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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 609

साखी । ( ५७१ )
या मानुष बिचारा क्याकरै जाके शरीरमें शून्य जो धोखाब्रह्म सो समाय रह्यो
है सो धोखाब्रह्मको झाँकिउ कहे देखिउ चुक्यौ कि यहां कुछ बस्तुनहीं है औ
साहबको ज्ञान न उपज्यो तौ कबीरंजी कहै हैं कि मैं काको पुकारौं वहतौ बड़ो
अज्ञानी है बूड़िगयो जो प्रत्यक्ष देखों नहीं मानैहै किं यह शून्यही है यामें कछू
न मिलैगो तो मेरो कह्यो कैसे सुनैगो ॥ १११ ॥
मानुष जन्महिं पायकै, चूकै अबकी घात ॥
जायपरै भवचक्रमें, सहै घनेरी लात ॥ ११२ ॥
चौरासीलाख योनिनमें भटकत भटकत ऐसो मानुष शरीरपायकै अबकी जो
घातचूक्यो साहबकों न जान्यो तौ संसारचक्र में परैगो और यमकी घनेरी
लातैं सहैगो ॥ ११२ ॥
ज्ञान रतनको यतन करु, माटी का श्रृंगार ॥
आया कविरा फिरिगया, झूठा है हंकार ॥ ११३ ॥
साहबके ज्ञानरतनकों यतनकरु जांते साहब को ज्ञानहोय यहजो माटीकहें
शरीरको श्रृङ्गार करै है सो अनित्यहै कबीरांकहे कायाको बीर जीव यह संसा-
रमें आया और फिरिगया तबशरीर पराय जाताहै यह जो अहंकार करताहै
कि हम शरीरहैं हमब्राह्मणहैं क्षत्रियहैं वैश्यहैं शूद्रहैं सोसब झूठे हैं औ जो फीका
है संसार यह जो पाठहोय तौ यह अर्थ है कि साहब के ज्ञानरतनको जों
यतन करै है ताको या संसार फीकै लगेहै जो कोई दाखको खानवारो है ताको महुवा
फीकै लगै है ॥ ११३ ॥
मनुष जन्म दुर्लभ अहै, होय न दूजीवार ॥
पक्का फल जो गिरिपरा, बहुरि न लागैडार ॥ ११४ ॥
यह मानुष जन्म तिहारो बड़ो दुर्लभहै जोन अबैहो तौन फिरि न होउगे
पक्काफल गिरिपरै है तौ पुनि वह डारमें नहींलगै है अबै साहबके जानिबेकों
समयहै सो साहबको जानिलेउ ॥ ११४ ॥