कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५७८ ) बीजक कबीरदास ।
चित्त अनुसंधान औरै औरै ईश्वरनपर करने लग्यो, औ बुद्धि औरै औरै ईश्वर
नपर निश्चय करनलागी औ अहंकार अहंब्रह्मको बिचार करने लग्यो कि मैं ब्रह्म
हौं । सो हे पण्डितो ! बिचार तौ करो ये चारो जे हैं ते चारोदरमें थून्ही गाड़
दिये बिचार रूप पनहीं उतारिकै कहे साहब को बिचार न करत भये साहबकें
बिचारको पनहीं काहेते कह्यो कि पनहीं पदत्राण कहावै हैं पांयकी रक्षा करै हैं
सो बिचार रूप पनहीं उतारि डार्यो ताते जैसे कांटा बेधि जाय है तैसे नाना
मत नानाप्रकारके भ्रमबेधि गये ॥ १२७ ॥
बलिहारी वहि दूधकी, जामें निकसै घीव ॥
आधी साखि कबीरकी, चारि वेदका जीव ॥ १२८ ॥
वहदूध जो है चारो वेद अथवा और जे भक्तिशास्त्र तिनकी बलिहारी है
जामें घीव रामनाम निकसै है आधी साखी जो है कबीरकी रामनाम सो चारो
वेदका जीव है काहेते जीव है कि चारों वेद याही ते निकसे हैं औ आधी साखी
रामनामै को कह्यो है तामें प्रमाण ॥ “ रामनामलैउचरीबाणी ” । सबको
आदि रामनामही है ॥ १२८ ॥
बलिहारी तिहि पुरुषकी, पर चित परखनहार ॥
सांई दीन्ह्यो खांड़को, खारी बूझ गवाँर ॥ १२९ ॥
कबीरजी कहैहैं कि परचित कहे सबते परे चिद्रूप जो साहब ताकों परखन-
हार जो अणुचित् पुरुष है ताकी बलिहारी है औ जे सांई कहे बयाना तो
खांड़को दीन्ह्यो कि वेदनमें श्रीरामचन्द्रको बूझै ताको छोड़ि खारी जोहैं नाना
मत तिनको वेदन में बूझै हैं वोई मतनकी उपासना करै हैं ते गँवार हैं खारी
जो बहुत खाय तौ पेट काटि देइ है सो नाना मतनमें परिकै नाना दुःख
सहैं ॥ १२९ ॥
बिषके बिरवा घर किया, रहा सर्पलपटाय ॥
ताते जियरै डर भया, जागत रैनि विहाय॥ १३० ॥
बिषको बिरवा जोहै संसार तामें जीव घरकियो जामें कालरूपी सर्प लप-
टाय रह्योहै तेहिते जाके हृदयमें डरभयोहै जागि कै साहबको जान्यो ताकों