कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५५४ ) बीजक कबीरदास ।
सुकृत वचन मानै नहीं,आपु न करै विचार ॥
कहैं कबीर पुकारिकै, सपन्यो गो संसार ? ॥ ६५ ॥
सुकृतसाहब अथवा सुकृतसन्त अथवा सुकृत बचन जो मैं कहौंहौं कि साह-
बको भजनकरो सो नहीं मानै हैं जो मनमें आवै है सो विचारकरै हैं । सों
कबीरजी पुकारिकै कहैंहैं का उनको स्वप्न्यो में संसार गयो ? अर्थात् स्वप्नेहूमें
संसार नहीं गयो यह काकुहै ॥ ६५ ॥
लागी आगि समुद्रमें,धुआँ प्रकट नहिं होइ ॥
की जानै जो जरि मुवा, की ज्याहि लाई होइ ॥ ६६ ॥
समुद्रमें आगिबड़वाग्नि लगी है औ वाको धुआँ नहीं प्रकट होइहै सो वाकों
सो जानै है जो वामें जरिजाय कि जाकी वह बड़वाग्नि लाई कहे लगाई होय सो
जानै अर्थात् संसारमें मायाब्रह्म की अग्नि लगिरही है ताको वही जानै जाकोग्यान
भयोहोय या समझैकि माया ब्रह्मकी अग्निमें हम जरेजाय हैं । अथवा सो जानै
जाकी अग्नि बनाई है संसार रच्यो है ॥ ६६ ॥
लाई लावनहारकी, जाकी लाई पर जरै ॥
बलिहारी लावन हारकी, छप्पर वाचै घर जरै॥ ६७ ॥
यहअग्नि किसकी लगाई है ताकेलायेते सगुणनिर्गुण जेदोनों परहैं ते जरै हैं
औ घरजे हैं पांचों शरीरते जरिजाते हैं तामें प्रमाण ॥
श्रीकबीरजीको पद ।
“ अबतौ अनुभव अग्निहि लागी । घेरि घेरि तन जारन लागी ॥
यह अनुभव हम कासों कहिये बूझै कोउ बैरागी ॥
ज्येठरी लहुरी दोनों जरिया जरी कामकी बारी ।
अगम अगोचर समुझि परै नहिं भयो अचम्भौ भारी ॥
सम्पति जरी सम्पदा उबरी ब्रह्म अगिनि पसारी ।
कहै कबीर सुनो हो सन्तौ बड़ी सो कुशल परी ॥ ६७ ॥
बुन्द जो परा समुद्रमें, सो जानै सब कोइ ।
समुद्र समाना बुन्दमें, बूझै बिरला लोइ ॥ ६८ ॥