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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 608

: ( ५७० ) बीजक कबीरदास ।
मानुष ह्वैकै ना मुवा, मुवा सो डाँगर ढोर ॥
एकौ जीव ठौर नहिं लाग्यो, भया सो हाथी घोर १०८॥
जो कोई साहबके पास पहुँचे सोई मानुषहै अर्थात् साहब द्विभुजहैं यहौ
द्विभुज ह्वैकै साहबकें पास जाइहै औ कबहुँ मरै नहीं है सो साहबकें जाननवारें
नहीं मरैं या पीछे लिखि आयेहैं औ जे साहबको नहीं जानै हैं तेई मरै हैं ते वे
डाँगरढोरहैं ते मानुष नहीं हैं अर्थात् पशुहैं एकौ ठौर में नहीं लागैहैं कहे साह-
बके पास नहीं पहुँचे हैं हाथी घोर इत्यादिक नाना योनिमें भटकै हैं ॥१०८॥
मानुष तैं बड़ पापिया, अक्षर गुरुहि न मानि ॥
बार बार वन कूकूही, गर्भ धरे चौखानि ॥ १०९ ॥
हेमानुष ! तैंतो श्रीरामचन्द्रको अंशहै तेरो स्वरूप मानुष को है सो तैं बड़ो
पापी ह्वैगयो काहे ते किं साहब तोको बारबार गोहरायोःकि तैं मेरो है मेरे पास
आउ सो उनके कहे अक्षर न मान्यों आज्ञा भंगकियो तौने पापते बारबार जों
बनकी कुकुही कहे मुर्गी तिनके कैसोगर्भ चारिउ खानिके जीवनमें परिवारके पाल-
न पोषणमें लागिकै पुनि पुनि जन्मधरत भयो नानादुःख सहत भयो इहाँ
मुर्गी याते कह्योहैं कि बच्चा बहुतहोयहैं ॥ १०९ ॥
मनुष बिचारा क्या करै, कहे न खुले कपाट ॥
श्वान चौक बैठायकै, पुनि पुनि ऐपन चाट ॥११०॥
वेद शास्त्र पुराण इनकेकहे जो कपाटनहीं खुलै हैं अर्थात् ज्ञाननहीं होयहै तौ
मानुष बिचारा क्याकरै प्रथम साहबको कह्यो नहीं मान्यो याते मानुष पशुवत्
ह्वैगयो अज्ञान घेरे है सो जो कूकुर कुकुरिया को बिवाहकरै चौकमैं बैठाइये तौ
वे पुनि पुनि ऐपनै चाटै हैं तैसे जीवनको पशुवत् ज्ञान ह्वैगयो है फेरि फेरि
वही बिषयमें लागै हैं साहबकी ओर नहीं लागै हैं ॥ ११० ॥
मनुष बिचारा क्याकरै, जाके शून्य शरीर ॥
जो जिउ झाँकि न ऊपजै, काहि पुकार कबीर॥१११॥