कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 610, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५७२ ) बीजक कबीरदास ।
बांह मरोरे जातहौ, मोहिं सोवत लियो जगाय ॥
कहैं कबीर पुकारिकै, यहि पेंडे हैकै जाय ॥ ११५ ॥
मुसलमानमें जे साहबके भक्त होयहैं तें जब भजन न करै हैं तब उनकों पीर
दस्तते दस्त मिलावै है सो दस्तमिलायकै साहब को बताइ देइहैं पास पहुँचाए
देयहैं तिनसों जीव कहै हैं कि हमारी बांहमरोरे चले जाउहौ हम संसारमें सोव
त रहेसो जगाय लियो तब उनके पीर जे हैं कबीर ते कहै हैं कियहि पेंड़े हैकै-
जाउ या कहिकै साहबके जायबेको राहवताय देइहैं तब उनके परमगुरु जे हैं
महम्मद आदिदैके पैगम्बर तिनके इहां पहुँचाय देय हैं तब उनके चेला वह
राहचलि महम्मद के पास पहुँचे हैं तब महम्मद साहबके पास पहुँचावै हैं औ
हिंदुनमें जे श्रीरघुनाथजी को स्मरणकरैं हैं तें गुरुद्वारा हैकै सुमिरनकरै हैं ते
गुरु परमगुरुको मिलावै हैं परमगुरु आचार्यको मिलावै हैं ते साहब को मिलाय
देइहैं जैसे रामानुज मतवारे आपने गुरुकों प्राप्तभये औ गुरु शठकोपाचार्यको
प्राप्तभये औ वे विष्वक्सेनकों प्राप्तकियो जीवको औ वे संकर्षणको प्राप्तकियो औ
वे जानकीजी को प्राप्त कियो जानकीजी श्री रामचन्द्रको प्राप्त कियो कबीरजी
रामानन्दके सम्प्रदायकेँ हैं तेहिते यह सम्प्रदाय संक्षेपते लिखिदियो है ऐसे सब
आचार्य लोग आपने आपने चेलनको साहबमें लगाय देइहैं ॥ ११५ ॥
और १ औरें प्रतिमें इसके पश्चात एक औरि साखी है पर इसमें नहीं दिया ।
बेरा बांधिन सर्पको, भवसागरके माहि ॥
छोड़ै तौ बूडत अहै, गहै तौ डसिहैवाहि ॥ ११६ ॥
पंचमुखी सर्प अहंकार ताके पांचमुखन में पांचमकारकी बाणी निकरी है
प्रथममुख विश्वहै ताते कर्मकांड निकरा औ दूसरामुख तजस तातें योगकांड़
निकरा औ तीसरामुख प्राज्ञ ताते उपासनाकांड निकरा औ चौथामुख प्रत्यगात्मा
१ दूसरी प्रतियोंमें यहाँ पर यह साखी है । पूरन साहबकी टीकाकी ११७वीं
साखी है ।
“साखि पुलंदर ढहि परे, बिवि अक्षर युगचार ।
रसना रम्भन होत है, कै न सकै निरुआर”