कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी। ( ५७५ )
साहबकहै हैं कि अमृतकी मोटरी जो रामनाम ताको तौ शिर तें उतारि
धरयो कहै वाको तौ कोई बिचारकरै है नहीं जासों मैं कहौहौं कि एक मालिक
महींहौं सो मोको दुइचारि बतावै हैं कहै छःबतावै हैं अर्थात् पञ्चांगोपासना
औछठौं ब्रह्म सबको मालिक जो मैंहौं ताको भूलिगये कोई देवीको कोई सूर्य्यको
कोई गणेश को कोई विष्णुको कोई महादेवको मालिक कहै हैं ॥ १२० ॥
जाको मुनिवर तपकरैं, वेद पढ़ें गुण गाय ॥
सोई देव सिखापना, नहिं कोई पतिआय ॥ १२१ ॥
जाके हेतु मुनिवर तपस्या करै हैं परन्तु नहींपावै हैं औ जाको चारों वेदगा-
वै हैं परन्तु गुणको पारनहीं पावै हैं तौनेन साहबको श्रीकबीरजी कहै हैं कि
मैं सिखापनदैकै बताउंहौं कि उनहींके रामनामको जपौ तबहीं संसारते छूटौगे
ताहू में मोको कोई नहीं पतिआयहै अथवा वोई जौन सिखापन दियो है कि
मेरो नाम जपै तौ संसारते उद्धारह्वैजाय तौनै मैं सिखापनदै बताऊं हौं परन्तु
पतिआय नहीं है सो महामूढ़है ॥ १२१ ॥*
एक शब्द गुरुदेवका, ताको अनँत विचार ॥
थाके पण्डित मुनि जना, वेद न पावैं पार ॥१२२॥
एक शब्द जो है रामनाम ताको अनन्त विचार है अर्थात् ताहीते वेद
शास्त्र पुराण नानामत सबनिकसे हैं सों हमारे राममन्त्रार्थ में लिखो है तौनै
रामनामको अर्थ करतकरत पंडित मुनिवेद थकिगये पार न पाये अर्थात् अन-
न्तकोटि ब्रह्मांड में वेद शास्त्र सब याहीते निकसे हैं ये कैसे पारपावैं॥१२२॥
राउर को पिछवारकै, गावैं चारो सेन ॥
जीव परा बहु लूटमें, ना कछु लेन न देन॥१२३॥
राउर जो है साहबको धाम ताको पिछवारे कैदिये हैं चारोसेन जे चारोवेद
तिनके श्रुतिनको नानां उपासनामें नानामतमें लगायकै तिनहीं मतनको उपास-
- अन्य प्रतियों में इस साखीके आगे यह साखी है सो यहां छोड दिया है। साखी
एकते हुआ अनन्त,अनन्त एकैह्वै आया । परचे भई जब एकते, एके माहिं समाया” ॥