै अर्थात् मुक्ति ह्वै जाय है ॥ १३६ ॥
बड़े ते गयो बड़ापनो, रोम रोम हंकार ॥
सतगुरुकी परिचय बिना, चारयो वर्ण चमार॥१३७॥
सबते बड़े को हैं साधु जे संसारको त्याग कीन्हे हैं तिनमें और दोषतों हई-
नहीं हैं काहेते कि संसारको छोडे हैं परन्तु ये चित्अचित् रूप साहबको नहीं
देखै हैं सर्वत्र ते आपने बड़ापनहीं में गये कि हमारी बराबरीको साधु कोई नहीं
है या अहङ्कार रोमरोम बेधि गयो सो सतगुरुतो पायोइ नहीं जो रामनामकों
बतायदेइ जाते साहब याकी रक्षा करें सो साहबके जाननवारे जेसाधु तिनके
बिना परिचय चारिउं वर्ण चमारके तुल्यहैं ॥ १३७ ॥
मायाकी झक जग जरै, कनक कामिनी लागि ॥
कह कबीर कस बाचिहौ, रुई लपेटी आगि ॥ १३८ ॥
झकवाको कहैं हैं कि जैसे या कहैं हैं कि भूतकी झकलगी है सो कनक
कामिनी में लगि मायाकी झकमें बैकलायकै जरै है सो श्री कबीरजी कहैं हैं कि
कनक कामिनीरूप रुई में लपटिकै बिषय आगिसेवन करौ हौ सोकैसे बाचिहौ
अर्थात् जारिही जायगो ॥ १३८ ॥
माया जग साँपिनि भई, विष लै बैठी बाट ॥
सब जग फंदे फंदिया, गया कबीरा काट ॥ १३९ ॥
संसारमें माया साँपिनिभई है सो बिषलैके संसार की जे हैं सबराहै तन
धन कर्म्म तिनमें बैठी है सो सम्पूर्ण जग वाके फंदे में फंदिगयो जोई कबीर
कहैं जीव वे राहनमें चलै है सोई काटा जाय है अथवा कबीरजी कहैं हैं कि

( ५८२ ) बीजक कबीरदास ।
मैं जौनजौनै राहनमें वहसाँपिनि बैठी रहीं है तौने तौने राहनको काटिकै कहैं
बरायकै औरे राह ह्वै चलो गयो ॥ १३९ ॥
सांप बीछिको मंत्र है, माहुर झारे जाय ॥
बिकट नारिके पाले परा, काटि करेजा खाय॥१४०॥
साँपबीछीको बिषमंत्रन ते झारे जायहै औ वह बिकट नारि जो माया है
ताकेंपाले जो पर्यो ताको करेजा काटिकै खायलेइ है अर्थात् साहबके ज्ञाना-
दिकं जे अंतःकरणमें हैं तिनकोखाय है सोई मायाको रूप कहैं ॥ १४० ॥
तामस केरे तीन गुण; भौंर लेइ तहँ वास ॥
एकै डारी तीन फल, भाँटा ऊँख कपास ॥ १४१ ॥
आदितामस जो है अज्ञान मूल प्रकृति तामें रजोगुणी तमोगुणी सतोगुणी
तीनफल लगेहैं सो सतोगुणी ऊँखहै जो ऊँखचुह्यो तौ पहिले रस पान कियों
कहे यज्ञादिक कर्म्म कियो स्वर्ग में जायकै अप्सरानके साथ सुखकियो जब
पुण्यक्षीणभयो तब फेरि संसारमें परे सो यहै हाथमें लग्यो फिरि चौरासीमें भटक-
नलग्यो । औ रजोगुणी कपास है कपासकोलियो कपरा बिनायो पहिरचो ह्याँई
फटिगयो तैसे रजोगुणी कर्म्म कियो तामें राजाभयो सुख भोगकियो दियों
लियो बड़ो यश कियो फेरि फेरि मरिकै जैसो कर्म्मकियो तैसो भयोजाय । औ
तमोगुणी कर्म्मभाँटाहै टोरचो तब कांटालग्यो औ जब खायो तब पुरुष शक्ति
की हानि ह्वैगई अखाद्य लिखै हैं द्वादशी त्रयोदशी इत्यादिक दिनमें जो खायों
तें नरक को गयो ऐसे तमोगुणी कर्म्मते काहूको मारचो तौ मरिगयो औ
पापलग्यो राजाबाँधिकै शूली दियो मारो गयों दुःख पायो सो इहां दुःख पायौं
औ वहां नरकमें दुःखपायो ॥ १४१ ॥
मन मतंग गैयर हनै, मनसा भई सचान ॥
यंत्र मंत्र मानै नहीं, लागी उड़ि उड़ि खान ॥ १४२ ॥
मनरूपी जो हाथी है मतवार सो गैयर कहे आपने अरतेकहे हंठते गवा जो
है जीव अर्थात् साहबको भूलिगयो जो है जीव अथवा गैयर कहे बड़ा जो है

साखी। ( ५८३ )
जीव ताको हनै है सो जब जीव मारे परचो तब मनसा जो है मनोरथ सोई
सचनभयो है कहे शार्दूल भयो सो उड़ि उड़ि याको खायहै अर्थात् जब मरन-
लागै है तब जहैं मनोरथ जायहै तहँ जीव जायहै सोई खायबो है औ यन्त्र
मन्त्र जों नाना उपदेश वेदशास्त्र कहै है सो नहीं मानै है ॥ १४२ ॥
मन गयंद मानै नहीं, चलै सुरतिके साथ ॥
दीन महावत क्या करैं, अंकुश नहीं हाथ ॥ १४३ ॥
मनरूपी जो मतंगहै सो नहीं मानै है सुरतिरूपी जो हाथिनी है ताके साथ
चलै है महाउत जो है जीव सो कहाकरै अंकुश जो नामका ज्ञान सो याके-
हांथई नहीं है ॥ १४३ ॥
या माया है चूहरी, औ चूहरकी जोइ ॥
बाप पूत अरुझायकै, संग न काहुकी होइ ॥ १४४ ॥
या माया चूहरी कहे चाण्डालिनी है औ चूहरैकी जोइहै कहे जीवकी जोइ
हैकै जीवहूको चूहर बनायलियो अर्थात् आपने वश कैलियो सो यह माया
काहूकी सँगनहीं है । मन जो है बाप, पूत जो है ब्रह्म ताको पतिजो है जीव
तासों अरुझाय दियो है ॥ १४४ ॥
कनक कामिनी देखिकै, तू मति भूल सुरंग ॥
बिछुरन मिलन दुहेलरा, केचुलि तजै भुजंग ॥१४५॥
साहब कहै हैं कि कनक कामिनीरूप मायाको देखि तू मतिभुलाय तैं तों
सुरंगहै साहब कहै हैं कि मेरे अनुरागमें रंगनवारो है सो आपने स्वरूप तों
बिचारु यह कनक कामिनीरूप जो मायाहै तौनेमें जो रँगोहै ताको जो छोड़िदै
तौ जैसे भुजंग केचुलि छोड़ि देइहै तब वाको स्वरूप निकरि आवै है तैसे तेरे
चारो शरीर छूटि जायँ तब हंसशरीरपाय मेरे पास आवै ॥ १४५ ॥
मायाके बश सब परे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
नारद शारद सनक औ, गौरी सुत्त गणेश ॥ १४६ ॥
अर्थ याको स्पष्टही है ॥ १४६ ॥

( ५८४ ) बीजक कबीरदास ।
पीपर एकजो महँगे मान । ताकर मम न कोऊ जान ॥
डारलफायनकोऊखाय।खसमअछतबहुपीपरजाय॥ १४७॥
एकपीपरके वृक्षको सबै महँगे मानिलियो है सो वह ब्रह्महै अनुभवगम्य है वाको
मर्म कोई नहीं जानै है कि पीपरको डार लफायकै कोई नहीं खायहै अर्थात् वा
अलखहै कैसेमिली वातो कथनमात्रही है सो साहब कहै हैं कि जीवनको
खसम अछत मैं बनैहौं ताको तौ नहीं प्राप्ति होय वहपीपरजो ब्रह्म ताहीमें सब
चलेजातेहैं सो वह ब्रह्म झाँईं है तामें प्रमाण मूल रमैनीको ॥
“ निर्गुणअलख अकह निरबाना । मन बुधि इन्द्री जाहि न जाना ॥
बिधिनिषेध जहँवाँ नहीं होई । कह कबीर पद झाँईं सोई ॥
पहिले झाँईं झाँकते, पैठो सन्धिक्काल ।
झाँईंकी झाँईं रही, गुरुबिन सकैको टाल” ॥ १४७ ॥
शाहू ते भो चोरवा, चोरन ते भो जुज्झ ॥
तब जानैगो जीयरा, मार परैगो तुज्झ ॥ १४८ ॥
प्रथम शाहु रहे कहे शुद्धरहेहौ सो ब्रह्ममाया मनचोरहैं तिनमें लगिकै तैंहूं
चोर हैगये अर्थात् उपदेश करिकै जीवन के साहब को ज्ञान चोराय लियो
काहूको कह्यो कि ब्रह्म तूही है काहूको कह्यो कि आदिशक्तिको भजु जगतको
कर्त्ता वही है काहूको कह्यो जो मनमें आवै सो करु बन्धमोक्षको कारण मनै
है याही रीति गुरुवाचोरन ते जुज्झ भयो सो तुज्झ कहे तोहीं तबहीं समुझि
परैगो जब यमको सोंटा शीशमें लगैगो तब तब जानैगो कि रक्षकको
भुलाय दियो ॥ १४८ ॥
ताकी पूरी क्यों परै; गुरु न लखाई वाट ॥
ताको बेरा बूड़िहैं, फिरि फिरि अवघट घाट ॥१४९॥
जाको गुरुने साहब के पास पहुँचिबे की बाट नहीं लखाई ताकी पूरी कैसे
परै ताकी बेरा जो है ज्ञान सो अवघटघाटमें बूडि जाइगो अर्थात् जब उनके
शरीर छूटिजायँगे पुनि पुनि जनम मरण होइगो तब वा ज्ञान भूलिजायगो ,१४९॥

साखी । ( ५८५ )
जाना नहीं बूझा नहीं, समुझि किया नहिं गौन ॥
अन्धेको अन्धा मिला, राह बतावै कौन ॥१५०॥
मनमायादिक जो जगतहै ताको न जान्यो कि यह जड़ है मैं इनको नहीं
हौं इनते भिन्नहौं वा ब्रह्मको न बूझ्यो विचारई करत रहिगये अपने स्वरूपकों
न जान्यो कि मैं साहबको अंशहौं समुझिकै नाना मतनमें गौन न किये कि ये
नरक लैजानवारे हैं सो आँधर जे जीव तिनको आँधरै गुरुवालोग मिलें साहब
के यहाँकी राह कौन बतावै ॥ १५० ॥
जाको गुरु है आँधरा, चेला कहा कराय ॥
अंधे अंधा ठेलिया, दोऊ कूप पराय ॥ १५१ ॥
याको अर्थ स्पष्टही है ॥ १५१ ॥
मानस केरी अथाइया, मति कोइ पैठै धाय ॥
एकइ खेते चरत हैं, बाघ गदहरा गाय ॥ १५२ ॥
या संसारमें मनुष्यकी अथाई है तामें धाय कै कोई मति पैठे काहेतें कि
एकइ खेत जो है संसार तामें बाघ जो है जीव औ गदहा जो है मन औ गाय
जो है माया सो एकई संग चरै हैं गदहा मनको कह्यो सो कर्मको बोझा याहीमें
लादिजायहै औ जीव बाघहै समर्थ जो साहबको जानै तौ गायजो है माया
ताको खायजाय अर्थात् नाशकर देइ ॥ १५२ ॥
चारि मास घन वरसिया, अति अपूर्व शरनीर ॥
पहिरे जड़तर बरुतरी, चुभै न एकौ तीर ॥ १५३ ॥
कबीरजी कहैं हैं कि घन जोहौं मैं सो चारि मास जेहैं चारियुग तामें
अतिअपूर्व जो है शरकहे बाणरूपी नीरज्ञान ताको बरसत भयो कहे उपदेश
करतभयो सबजीवनको परन्तु ऐसो जड़तरकहे जड़ौते जड़ बरुतर पहिरे है कि
तीरकहे एकौ ज्ञान नहीं चुभै है अथवा चारिमास हैं चारिउ वेद ते घनकहे
बहुतज्ञानकी वर्षा कियो कहे सबजीवनको उपदेश कियो परन्तु साहब को

( ५८६ ) बीजक कबीरदास ।
कोई न समुझत भयो वेदको अर्थ औरईमें लगाय दियो सब शब्द को सार राम
नाम न जाने सब नरकको चलेगये तामें प्रमाण ॥ “ नाम लिया सो सब
किया, वेद शास्त्रको भेद ॥ बिनानाम नरकै गये, पढ़ि पढ़ि चारौ वेद”॥ १५३॥
गरुके भेला जिव डरै, काया छी जन हार ॥
कुमति कमाई मन बसै, लागु जुवाकी लार ॥१५४॥
कबीरजी कहैं हैं कि गुरुके भेलेमें जिउ डरै है वहगुरुकी भेली कैसी है कि
काया जे हैं पांचौ शरीर तिनको छीजनकहे छोड़ायदेन वारी है सो ये संसारी
जीवनके मनमें कुमतिकी कमाई लगी है ताते जुवाकी लार मानुष शरीर में ला-
गहै न कर्म करतबन्यो तौ नरकगयो कर्म करत बन्यो तौ स्वर्गगये कर्म छूटनको
उपाय नहीं करै हैं लारसंगको कहै हैं पश्चिमकी बोली है ॥ १५४ ॥
तन संशय मन सोनहा, काल अहेरी नित्त ॥
एकै डाँग वसेरवा, कुशल पुछौ का मित्त ॥ १५५ ॥
साहब कहैं हैं संशय जो मन सोई तनमें सोनहाहै जीवन को शिकारखेलै है
औ एक यह काल अहेरी है अर्थात् जब कालमारै है तब मनकी सुरति जहां मर-
तमें जायहै तहां आत्मा जात रहै है तौनै शरीर धारण करै है सो मन सोनहा
काल अहेरी जीव सावज ये तीनों एकैडांग जो शरीर तामें बसै हैं सो हे मित्र!
तुम तौ हमारे सखाहौ भूलिकै यहडाँग जो शरीर तामें कहाँ बसेहौ चारौ शरीरन
का छोड़ि हंसशरीरमें बैठि मेरे पास आवो ॥ १५५ ॥
शाहू चोर चीन्है नहीं, अंधा मतिका हीन ॥
पारिख बिना विनाशैहै, करि विचार हो भीन॥१५६॥
हे अंधा ! हेज्ञाननयनकोहीन तैंतो शाहुरह्यो है चोरजौ है मन ताको तैं न
चीन्हें ताते तैंहूं चोर द्वैगये सो बिचार न कियो कि पारिख बिना बिनाशैहै सो पारि
खतो करु तैंतो चित्तहै औ यह मन जड़हैं तेरो वाकों साथ नहीं बनिपरै है सों
जैसे तैं अणुचित्तहै तैसे साहब विभुचित्तहैं चितचितकों साथहोइहै सो बिचारकरि
यहि मनसे भिन्नह्वै मेरे पास आउ ॥ १५६ ॥

साखी । ( ५८७ )
गुरु सिकिली गर कीजिये, मनहि मसकला देइ ॥
शब्द छोलना छोलिकै, चित दर्पण करिलेइ ॥१५७॥
जो कहौ मनते हम कौनी भाँतिते भिन्नहोइँ तौ गुरु सिकलीगरहै आत्मा तरवारि
है मनादिकनकी काटनवारी है तामें साहबको ज्ञानरूपी मसकलादै रामनाम
छोलनाते अज्ञानरूपी मुरचाछोलि प्रेमकी बाढ़िधरि मनादिकनके काटिबेको समर्थ
करिदेइ अर्थात्चारिउ शरीरको छोड़ि स्वरूपरूपी दर्पण में आपनो हंसशरीर
जानिलेइ कि मैं साहबको अंशहौं ॥ १५७ ॥
मुरुखके समुझावते, ज्ञान गाँठिको जाय ॥
कोइला होइ न ऊजरो, नौ मन साबुन खाय॥१५८॥
यहसाखी को अर्थ प्रसिद्धै है ॥ १५८ ॥
मूढ़ करमिया मानवा, नख शिख पाखर आहि ॥
बाहनहारा का करै, बाण न लागै ताहि ॥ १५९ ॥
मूढ़कर्मी कहे मूढ़ है औ कर्मी है कर्म त्यागको उपाय नहीं करै है ऐसो जो
ह मानुष्य सो नखशिखलौं अज्ञानरूपी पाखरपहिरे है । औ जो मूढ़कर्मी पाठहोय
तौ बानरकी नाईं बाँध्यो है हठ नहीं छांड़ै ॥ १५९ ॥
सेमर केरा सूवना, सिहुले बैठा जाय ॥
चोंच चहोरै शिर धुनै, यह वाहीको भाय ॥ १६० ॥
सेमरका सुवा जोसिहुले कहेमदारेमें बैठिकै चोंच मार्यो जब धुवा निकरचों-
तब शिर धुनै है या कहै है कि या वहीको भाई है अर्थात् जीव संसार सुख लागि-
रह्यो जब कुछ न पायो तब ब्रह्म सुखमें लग्यो कि मोको ब्रह्मानन्द होयगो
सो वहौ बिचार करत जब अठईं भूमिकामें गयो तब अनुभवौ न रहिगयो तब
जान्यो कि जैसे संसारी सुख मिथ्या है तैसे ब्रह्मसुखौ मिथ्या है कुछ नहीं रहि
जाय है अथवा घरछोड़िकै बैरागी भये महन्ती लिये मठ बाँधे चेला भये सो
घरमें एकै मेहरी रही एकै बेटा रहो इहां बहुत चेली भईं बहुत चेला भये

( ५८८ ) बीजक कबीरदास ।
बहुत घर भये न गृहस्थीमें बन्यो न बैराग्यमें बन्यो तामें प्रमाण चौरासी
अङ्गकी साखी ॥
“ घरहु तजिनि तौ अस्थल बाँधिनि अस्थल तजिनि तौ फेरी ॥
फेरी तजिनि तौ चेला मूडिनि यहि बिधि माया घेरी ” ॥ १६० ॥
सेमर सुवना बेगि तजु, घनी बिगुर्चन पाँख ॥
ऐसा सेमर जो सेवे, हृदया नाहीं आंख ॥ १६१ ॥
हे सुवा जीव संसार रूप सेमर को तैं छोड़िदे तैं तो पक्षी है तेरे मेर पास
आवनको पक्ष है कहे तेरे स्वरूपमें मेरे पास आवनकों ज्ञान बनो है जों संसारी
है जायगो माया ब्रह्म में लगैगो तौ मेरे पास आवनेकों तेरे पखना बिगुर्चन
है जायंगे कहे धुवा ऐसो चोंथि डारेंगे नाम नाना ज्ञानमें लगाय देइँगे वाज्ञान
न रहि जायगो सो ऐसे संसाररूपी सेमरको सेवै है जाके हृदयमें आंखी नहीं हैं
मेरो ज्ञान नहीं है ॥ १६१ ॥
सेमर सुवना सेइये, दुइ ढेढीकी आश ॥
ढेढी फूटी चटाक दै, सुवना चले निराश ॥ १६२ ॥
हे सुवना ! जीव संसार सेमरकी दुइ ढेढीकी आश सेवै है सेमरकी दुइ ढेंढी
कौनि हैं एक फूलकी है एक फलकी है औ या संसारमें एक तौ संसारी सुख
है एक परलोक सुख है सो सेमरमें रसकी चाह कियो जब चोंच चहोरचो तब
ढेढी चटाकदै फूटिगई धुवा निकस्योसुवा निराश ह्वैकै चले गये रसकी प्राप्ति न
भई तैसे तैं संसारमें पर्यो जनन मरण छुटावे के वास्ते धोखा ब्रह्ममें लाग्यो
परन्तु जनन मरण न छूटयो ॥ १६२ ॥
लोग भरोसे कौनके, जग बैठि रहे अरगाय ॥
ऐसे जियरै यम लुटै, जस मेढ़ै लुटैं कसाय ॥ १६३ ॥
अरे लोगों यहि संसार में कौनके भरोसे अरगायकै कहे चुपाय कै बैठि रहें
हौ ज्ञान करिकै कि मैंहीं ब्रह्महौं अथवा या मानिकै कि मैंहीं जीवका मालिक हौं
अथवा योग करिकै कुंडलिनी के साथ प्राणको चढ़ायकै ज्योतिमें मिलायकै औ