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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 611

साखी। ( ५७३ )

तातें ज्ञानकांड निकरा औ पांचौँमुख निरंजन तातें अद्वैतबिज्ञान निकरा सो ऐसें
पंचमुखी सर्पमें बेराको बांध्यो आपने मनसे कल्पिकै भवसागर अनुमानकियो
ताको मान्यो तब ये नरदेहमें पंचमुखी सर्प अहंकार उठा तौने अहंकारकों
पहिरिकै वामें सब जीवचढ़े भवसागरपार होनके वास्ते सो अब जो बिचार करिकै
छोड़ाचाहै तौ भवसागरकी भय लागै है कि बूड़ि जायँगे औ धरे रहैं हैं तौ
सर्पदसै हैं सो पंचशरीराहंकार सर्पको बेराबने पर सब वाहिमें आरूढ़ हुये बेरा
समुद्रकै पार नहीं जायसकै हैं तीरहीमें रहिगये सो न बेराको गाहिसकै न बेराको
छोड़िसकै संसारसागरमें बूड़ते उतराते हैं ॥ ११६ ॥
कर खोरा खोवा भरा, मग जोहत दिन जाय ॥
कविरा उतरा चित्तसों, छाँछ दियो नहिं जाय ॥ ११७ ॥
गुरुमुख—जे साहबकें जनहैं ते कौनी भांतितें जाने जायहैं कि पूरहैं सर्वत्र साहब
को देखै हैं हाथमें खोवा भरा कटोरा लीन्हे राह जोहैं हैं कि कोई आवै खाय सो
सर्वत्र तो साहिबको देखै हैं ताते जोई आयकै खायहै ताको साहबै जानै है औ
साहिबै मानिकै आदरकरै हैं औ खोवा खवावै हैं औ कबहूं पुरुषबचन नहीं
बोलैहैं ते जीव साहबके प्यारे हैं औ जिनसों मारे दौरै हैं ते कबीर कायाकें बीर
जीव साहबके चित्तते उतरि जाय हैं अर्थात् वे मुक्ति कबहूं नहीं पावै हैं संसार
हीमें परै हैं। अथवा यह साखी गुरुमुख है ताते यह अर्थ है साहबकहैं हैं कि
खोवा भरा कटोरा हाथमें लियेहौं रामनाम उपदेश करौहौं यह कैसो है कि
कहतमें सरल है फिरि कायाको कलेश कौनौ न करनपरै औ सबको अधिकार है
जैसे खोवा खातमें न कौनौ अरसाहै न कौनौ श्रमहै ऐसे रामनाम रूपी खोवा
उपदेशरूप लियेहौं जो कोई याकों खाय अर्थात् स्मरणकरै तो मैं वाको संसारतें
छोड़ायदेउँ जो मेरें पास आवै तौनेकों। सोहे कायाके बीर कबीरजीव ! जो नहीं
ग्रहणकरै हैं तेमेरे चित्तमें उतरि जायहैं उनको छाँछऊ मोसों दियो नहीं जाय अरु
ज्ञानादिक कर्मादिक के फलतौ मैं देउहौं सोउनके उत्तम कर्महूंके फलमोंसो नहीं
दिये दै जायँ अर्थात् मेरो चित्तनहीं चाहै है कि छाँछ जे हैं ज्ञानादिक ते उनकें
उत्तम कर्मादिकके फलदेउँ सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि अबै साहब समुझावै