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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 614

( ५७६ ) बीजक कबीरदास ।
नाकरि जीव लूटमें पर्यो न कछु लेनहै न कछुदेनहै अर्थात् कछुवस्तु हाथ-
नहीं लगे है ॥ १२३ ॥
चौ गोड़ाके देखतै, व्याधा भागा जाय ॥
अचरज हो यक देखौ, सन्तौ मुवा कालको खाय १२४॥
चौगोड़ा जोहै जीवात्मा ताकें चारिगोड़ जेहैं मन बुद्धि चित्त अहङ्कार
इनहींतें जीवचलैहै तौनेके देखतै कहे जब अपने स्वरूपको चीन्ह्यो कि मैं साह-
बकोअंशहौं तबव्याधा जो है काल सो भागि जायहै निकट नहीं आवै है सो
हेसन्तौ! एकबड़ो अचरजहै जब जीवात्मा स्वरूपको जान्यो तबतों काल भागतहीं
भर है औमुवा कहे मन बुद्धि चित्त अहङ्कार जे चारो गोड़ तिनको औ पांचोश-
रीर छोड़यो तब कालखायही जाय हैं कहे कालकी भयनहीं रहि जायहै हंसशरी-
रमें बैठिकै साहबकेपास जायहै उहाँकालकीभय नहीं है तामें प्रमाण ॥ “ नय-
त्रशोकोनजरानमृत्युर्नात्तिर्नचोद्वेगऋतेकुतश्चित् । यच्चित्तोदःकृपयानिदंविदां-
दुरंतदुःखम्भावानुदर्शनात् ॥ इतिभागवते ॥ यस्यब्रह्मचक्षत्रञ्चउभेभवतओदनम्।
मृत्युर्यस्योपसेवेत क इत्यावेद यत्र सः॥औ वा लोकमें कौनौ शोकनहीं हैं तामेंप्रमाण
धर्म्मदासजीकों पद नामलीलाग्रंथको ॥
“ जहाँ पुरुष सतिमाव तहाँहंसनकीबासा । नहींयमनको नाम नहींह्वां तृष्णआसा ॥
हर्षशोकवाघरनहीं नहींलाभनहिंहानं । हंसापरमअनन्दमें धरै पुरुषकोध्यान ॥
नहिंदेवी नहिंदेव नहीं ह्वाँवेदउचारा । नहिं तीरथ नहिंबर्त्त नहींषट्कर्मअचारा ॥
उतपतिपरलयह्वांनहीं नहीं पुण्य नहिं पाप। हंसापरम अनंदमें सुभिरैसतगुरुआप ॥
नहिंसागर संसारनहीं ह्वां पवनहुँ पानी । नहिं धरती आकाश नहीं ह्वांऔर निशानी ॥
चाँद सूर वा घरनहीं नहीं कर्म नहिं काल। मगन होय नामै गहै छूटि गयो जंजाल ॥
सुरति सनेही होइतासु यम निकट न आवै।परमतत्त्व पहिचानि सत्य साहब मनभावै॥
अजर अमर बिनशै नहीं परम पुरुष परकास। केवल नामकबीरका गाय कहै धर्मदास
तीनि लोक चोरी भई, सबका सरवस लीन्ह ॥
बिना मूड़का चोरवा, परों न काहू चीन्ह ॥ १२५ ॥