कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ५६७ )
कबीर जीको पद ॥
सन्तौ रामनाम जो पावैं । तौ वो बहुरि न भवजल आवैं ॥
जंगमतो सिद्धिहिको धावैं। निशिबासर शिव ध्यानलगावैं ॥
शिवशिवकरतगयेशिवद्वारा । रामरहेउनहूंतेन्यारा ॥
पण्डित चारिउ वेदबखानैं । पढ़ैं गुनें कछु भेदनआनैं ॥
संध्या तर्पण नेम अचारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
सिद्धएकजो दूधअधारा । कामक्रोधनहिंतजैं बिकारा ॥
खोजतफिरैंराजको द्वारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
बैरागी बहुवेश बनावैं । करमधरमकी युगुतिलगावैं ॥
घण्टबजाय करैं झनकारा । रामरहे उनहूतें न्यारा ॥
जंगमजीवकबौंनहिंमारैं । पढ़ैंगुनैं नहिं नामउचारैं ॥
कायहिको थापै करतारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
योगी एकयोग चितधरहीं । उलटे पवन साधना करहीं ॥
योगयुगुतिलै मनमें धारा । रामरहे उनहूंतें न्यारा ॥
तपसी एकजो तनकोदहई । बस्तीत्यागिजङ्गलमें रहई ॥
कन्दमूलफलकरआहारा । रामरहे उनहूंतें न्यारा ॥
मौनी एकजौं मौनरहावैं । और गाउँमें धुनीलगावैं ॥
दूध पूत दैचले लवारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
यती एक बहुयुगुतिबनावैं । पेटकारणे जटाबढ़ावैं ॥
निशिबासर जो करहङ्कारा । रामरहे उनहूंते न्यारा ॥
फुकरा लैजिय जबह कराहीं । मुखते सबतर खुदाकहाहीं ॥
लैकुतकाकहँ दम मदारा । रामरहैं उनहूंते न्यारा ॥
कहैकबीरसुंनोटाकसारा । सारशब्द हम प्रकटपुकारा ॥
जोनहिं मानहिं कहाहमारा । रामरहे उनहूंतें न्यारा ॥ १०० ॥
काल खड़ा शिर ऊपरे, जाग विराने मीत ॥
जाको घर है गैलमें, क्या सोवै निश्चीत ॥ १०१ ॥