कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
साखी। ( ५३३ )
शब्द विना श्रुति आंधरी, कहौ कहांको जाय ॥
द्वार न पावै शब्दको, फिरि फिरि भटका खाय ॥ ४ ॥
श्रीकबीरजी कहैहैं कि, श्रुति जो है सो शब्द जो है रामनाम ताके बिना
आंधरी है । काहेते कि, रकार मकार श्रुति की आंखी हैं ताके बिना कहांको
जाय । सो शब्द जो रामनाम है तौनेको द्वार नहीं पावै अर्थात् अर्थ नहीं
जानै । रामनाम तो साहबमुख अर्थमें मन बचनके परे पदार्थ बतावै है और या
श्रुति नेति नेति कहि बतावै है । याते रामनामको साहब मुख अर्थ नहीं कहि
सकैहै । याते यामें परिकै जीव फिरि २ भटका खायहै । ज्ञान, भक्ति, बिज्ञान,
योग; बतावै है फिर फिरि नेति नेति कहि कहि देइहै, याते जीव भटकाखा-
इहै । उहां बस्तु कुछ नहीं पावै है जो रामनामको साहब मुख अर्थ जीव जानि-
कै लगावै तौ सब श्रुति लागि जायँ । औ सबके परे पदार्थ सो जानि जाहिं ।
काहेते बिना आंखी कोई नहीं देखै । जौनी तरहते राम नामते सब श्रुति
लागिजायहैं औ अनिर्वचनीय पदार्थ मालूम होयहै सो पीछे लिखि आये हैं ॥ ४ ॥
शब्द शब्द बहु अंतर हीमें, सार शब्द मथि लीजै ॥
कह कबीर जेहि सार शब्द नहिं, धिग जीवन तेहि दीजै ५
जहां जहां अन्तर तहां तहां बहुत शब्द देखे हैं। औ तुम रामनामको अनि-
र्वचनीय है श्रुति की आँखी हैं या कहौ हौ सो कैसे होइगो ? एकशब्द - वोहू
होइगो? सो या ऐसो नहींहै सार शब्दहै जब सब शब्दनको मथै तब वा जानि
परै । सो श्री कबीरजी कहै हैं कि, जेहि को सार जो रामनाम सो नहीं मथि-
लियोहै, ताको जीवन संसार में धिगहै । “सारशब्द मतलींजै” जो यह पाठ
होइ तौ सारशब्द रामनाम ताको मतिलेइ । और जे मतिहैं ते कुमतिहैं तेहिको
छोड़िदे । रामनाम वर्णन सब श्रुति की आंखी हैं तामें प्रमाण ॥ “आखर मधुर
मनोहर दोऊ । वरण बिलोचन जन जिय जोउ”॥ १ ॥ “मुक्तिस्त्रीकर्णपूरे-
र्मुनिहृदयवयःपक्षीतीरभूमिः संसारापारसिंधोः कलिकलुषतमस्तोमसोमार्कबिम्बे।
उन्मीलत्पुण्यपुंजद्रुमललितदलेलोचनेचश्रुतीनां कामंरामेतिवर्णौशमिहकलयतां
'ततंसज्जनानाम् ॥ ५ ॥
( ५३४ ) बीजक कबीरदास ।
शब्दै मारा गिरि गया, शब्दै छोड़ा राज ॥
जिन जिन शब्द विवेकिया, तिनको सरिया काज ॥६॥
श्री कबीरजी कहैं हैं कि शब्दजो रामनामतौनैको जगत्मुख अर्थमें वेदशा-
स्त्र पुराण नानामतजे निकसे हैं तामें जो परचो सो गिरगया अर्थात् संसारमें
परचो औ जिन जिन शब्द विवेकिया कहै सब शब्दनते बिचारकरि सारशब्द-
जो रामनाम ताकोजानि लियो सोई संसाररूप राजको छोड़िदिये हैं औ तिनहीं
को काजसरियाकहै सिद्धभयो है ॥ ६ ॥
शब्द हमारा आदि का, पल पल करै जो यादि ॥
अंत फलैगी माहली, उपरकी सब वादि ॥ ७ ॥
गुरुमुख । साहबकहैंहैं हे जीवो ! हमारा शब्द जो रामनाम सोई आदिको है
अर्थात् याहीते प्रणव वेदशास्त्र बाणी सब निकसे हैं सो याको आदिकहे स्मरण
जो पल पल कहे निरन्तर करैगो तौ अन्तमें फलैगी साकेत जो हमारो महल-
ताको माहली होइगो बसैया होइमो अर्थात् तहांको जाइगो और ऊपरके जे सब
नाना मतहैं ते वादि कहे मिथ्या हैं अथवा और सब ऊपरके मत बाद विवादहैं ॥७
जिन जिन संबल ना किया, अस पुर पाटन पाय ॥
झाल परे दिन पाथये, संबल किया न जाय ॥ ८ ॥
श्री कबीरजी कहैं हैं कि, अस पुरपाटन जो या मानुष शरीर तौनै को पाय
कै, जिन जिन पुरुष संबल न किया कहै सम्यक् प्रकार बल न कियो अर्थात्
मनादिकनको न जीति लियो, साहब को न जान्यो । अथवा संबलकहे जमा,
सो परलोक की जमा रामनामको न जानि लियो । अथवा सन्बलकहे कलेवा
सो जो कलेवा साधन लै न लियो अर्थात् भजन न कै लियो सो दिन अथये कहैं
शरीर छूटे झालिपरे अर्थात् चौरासी लाख योनि में परचो अब सबल कियो
नहीं जायहै ॥ ८ ॥
इहई सम्बल करिले, आगै विषमी वाट ॥
सरग बिसाहन सब चले, जहँ बनियां नाहिं हाट ॥ ९ ॥
साखी । ( ५३५ )
इहई कहै यहीं संसारमें सम्बल कहे कलेवा सम्पन्न करिले आगें ।
विषमी बाट कहे कठिन दुखदाई बाटको, सो श्री कबीरजी कहै हैं कि,
आगे न जाने कौनी योनि में परैगो और वहाँ कछु किये होइगो कि नहीं ।
अथवा जो या कहो कि, स्वर्गमें विसाहन करि लेउँगे अर्थात् सौदा करि-
लेउँगे अर्थात् वहँ साहबको जानन वारो कर्म करिलेउँगे । तो वहां न बनियां
है न हाट है अर्थात् वह तो भोगभूमि है कर्म भूमि नहीं है स्वर्ग के शरीर
से केवल मृत्यु लोकमें किये कर्मनको भोग होइहै कर्म करिवे को स्थानतो या
मनुष्य शरीर औरे या मृत्यु लोकही है । ताते श्री कबीरजी कहै है हे जीवो !
यहांहीं सुकर्म करि लेउ ॥ ९ ॥
जो जानौ जिव आपना, तो करहु जीवको सार ।
जियरा ऐसा पाहुना, मिलै न दूजी वार ॥ १० ॥
हे जीवो! जो अपने स्वरूप को जानो तो जीव का सार जो सार शब्द
तामें रकारके समीप मकार अपने स्वरूपको करौ अर्थात् साहबको जानि साहबको
होउ । सो हे जीवो ! रा अर्थात् रामनाम ऐसो पाहुना दूजी बार ना मिलैगो । भाव
यह है कि, याही मनुष्य शरीर में मिलैगो और कहीं ना मिलैगो ॥ १० ॥
जो जानहु पिव आपना, तो जानौ सो जीव ।
पानिपचावहु आपना, पानी मांगि न पीव ॥ ११ ॥
जो आपनां पीव जे साहब हैं तिनको जानौ तो हम तुमको जानें कि, तुम
जीव हौ । पानिप जो शोभा सो जो अपनी शोभा ( प्रतिष्ठा ) चाहो तौ
पानी जे गुरुवा लोगोंकी नाना वाणी है तिनको मांगिके ना पिउ अर्थात् गुरुवन
ते अपने साहबको ज्ञान मत लेउ वे तो ठग हैं तुझे ठग लेउँगे ॥ ११ ॥
पानि पियावत क्या फिरो, घर घर सायर बारि ।
तृषावन्त जो होयगा, पीवेगा झख मारि ॥ १२ ॥
साहब कहैं हैं श्रीकबीरजीसे । हे कबीर ! मेरो उपदेश रूप पानी जीवन
को पियावत घर घर का ( क्या ) फिरो हौ । सबके समुद्र भरो है अर्थात्
( ५३६ ) बीजक कबीरदास ।
सब अपनी २ वाणी और कल्पना में मस्त हैं । जो तृषित होइँगे अर्थात् मुक्तिको
चाहैंगे तो तुम्हार उपदेश रूपपानी झख मारिके कहे लाचार ह्वै कै आपै पियेंगे ।
समुद्रका खाराजल त्यागि देंगे ॥ १२ ॥
हंसा मोती बिकानिया, कंचन थार भराय ।
जो जस मर्म न जानिया, सो तस काह कराय॥१३॥
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि, हे विवेकी जीवौ ! हे हंसो ! कंचन थार रूप जो
तुम्हारे अन्त करणः तामें मोती रूप साहब को ज्ञान मोते भराओ अर्थात् मैं तौ
तुमको उपदेश देऊँहौं तुम कहा बिकत फिरौ हौ । जौन जस पदार्थ होइ है तौने
को तस न जानत है तौ वाको लै कै का करै ।
अथवा-कबीरजी कहैं हैं हे हंसो ! हे जीवो ! मोती जो निर्मल शुद्धरूप
आपना स्वरूप तौनैंको कंचन थार जो माया तौने में भरिके विकनिडारे अर्थात्
कनक कामिनीमें लगाई कै मायाके हाथ बेचिडारे । सो जो जौने तराते
आपने स्वरूपको न जानि सक्यो सो जाहिमें जैसौ लग्यो ताहिमें तैसो ह्वै अज्ञान
भयो । अब कहा करै मायामें फंसिकै मरिगै ॥ १३ ॥
हंसा तुम सुवरण वर्ण, का वरणौं मैं तोहि ।
तरवर पाय पहेलि हो, तबै सराहौं छोहि ॥ १४ ॥
हे हंसा जीव ! तुम सुवरण जे मकार ताके बर्णहौ, मैं तोंही का वरणौं
अर्थात् तुमहूं मन बचनके परे हौ सो तरिवर जो या संसार ताको जब
पाइके पहेलिहो कहे ठेलि जैहो अर्थात् संसार को दूरि करि दैहो तबही मैं तो-
को छोह करिके सराहौं गौ कि बड़े बन्धनमें बंधिके छूट्यो ॥ १४ ॥
हंसा तू तो सबल था, हलकी अपनी चार ।
रंग कुरंगी रंगिया, किया और लगवार ॥ १५ ॥
हे हंसा जीवो ! तुमतो सबल कहे सम्यक् प्रकार बलवाले थे ( तेहोरो
साहबौ सबलहै ) परंतु अपनी चार कहे अपनी चालते हलुक कहे निबल ह्वै
गयो काहेते कि रंग कुरंग जो या संसार है तौनेमें रंगिगै कहै राग करि लियो।
और राग करिकै और लगवार कहे नाना मतनमें जाइके नाना मालिक बना-
वतभै । धुनि यहहै कि, अपने स्वरूपको देखु ॥ १५ ॥
हंसा सरवर तजिचले, देही परिगै सुन्नि ॥
कहै कबीर पुकारिकै, तेई दर तेइ थुन्नि ॥ १६ ॥
हे हंसाजीव! विना साहबके जाने या सरवररूपी शरीर तजिकै जाउगे तब
या देही सुन्नि परिजायगो अर्थात् मरिजयगी। सो श्री कबीरजी कहै हैं कि,
हम पुकारिकै कहै हैं बिना साहबके जाने तेई दर तेई थूनी बने हैं अर्थात्
नये तलायेमें लाठि गाड़ि जाइहै सो जहँ जायगो तहँ देहरूपी सरवरमें बासन ।
रूपी दरमें कर्मरूपी थून्हि गाड़ि लेउगे। पुनि पैदा होइगो जनन मरण न
छूटैगो ॥ १६ ॥
हंसा बक यक रंग लखिये, चरैं एकही ताल ॥
क्षीर नीर ते जानिये, बक उघरै तेहि काल ॥ १७ ॥
बकुला और हंस एकही रंग होइहैं और एकही ताल में चरै हैं,परन्तु जब
नीरक्षीर एक करिकै धारिदियो वे दूध पीलिये पानी रहिगयो तब जानिपरे
हंसहै । औ नीर क्षीर जुदो कीन न भयो तब जान्यो कि बगुला है । ऐसे
टीका कंठी माला टोपी सब बराबरै होइ हैं जब बिचार करनलग्यो मन माया
ब्रह्म जीव इनते साहबको अलग मान्यो तौ जान्यो कि ये हंस हैं जो मनमाया
ब्रह्म जीव ते अलग न कियो साहब को तौ जान्यो कि ये बगुलाहैं ॥ १० ॥
काहे हरिणी दूबरी, चरै हरियरे ताल ॥
लक्ष अहेरी एक मृगा, केतिक टोरो भाल ॥ १८ ॥
जीव कहै है कि हे हरिणी! बुद्धि तैं काहे दूबरी ह्वै रही है । संसार रूपी
हरियरे तालमें चरिकैं यह संसारतालमें लक्ष तौ अहेरी कहे मारनवारोहै सो
तैं केतिक भार टारोगे मरिही जाइगो । सो हरियर है जौने तालमें तौनैमें काहे
( ५४० ) बीजक कबीरदास ।
मकार है। सो जरदबुन्द कहे जरद रज स्त्रीको और बुन्द वीर्य्य पुरुषको ये दुन-
हुनके संयोगते शरीररूप कुकुही जीवके लागि गई । जैसे खेतनमें कुकुही लगि
जाइ है सो कबीरजी कहै हैं कि, याको भीतर विचार करि देखो तो यहि जीव
को स्वरूप जानि परै । कुकुही छुड़ाइबो जैसे कुकुहीते अन्ननाश है जाइ है
ऐसे याहु शरीररूप कुकुही जीवके लगी है सो एकही शुद्धता को नाश कै
देइ है ॥ २५ ॥
पांच तत्त्व लै या तन कीन्हा, सो तन लै कह कीन्ह ।
कर्महिके वश जीव कहतहै, कर्महिको जिय दीन्ह २६
या पांच तत्त्वनको लैके या शरीर कियो सो या शरीर लैके तैं कौन काम
कीन्ह्यो, कर्मके बश हैकै मेरो अंश जो जीव सो कर्महि को देत भयो । मेरो
हैकै अर्थात् कर्मके बश हैकै संसारी भो जीव सो कौन बड़ो काम कियो जीव
कहवावन लग्यो ॥ २६ ॥
पांच तत्त्वके भीतरे गुप्त वस्तु अस्थान ॥
विरल मर्म कोइ पाइहै, गुरुके शब्द प्रमान ॥ २७ ॥
पांच तत्त्वको जो या शरीर ताके भीतर जो गुप्तवस्तु जीवात्मा है ताको
स्थान है ताको मर्म कोई बिरला पावै है कि, यह नित्य कौनको है यामें गुरु
जे साहब हैं तिनका शब्द जो रामनाम सोई प्रमाण है । तौनेको अर्थ विचार
करै तौ या जानि लेहि कि जीव साहेबको है ॥ २७ ॥
अशुनत खत अड़ि आसनै, पिण्ड झरोखे नूर ॥
ताके दिलमें हौं बसौं, सैना लिये हजूर ॥ २८ ॥
अशुन कहे शून्य नहीं वा निराकारके परे अशून्य जो साहबको तख्त आडिकै
तामैं आसन कैकै अर्थात् ध्यानमें रत पिण्ड जो है शरीर ताके झरोखा जे हैं
नेत्र तिनते साहबको जो कोई नूरदेखै कि, सब साहिबैको प्रकाश पूर्ण है सर्वत्र
ताके दिलमें आपने परिकरते सहित बसौहौं ॥ २८ ॥
साखी । ( ५४१ )
हृदया भीतर आरसी, मुखतो देखि न जाय ॥
मुखतो तबहीं देखिहौं, जब दिलकी द्विविधा जाय॥२९॥
हृदय भीतर जौ आरसी है तौनेमें आपनेरूपको जो मुख सो नहीं देखों
जायहै वा बिचारकरिकै देखो जाइहै सो मुख जो तुम्हारो स्वरूप सो तबहीं
देखिहौं जब मैं मोर या द्विविधा जात रही कि, चित अचित रूप सब साहबैके
देखो गे ॥ २९ ॥
ऊँचे गाँव पहाड़ पर, औ मोटे की बाँह ॥
ऐसो ठाकुर सेइये, उवरिये जाकी छाँह ॥ ३० ॥
जोगांव ऊँचेपर होइहै तहां बूड़ाकी भयनहीं होइहै, जाके जबरेकी बांह
होइहै ताको डर नहीं होयहै ऐसे ऊँचो गांव जो साकेत, तहां साहब जे हैं
तिनकी जहां बांह है ऐसे जे साहबहैं तिनकी बाहैंकी छांहमें टिकौ जाते
उबरौ । उहां मायाके बूड़ाको डर नहीं है इहाँ मन मायादिकनमें परेहौ इनमें
कालते न बचोगे ॥ ३० ॥
ज्यहि मारग गे पण्डिता, तेही गई बहीर ॥
ऊँची घाटी रामकी, त्यहि चढ़ि रहे कबीर ॥ ३१ ॥
जौने मार्गमें राम नाम जाने बिना पण्डित गये, वही मार्ग ह्वै मूर्खो जात
भयें अर्थात् पापीपुण्यवान सबवहीयमपुरी गये । कबीर जी कहै हैं कि,
ऊँची घाटी जो रामनाम तामें आरूढ़ह्वैकै हे कायाके वीर कबीर माया के बूड़ाते
बचिजाउ ॥ ३१ ॥
हे कबीरतैं उतरि रहु, सँवल परोह न साथ ॥
सबल घटे औ पग थके, जीव विराने हाथ ॥ ३२ ॥
गुरुवालोग मोको समझायो हे कबीर ! तैं ऊँचीघाटी जो राम नाम तौनेते
उतरिरहु न तेरे संबलकहे कलेवा है न परोहनकहे बाहन साथहै । सो संबल
औ पगु जब थाकैगो तब जीव तो बिराने हाथ ह्वै जाइगो । जो हमारेपास
आवोगे तो ज्ञान योगादिक सम्बल बतावेंगे । अहंब्रह्मास्मि बाहनदेंगे तामें
आरूढ़ह्वैकै संसारसमुद्र पार ह्वै जाइगो ॥ ३२ ॥
( ५४२ ) बीजक कबीरदास ।
घर कबीरका शिखर पर, जहां सिलि हिली गैल ॥
पांय न टिकैं पिपीलिका, खलक न लादे बैल॥ ३३ ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे गुरुवालोगौ ! हमारा घर शिखर जो रामनामहै
तामें है । तहां गैल चिकनीहै चींटी जो बुद्धिहै ताहीके पांय नहीं टिकैहैं अर्थात्
वा मन बचनकेपरेहैं रामनाम औरस्वरूपहै तहां तुम पहुंचि न सकौ हौ ताते
बिछुल गैल हौ उहां नाना मत शास्त्र रूप लाद लादे बैल जे हैं गुरुवा ते नहीं
जाइ सकैहैं । अर्थात् सूक्ष्म बुद्धिहू नहीं जाइसकै हैं तौ तुम जे नाना मतनको
लाद लादेहौ सो कैसे जाइ सकौहौ जहां मैं टिकौहौं तहांभारि तुमहूं पहुंचि
सकतै नहींहौ कहां कलेवा देउगे कहां बाहन देउगे ॥ ३३ ॥
बिन देखे वहि देशकी, बातैं कहै सो कूर ॥
आपै खारी खात हौ, बेचत फिरत कपूर ॥ ३४ ॥
श्रीकबीरजीकहैहैं कि, जौने शिखरमें हम चढ़े हैं तौने देशको बिन! सतगुरु
द्वारा देखे जे बात वहांकी कहैहैं ते कूरहैं । अर्थात् तुम हमको उतरन शिख-
रते बिना जाने कहौहौ सो तुमहीं कूरहौ । कैसे हौ आपतोखारी जे नाना मत
तिनको ग्रहण कीन्हेहौ स्वच्छ उज्ज्वल कपूर जो है ज्ञान ताको बेंचत फिरौहौ।
अर्थात् द्रव्य लै कै चेला बनावत फिरौहौ । भाव यहहै कि, नामको भेद नहीं
जानौ हमारे इहां कैसे पहुंचौगे ॥ ३४ ॥
शब्द शब्द सबको कहैं, वातो शब्द विदेह ॥
जिह्वा पर आवै नहीं, निरखि परखि कर लेह ॥ ३५ ॥
शब्द शब्द सबकोई कहैहैं परन्तु वा शब्द जो रामनामहै सो विदेहहै बिना
शरीरका है जिह्वा में नहीं आवै है मन बचन के परे है ताको ज्ञानदृष्टिते निर-
खिकै पारिख करिलेहु ॥ ३५ ॥
परवत ऊपर हर बसै, घोड़ा चढ़ि वस गाउँ ॥
बिन फुल भौंरा रस चखै, कहु विरवाको नाउँ ॥ ३६ ॥
साखी। ( ५४३ )
पर्वत आगे जीव ब्रह्मको कहिआये हैं सो पर्वत जो ब्रह्म ताके ऊपर हर जो
माया सो है अर्थात् सबलित द्वैकै संसारकी उत्पत्ति करै है । सो घोड़ा जो है
मन तौनैमें गाउँ जो संसार है सो बसे है अर्थात् मनैमें सब संसार है बिनफु
ल कहे या संसार तरु को फूल विषयहै सो मिथ्याहै कछु बस्तु नहीं है तौनेको
रसमौंरारूप जीव चाखैहै सो वा बिरवाको नाउँ तो कहु ? नाम संसार मिथ्याहै
जौन याको सांचनाम है ताको कहु। ताको तैं ध्वनी यहहै नहीं जाने है ॥ ३६॥
चन्दन वास निवारहू, तुझ कारण वन काटिया ॥
जिवत जीव जनि मारहू, मुयेते सबै निपातिया॥३७॥
हे चन्दन जीव ! अपनी बासना तू निवारणकरु । काहेते कि,मैं तेरे कारण
जौनै गुरुवनकी नाना बाणी नाना मतनमें तुम लाग्यो तिनकी बाणी रूप बन
काटि डारचो अर्थात् खण्डन करिदारचो जाते तुमको ज्ञानहोय । सो बासना
में परिकै जीवत जीव तुम अपनो न मारो । जो वामें लागि जाहुगे तौ तुम्हारो
जीवत्व जात रहै गो मरिजाहुगे । वाही धोखामें लगिकै आपको ब्रह्म मानन
लागोगे तब निपातिया कहे सब साहबके ज्ञानको निपात द्वैजाइगो ॥ ३७ ॥
चन्दन सर्प लपेटिया, चन्दन काह कराय ॥
रोम रोम बिष भीनिया, अमृत कहाँ समाय ॥ ३८ ॥
चन्दन जो जीवहै सो कहाकरै है । सर्प जेगुरुवालोगहैं ते लपटिरहे हैं सो
उनकी बाणी को जो है बिष सो रोमरोम बिषे भेदि गयो है हमारो उपदेश
जो अमृत सो कहां समाय ॥ ३८ ॥
ज्यों मुदादि समसानासिल, सब यक रूप समाहिं ॥
कह कबीर साउज गतिहि, तबकी देखि भुकाहिं ॥३९॥
जैसे मुदादि समसानसिल होइहै सो जो कोई देखै है ताको मुरदैलैरूप देखि-
परै है । सो कबीरजी कहै हैं कि, गुरुवालोगनकी बाणीरूप सिलमें तबकी कहे
सृष्टिके आदिमें आपनीगतिदेखै हैं कि, तबहूँहम ब्रह्मरहेहैं या मानिके भोंकै हैं
कि, हमहीं ब्रह्महैं । अथवा ज्यों मुदादि कहे मुदको आदि ब्रह्म ज्योंकहे कैसे
जैसे मसानते सहित सिल पाथरकेभुतहा चौरा, जेइ वा चौरामैं बैठै हैं सोअभु-
( ५४४ ) बीजक कबीरदास ।
आइहैं कहै हैं मैं फलानो भूतहों आपनो रूप भूलिजाइहैं ऐसे जेई गुरुवालोगन-
की बाणी उपदेश में परै हैं ताहीके एकरूप ब्रह्म समाइ है यही कहै हैं कि,
मैंहीं ब्रह्म हौं औ सब ब्रह्मही है एकरूप दूसरो पदार्थ नहीं है । सो श्रीकबीरजी
कहै हैं साउज जो जीवहै ताकी तबकी गति गुरुवालोग कहै हैं तब तुम ब्रह्मही
रहेहौ आपने अज्ञानते तुम जीवत्वको धारणकीन्हेहौ अबहूं जो ज्ञानकरो तों
ब्रह्मही है जाहु या मानिकै उपदेश जीव भोंकै है कि हमहीं ब्रह्महैं अर्थात् जैसे वा
पण्डा भूतन्हीं है जाइहै जीवहीरहै है ऐसे न ब्रह्म रहे हैं न ब्रह्म होइगो । भोंकै-
पदके शक्तिते दूसरो दृष्टांत ध्वनित होइहै जैसे कृकुर कांचके मन्दिरमें आपनो
प्रतिबिम्ब देखि भूंकै है ऐसे अपने भ्रमते गुरुवनकी वाणीरूप ऐनामें आपनो
रूप ब्रह्महीदेखै हैं भूंकै हैं, यह नहींजानै हैं कि हम साहबके हैं या गुरुवालो-
गनकी बाणी में ब्रह्मदेखोपारै है सो हमारे मनहींको अनुभवहै ॥ ३९ ॥
गही टेक छोडै नहीं, चोंच जीभ जरिजाय ॥
मीठो काह अँगारहै,ताहि चकोर चवाय :॥ ४० ॥
ब्रह्मवादिन की टेक कैसी है जैसे चकोर को ओठ जीभ जरै है परन्तु
अँगारै को चाबै है ॥ ४० ॥*
झिलमिल झगरा झूलते, बाकी छुटी न काहु ॥
गोरख अँटके कालपुर, कौन कहावै साहु ॥ ४१ ॥
झिलमिल झगरा कहे दशमुद्रा करिकै बंकनालते खिरकीकेराह लैजाइकै
वहज्योति जो झिलमिलाइहै तामें आत्माको मिलाइ देइहै पुनि षट्चक्रते झिलिकै
गैबगुफा में जो ब्रह्मज्योतिहै तामें मिलिकै औ झगराकरिकै कहे कामक्रोधादि-
कनको दूरिकरिकै पुनि संसारमें झूलिपरे है अर्थात् जबसमाधि उतरि आई तब-
फेरि वही झगरामें झूलिपरे सो कर्मकीबाकी काहूकी नहीं छूटै है सब कर्म भोग-
करै है । जो गोरखै कालपुरमें अँटके अर्थात् उनहींको जो काल खाइलिह्यो तों
और दूसरो कौन शाहु कहावै है कौनकालते बच्यो है । जो बहुत जियो योगी
- और २ प्रतियों में ४१ वी साखी यह है । चकोर भरोसे चन्दके, निगले तत्त
अँगार । कहै कबीर दाहै नहीं; ऐसीवस्तु लगार ॥ ४१ ॥
साखी । ( ५४७. )
तो कल्पान्तमें कोई नहीं रहिजाय है जो कोई रहिगयो जलबढ़्यो तो जलमें मि-
लिकै रहिगये अग्नि बढ़ी अग्नि में मिलिकै रहिजाइ है तो महाप्रलय में नहीं
रहि जाइ है ॥ ४१ ॥
गोरखरसिया योगके, मुये न जारी देह ॥
माँसगली माटी मिली, कोरो माँजी देह ॥४२॥
जो कहौ गोरख तो बने हैं तो प्रलयादिकनमें वोऊ न रहेंगे । योग के रसि-
या जे हैं गोरख ते ऐसो योग हजारन बर्ष कियो कि मर्योतौ देहको न जारयो
मांसगलिकै माटीमें मिलिगयो तब कोरो कहे मांजी कहे शुद्धचर्म देह गोरखकी
कढ़िआई आखिरपर वहौ प्रलयादिकनमें न रहैंगी । सो उनकीदेह मुयो कहै
ऐसो योग कियो कि जाते अज्ञान न रहिगयो संसार छुटि गयो संसारते मरिगये
कै उनकी सूक्ष्मादिक देहौ मर्यों पर न जरी जब देह न जरी तब पुनि २ संसार
में आवते भये कल्पान्तरनमें सो कल्पान्तरमें गोरख आदिदै कै योगी सब आवै हैं
सो आगे कहै हैं ॥ ४२ ॥
बनते भगि बिहड़े परा, करहा अपनी बानि ॥
वेदन करह क सों कहै, को करहाको जानि ॥ ४३ ॥
बन जो है संसार तौनेतें भागिकै बिहड़ जो है अटपट गैले ब्रह्म तामें पर्यों-
जाइ । सो यह जीवको सदा स्वभावई है कि, प्रलयादिकनमें ब्रह्ममें गयो औ
पुनि करहा कहे करहि आयो संसार में जन्म लियो शरीर धारणकियो । सो
यहजीव संसार योगादिक साधन कियो । सो यह वेदन कहे पीड़ा जीव कासों
कहै औ शरीर काहेते करहि आयो यह को जानै जैसे आम्रादिक वृक्ष करहि
आवै हैं कहे फूलिआवै हैं फेरि फरै हैं अपनी ऋतुपाइकै तैसे जब महाप्रलया-
दिकभये तब लीन होइ गयो जब उत्पत्ति प्रकरणभयो तब फेरि करहिआये
कहे शरीर धारणकिये पुनि नानाकर्म करिकै नाना फल पावन लगे ॥ ४३ ॥
बहुत दिवस सों हीठिया, शून्य समाधि लगाय ॥
करहा परिगा गाड़में, दूरि परे पछिताय ॥ ४४ ॥
३५
( ५४६ ) बीजक कबीरदास ।
जीव बहुत दिन समाधि लगाइकै शून्यमें हीठिया कहै भ्रमत भये कि,
हमारो जन्म मरण छूटै । सो हजारन कल्प समाधि लगाये रहे जब समाधि
उतरी तब पुनि जैसेके तैसे हैगये । अथवा हजारन बर्ष ब्रह्ममें लीनरहे जब
सृष्टि भई तब पुनि संसाररूपी गाड़में परिकै पछितान लगे । पछिताइबो कहा
है कि वही बासना लगीरही ताते पुनि नाना साधन करनलगे कि हमारो जन्म
मरण छूटै ॥ ४४ ॥
कबिराभ्रमनभाजिया, बहुविधि धरियाभेव ॥
साईंके परिचयविना, अन्तररहिगोरेख ॥ ४५ ॥
कबीर जे हैं कायाके बीर यहजीव सो बहुत भांतिके वेष धरत भयो योगी
ह्वैकै योग करत भयो, ज्ञानी ह्वैकै ज्ञान करत भयो, भक्त ह्वैकै भक्ति करत भयो
कर्मकाण्डी ह्वैकै, कर्म करत भयो पै जिनको यहजीव अंश है ऐसे जे हैं सांई
परमपुरुष श्रीरामचन्द्र तिनके बिना जाने याको भ्रम न भाजत भयो । जो मुक्त
हू ह्वै गयो आपने को ब्रह्महू मानतभयो तो मूलाज्ञानरेख याके रहीगई काहेतें
कि, यह जाको है ताको तो जान्यो नहीं योग कियो, ज्ञान कियो भक्ति कियो, औ
नाना कर्म कियो, ताते पुनि संसारहीमें पर्यो, कौन रक्षा करै, रक्षकको तों
बिसराइ दियो ॥ ४५ ॥
बिनडांड़े जग डाँड़िया, सोरठ परिया डांड ॥
बांटन हारा लोभिया, गुरते मीठी खांड ॥ ४६ ॥
यह संसारमें जीव बिना काहूके डांड़े डांड़िया कहे सब डारि जाते भये ।
अर्थात् आपनेही कर्मते साहबको ज्ञान भूलिगये । औ सोरठ या देश बोली है ।
सोरठै फल देउ दशउ फल देउ सो ये सोरठै उपाय बतायो चारि वेद छःवेदांग
छःशास्त्र, ई सोरठते ब्रह्मा साहब को उपदेश इनको कियो, पै ये सब अपनें
अपने कर्ममें लगिगये । उनको वा सोरठकहे सोरठै जौन ब्रह्मा उपाय बतायो
तौन उनको डांडपर्यो । डांड़ वह कहावै है जौन बन कटिके मैदान हैजाय है
सो उनको चारि वेद छःवेदांग छःशास्त्र ई जे सोरठ हैं ते डांडपर्यो कहे वामें
साहब को खोज न पायो । साहबको बिचार उनको दिखाइ न पर्यो । अनतही
साखी । ( ५४७ )
अनतही लगावैहै वेद शास्त्रका अर्थ करि काहेतें न पायो कि बांटनहारोजो ब्रह्मा
हैं सो लोभी रह्यो है कहे रजो गुणीहै सो बहुत चोराइकै कह्यो परोक्ष कह्यो जातें
कोई न पावै। औ जे जानतभये ब्रह्माको उपदेश ते गुरु जे ब्रह्माहैं तिनहूंते
अधिकह्वैगये अर्थात् गुरुगुरुही रह्यो चेला खांड ह्वैगयो अर्थात् गुरते मीठी
खांड होईहै काहेते ब्रह्माते अधिक ह्वैगये कि, ब्रह्मा गुणको धारण किये हैं औ
वे सगुण निर्गुणके परेकी बात जाने हैं ॥ ४६ ॥
मलयागिरिके बासमें, वृक्ष रहा सब गोइ ॥
कहिबेको चंदन भया, मलयागिरि ना होइ ॥ ४७ ॥
मलयागिरि चन्दनके वृक्षके बासमें सब वृक्ष गोइरहे कहे मलयागिरिकै बास
सबमें आँयगई, कछू मलयागिरि नहीं ह्वैगई । ऐसे तिनको साहबको ज्ञानभयो
तिनमें साहबको गुण आइगये शुद्धह्वै गये कछू साहब न ह्वैगयो । जो कहो
ब्रह्मातो चारिवेद छःवेदांग छःशास्त्र जे सोरठहैं तिनते सबको उपदेश कियो
ताको गुप्तार्थ और लोग काहे न समझ्यो एक साहबको जनैयै काहेते जान्यो तोने
को अर्थ दूसरी साखीमें दिखावै हैं ॥ ४७ ॥
मलया गिरिके वासमें, वेधा ढाक पलाश ॥
बेनाकबहूंन बेधिया, युगयुगरहियापास ॥ ४८ ॥
मलयागिरिके बासमें ढाक पलाश सब बेधि गये औ बेना जो है बांस सो
युगयुग मलयागिरि के पासरहै है पै वामें बास न बेधत भई ! अर्थात् और
वृक्षन भीतर सार रह्यो तेहिते बास बेधिगई ! औ बांसके भीतर सार न रह्यो
ताते बास न बेधत भई । अर्थात् और जे अज्ञानिउ रहे तिनके अन्तःकरणमें
शून्य नहीं रह्यो सो जो कोई उपदेश कियो तो साँच मानिकै समुझि लिये
औ जिनके भीतर वह शून्य ब्रह्मधोखा घुसो रह्यो ते और ऊपरते खण्डन कर-
नलगे और और अर्थ वेदशास्त्र के बनाइ लियो ते न बासि गये कहे उनको साहबको
रंग न लग्यो चारों युगमें वेदशास्त्र सब पढ़तई रहे ॥ ४८ ॥
चलते चलते पगुथका, नगर रहा नौ कोस ॥
बीचहिमें डेरा पर्यो, कहौ कौनको दोस ॥ ४९ ॥
( ५४८ ) बीजक कबीरदास ।
चलत चलत थकि गयो वह नगर नव कोश रह्यो । सो नवकोशमें एकौ
कोश न चलि सक्यो, तौ दशौ कोश जहां साहबको मुकाम है तहां कैसे जाय-
सकै । दशौ कोश दशौ मुकाम रेखतामें लिखियाये हैं । सो बीचै में याको
डेरा पर्यो बीचही में रहिगयो ताते जन्म मरण होन लग्यो, तो कौन को
दोषहै । साहबके पास भर तो पहुँचिबोई न कियो । औ मुसलमाननके मतमें
बहत्तर हजार परदाके ऊपर जब गयो तब नव परदा बाकी रहिजाय हैं तौनै
कोश है दशयें में साहबहै ॥ ४९ ॥
झालि परे दिन आँथये, अन्तर परिगै साँझ ॥
बहुत रसिकके लागते, बेश्या रहिगै बाँझ ॥ ५० ॥
यहि साखी में अर्थ कोऊ यह कहै हैं कि, प्रपंच करतेकरते औ विषय
रस लेते लेते बुढ़ाई आई। औ वेद शास्त्र पुराण नानाबाणी पढ़तेपढ़ते औ कर्म्म
उपासना तपस्या योग बैराग्य करते करते थके । आखिर गुरुपद पारिखकी
प्राप्ति नहीं भई यकदिन मौत आइ पहुँची तब आँखिन पर झालिपरी कहैं
अँधियारीपरी । औ दिनकहिये ज्ञान सो गाफिली में डूबि गया । औ हमारो
अर्थ यहहै ॥
झालि पर कहे जब दिन अथवा कहे आयुर्दाय घटी तब गिरिपरे कहैं तब
बीमारहुये इन्द्रिय शिथिलभई तब अन्तःकरणमें अँधियार ह्वैगयो कहे कुछ न
सूझि परन लग्यो तब जैसे बहुत रसिकके संग ते बेश्या बांझ रहि जाइ है तैसें
गुरुवा लोगनकी नाना प्रकारकी बाणी को उपदेश सुनि सुनिकै शून्य ह्वैगये ।
न ज्ञान भक्ति उत्पत्ति भई औ साहब न प्राप्त भये ॥ ५० ॥
मन तो कहै कब जाइये, चित्त कहै कब जाउँ ॥
छा मासेके हीठते, आध कोश पर गाउँ ॥ ५१ ॥
मन संकल्प बिकल्प करिकै आत्मा को स्वरूप खोजै है कि आत्मा कैसों
है ? औ चित्त स्मरण करै है कि आत्माको स्वरूप कैसो है ? सो छा मास
जो हैं छहू शास्त्र तौनेमें हीठत कहे स्वरूपको खोजतई गये, पै वह गाउँ आ-
त्माको स्वरूप मकार आध कोश में कहे अर्धनाम रकार ताके निकटही रह्यो
पै खोजे न पायो ॥ ५१ ॥
साखी। ( ५४९ )
गिरही तजिके भये उदासी, बन खँड तपको जाय ॥
चोली थाकी मारिया, बरइनि चुनि चुनि खाय॥ ५२ ॥
घर छोड़िकै जगतते उदास भये, वन पहारमें बैठे जाय । साहब को तो
न जान्यो । शरीर औटिकै तपस्या करन लगे । सो या मारतें कहे कन्दर्प
तें चोली थकिगई कहे वीर्यकी हानि ह्वै गई जब वृद्ध ह्वै गये तब जैसे चोली
बरइनि की थकिगई तब बरइनि सरे सरे पान निकारिडारै है नये नये पान
चुनिचुनिकै खायहै । तैसे माया जो है बरइनि कहे ज्ञानभक्ति को बरायदेनवारी
कहे दूरि करनवारी सो पुरान पुरान जे शरीर हैं तिनको निकारि डारयों
नये नये सुन्दर दै कै स्वर्गादिकनको सुख दियो । राजाबनायो, धनवान् बनायो
भोग कराइ कराइकै उनको माया मृत्युरूप खाय लियो । ज्ञानी भक्तियोगी
तपस्वी कोई नहीं बचै हैं जे साहब को जानैं हैं ते बचै हैं ॥ ५२ ॥
( ५५२ ) बीजक कबीरदास ।
सुखं मया दैत्याश्चहरिणा हताः। तज्ज्योतिर्भेदनेसक्ता रसिका हरिवेदिनः"। औ
साहब के लोकमें जे हैं तिनकी सर्व्वत्र गति है तामें प्रमाण ॥ “सस्मृत्युन्त
रतिससर्व्वेषु लोकेषुकामचारो भवति ”॥ इति श्रुतेः ॥ ६० ॥
दोहरा तो नव तन भया, पदहि न चीन्है कोइ ॥
जिन यह शब्द विवेकिया, छत्र धनी है सोइ ॥ ६१ ॥
सेव्य सेवक भाव मान्यो साहबको जान्यो तब दोहरा नव तन भया कहैं
हंस शरीर पायो, परा भक्ति पायो तौनै पदकहे साहबके लोकमें प्रवेशकरै है
सों वो लोकको नहींचीन्है । जो कहौ ब्रह्मरूप हैकै कैसे सेव्य सेवक भाव
साहबते कियो तुम बनायकै कहौ हौ तौ श्रीकबीरजी कहै हैं जिन यहशब्द
द्विवेकिया कहै जिन साहब यह बिबेककारि शब्द बतायो सोई छत्रधनी है
अर्थात् साहिबै मोको बतायो है मैं बनायकै नहीं कहौं हैं तामें प्रमाण ॥
श्रीक
साखी। ( ५५३ )
अथवा हम जौनचाल बतावैं हैं तौने चाल नहींचलते हो औ हमारो नामलेतेहो
कि, हम कबीरपंथी हैं। सो लम्बी टोपी दीन्हे औ बिना छिद्रको चंदन दिये औ
बहुत साखी शब्द कण्ठ करलिये हमारे फिरका न पावोगे मतको न पावोगे यमके
धक्काते न बचोगे। तामें प्रमाण॥ "हमारा गाया गावैगा। अजगैबी धक्कापावैगा ॥
मेराबूझायबूझैगा। सोतीनलोकमेंसूझैगा" ॥१॥ कबीर की साखी शब्दी पढ़िकै
और बितण्डाबाद अनर्थ करनेलगे औ परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको वेदशास्त्रको झूठक-
रनलगे आपने जीवै को सत्य करनलगे ते यमको धक्का पावैचाहैं । औजे कबीरकी
साखी बूझिकै औ परमपुरुष श्रीरामचंद्रको अंशहै जीव श्रीरामचंद्र याके रक्षकहैं
ऐसो जे बूझ्यो ते तीनलोकमें सूझबई करेंगे काहेते उनके रक्षक परमपुरुष
श्रीरामचंद्र तो बनेई हैं सर्वत्र रक्षा करिलेईहैं ॥ ६२ ॥
सबते सांचा है भला, जो सांचा दिल होइ ॥
सांच बिना सुख नाहिं ना, कोटि करै जो कोइ ॥६३॥
जो आपना साँचादिलहोइ तो सबते साँचे जेपरमपुरुष श्रीरामचंद्र औउन्हींको
अंशजीवहै औ उन्हींको मैं साँचो दासहौं यह मत सबते साँचहै सोईभलाहै। सो
यह साँच मत बिना सुख काहूको नहीं है कोटिन उपायकरै । औ श्रीरामचंद्र
सत्यहैं औजीव सत्यहै औ जीवको औ श्रीरामचंद्रको भेदसत्यहै तामेंप्रमाण ॥
"सत्यंभिदः सत्यंभिदः" ॥ इत्यादि औ श्रीकबीरजीकी साखिहूको प्रमाण ॥
"सत्य सत्य समरथ धनी सत्य करो परकाश । सत्यलोक पहुँचावहू, छूटै
भवकी आश ॥ ६३ ॥
साँचा सौदा कीजिये, अपने मनमें जानि ॥
साँचे हीरा पाइये, झूठे मूरौ हानि ॥ ६४ ॥
आपने मनमें पारिखकै लीजिये तब साँचा सौदा कीजिये कहे ऐसी खानि
खुदाइये जाते साँचे हीरा पाइये वही में कच्चे हीरा निकसैं हैं तिनको छाड़िदी-
जिये । ऐसे वेदपुराण खानिहैं तिनमें साहबको मत निकासि लीजिये यह साँचों
सौदा कीजिये और मतनको त्यागि दीजिये काहेते झूठे मत मैं लागे आपनों
स्वरूप जो है साहब को अंश मूर ताकी हानिह्वैजायहै अर्थात् भुलिजायहै॥६४॥
( ५५४ ) बीजक कबीरदास ।
सुकृत वचन मानै नहीं,आपु न करै विचार ॥
कहैं कबीर पुकारिकै, सपन्यो गो संसार ? ॥ ६५ ॥
सुकृतसाहब अथवा सुकृतसन्त अथवा सुकृत बचन जो मैं कहौंहौं कि साह-
बको भजनकरो सो नहीं मानै हैं जो मनमें आवै है सो विचारकरै हैं । सों
कबीरजी पुकारिकै कहैंहैं का उनको स्वप्न्यो में संसार गयो ? अर्थात् स्वप्नेहूमें
संसार नहीं गयो यह काकुहै ॥ ६५ ॥
लागी आगि समुद्रमें,धुआँ प्रकट नहिं होइ ॥
की जानै जो जरि मुवा, की ज्याहि लाई होइ ॥ ६६ ॥
समुद्रमें आगिबड़वाग्नि लगी है औ वाको धुआँ नहीं प्रकट होइहै सो वाकों
सो जानै है जो वामें जरिजाय कि जाकी वह बड़वाग्नि लाई कहे लगाई होय सो
जानै अर्थात् संसारमें मायाब्रह्म की अग्नि लगिरही है ताको वही जानै जाकोग्यान
भयोहोय या समझैकि माया ब्रह्मकी अग्निमें हम जरेजाय हैं । अथवा सो जानै
जाकी अग्नि बनाई है संसार रच्यो है ॥ ६६ ॥
लाई लावनहारकी, जाकी लाई पर जरै ॥
बलिहारी लावन हारकी, छप्पर वाचै घर जरै॥ ६७ ॥
यहअग्नि किसकी लगाई है ताकेलायेते सगुणनिर्गुण जेदोनों परहैं ते जरै हैं
औ घरजे हैं पांचों शरीरते जरिजाते हैं तामें प्रमाण ॥
श्रीकबीरजीको पद ।
“ अबतौ अनुभव अग्निहि लागी । घेरि घेरि तन जारन लागी ॥
यह अनुभव हम कासों कहिये बूझै कोउ बैरागी ॥
ज्येठरी लहुरी दोनों जरिया जरी कामकी बारी ।
अगम अगोचर समुझि परै नहिं भयो अचम्भौ भारी ॥
सम्पति जरी सम्पदा उबरी ब्रह्म अगिनि पसारी ।
कहै कबीर सुनो हो सन्तौ बड़ी सो कुशल परी ॥ ६७ ॥
बुन्द जो परा समुद्रमें, सो जानै सब कोइ ।
समुद्र समाना बुन्दमें, बूझै बिरला लोइ ॥ ६८ ॥
साखी। ( ५५५ )
यहब्रह्म ईश्वर माया आदिदै कै जो संसारसागरहै तामें बुन्द जो जीवहै सो
पर्यो या सबै जानैहैं कि जीव संसारी ह्वैगयो है वेदशास्त्रमें सर्वत्र लिखैहै अरु
यह सिगरो संसारसमुद्र बुन्दरूप जीवमें समायजाय है अर्थात् ईश्वर मायाब्रह्ममय
जो संसार ताको जीवही अनुभव करि लियोहै सो जबजीव याभांतिते अनुभवत्यागै
कि बिषय इंद्रीमें इंद्रीमनमें मन चित्तमें चित्त प्राणमें प्राण जीवात्मामें लीनकैकै
दैदे तब संसारसागर बुन्दरूप जीवमें समायजायहै अर्थात् संसार मिटिजायहै
जीव साहबको जानि जाय है ॥ ६८ ॥
जहर जिमी दै रोपिया, अमि सींचै सौ बार ॥
कविरा खलकै ना तजै, जामें जौन विचार ॥ ६९ ॥
जिमीमें जहर को थलहादै कै जो बीज बोवै है सो वामें जो सैकड़ों बार
अमृतौ सींचै तो वहि बीजा में जहरको असर आयबोई करैगो तैसे यह खलक
कहै संसारमें मायाकी जिमी है विषय को थलहा है ताते केतिकौ कोई उपदेश
करै परन्तु मायाको असर कबिरा जे जीव हैं तिनके आयही जाय है जोई
बिचारआवै है सोई करै हैं सो संसार नहीं छोड़ैं ॥ ६९ ॥
दौकी दाही लाकरी, ऊभी करै पुकार ॥
अबजो जाउँ लोहार घर, दाहै दूजी बार ॥ ७० ॥
दावानलकी दाही कहे जरी जो लकरी है सोई लाई भई वहै पुकारिकै
कहै है कि अब जो लोहारके घरजाउं तो दूजी बार लोहार मोको दाहै कहै
जारै । सो दावाग्नि जोहैं ब्रह्माग्नि तौनेते जो सम्पूर्ण कर्म जरिहुगे तौ कोयला
रहिजायहै कहे वहै कैवल्य शरीर रहिजायहै । सो कहै हैं कि, जो अब लोहार
जे सतगुरु हैं तिनके इहां जाउं तौ कैवल्यौ शरीर छूटै मुक्त ह्वै जाउँ अर्थात्
जो साहब को न जान्यो औ कर्म सब जरिगये तो कैवल्य शरीर रहिगयो
अर्थात् सब संसारहीमें आवैहैं। जो कैवल्य शरीर छूटै तो हंस शरीते मुक्त
ह्वै जाय काहेते कर्मनके जरे कैवल्यशरीर नहींछूटैहै ॥ ७० ॥
विरहकि ओदी लाकरी, सपचै औ गुंगुआय ॥
दुखते तबही बाचिहौ, जब सगरो जरिजाय ॥ ७१॥
(५५६) बीजक कबीरदास ।
बिरहकी जरी लांकरीहै अर्थात् याको साहब को बिरहभयो है सोवह बिर-
हते ओदी है याहीते सपचै है औगुंगुआयहै नानादुःखपावैहै सो जब पांचौशरीर
जारिजायहैं हंसशरीरपाय साहब के पासजायहै तब दुःखते बचैहै । जो कहौ
इहांतो सगरोशरीर को जरिजायबों कह्यो हंस शरीरको जरिबो काहे न कह्यों
तो हंसशरीर याको न होय वा साहबके दिये मिलै हैं त्यहिते याहीके पांचौ
शरीर जबजरैहैं तब सतई जगह भूमिकाते नाघिकै आठई भूमिकामें जायहै तब
चितमात्र रहिजायहै तब साहब हंसशरीर देइहैं तामें टिकिकै साहबके पासजा-
यहै सो पाछे लिखि आये हैं ॥ ७१ ॥
विरह बाण ज्यहि लागिया, औषध लगत न ताहि ॥
सुसुकि सुसुकि मरि मरि जियैं, उठै कराहिं कराहि ॥७२॥
साहबको विरहरूपीबाण जाकेलग्यो अर्थात् जिनको यहजानिपर्यो कि हमतें
साहबते बिछोहुद्वै गयोहै ते विरहवारनको ज्ञान योगादिक औषध नहींलगै है
बिरहबाणाग्निते तन जरै है मरिमरि जियैहै । याजो कह्यो सो बिरहाग्निते जरै
है स्थूलशरीरको जब अभिमान छूट्यो तब सूक्ष्मशरीरमें जियो, जबसूक्ष्म
शरीर छूट्यो तब कारण शरीरमें जियो, जब कारणशरीरछूट्यो तब महाकारण
शरीरमें जियो, जब महाकारण शरीर छूट्यो तब कैवल्यशरीरमें जियो, यही
मरिमरिजीबोहै । औ तहौं कराहि कराहि उठैहै कहे एकौ शरीर नहीं आछे
लगै हैं ॥ ७२ ॥
सांचा शब्द कबीरका, हृदया देखु विचार ॥
चितदै समझै मोहिं नहिं, कहत भयल युगचार ॥७३॥
साहब कहैं हैं कि साँचाशब्द जो कबीरका राम नाम ताको हृदयमें बिचा-
रिकै देखु तो तैं चित्तदैके नहीं समझै है । मोको चारोंयुग वेद शास्त्रमें कहत-
भयो । औ कबीरजे हैं तेऊ चारोंयुगमें कहतआये हैं । सत्ययुगमें
सत्यसुकृत नामते त्रेतामें मुनीन्द्रनामते । द्वापर में करुणामय ना-