कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ५४७. )
तो कल्पान्तमें कोई नहीं रहिजाय है जो कोई रहिगयो जलबढ़्यो तो जलमें मि-
लिकै रहिगये अग्नि बढ़ी अग्नि में मिलिकै रहिजाइ है तो महाप्रलय में नहीं
रहि जाइ है ॥ ४१ ॥
गोरखरसिया योगके, मुये न जारी देह ॥
माँसगली माटी मिली, कोरो माँजी देह ॥४२॥
जो कहौ गोरख तो बने हैं तो प्रलयादिकनमें वोऊ न रहेंगे । योग के रसि-
या जे हैं गोरख ते ऐसो योग हजारन बर्ष कियो कि मर्योतौ देहको न जारयो
मांसगलिकै माटीमें मिलिगयो तब कोरो कहे मांजी कहे शुद्धचर्म देह गोरखकी
कढ़िआई आखिरपर वहौ प्रलयादिकनमें न रहैंगी । सो उनकीदेह मुयो कहै
ऐसो योग कियो कि जाते अज्ञान न रहिगयो संसार छुटि गयो संसारते मरिगये
कै उनकी सूक्ष्मादिक देहौ मर्यों पर न जरी जब देह न जरी तब पुनि २ संसार
में आवते भये कल्पान्तरनमें सो कल्पान्तरमें गोरख आदिदै कै योगी सब आवै हैं
सो आगे कहै हैं ॥ ४२ ॥
बनते भगि बिहड़े परा, करहा अपनी बानि ॥
वेदन करह क सों कहै, को करहाको जानि ॥ ४३ ॥
बन जो है संसार तौनेतें भागिकै बिहड़ जो है अटपट गैले ब्रह्म तामें पर्यों-
जाइ । सो यह जीवको सदा स्वभावई है कि, प्रलयादिकनमें ब्रह्ममें गयो औ
पुनि करहा कहे करहि आयो संसार में जन्म लियो शरीर धारणकियो । सो
यहजीव संसार योगादिक साधन कियो । सो यह वेदन कहे पीड़ा जीव कासों
कहै औ शरीर काहेते करहि आयो यह को जानै जैसे आम्रादिक वृक्ष करहि
आवै हैं कहे फूलिआवै हैं फेरि फरै हैं अपनी ऋतुपाइकै तैसे जब महाप्रलया-
दिकभये तब लीन होइ गयो जब उत्पत्ति प्रकरणभयो तब फेरि करहिआये
कहे शरीर धारणकिये पुनि नानाकर्म करिकै नाना फल पावन लगे ॥ ४३ ॥
बहुत दिवस सों हीठिया, शून्य समाधि लगाय ॥
करहा परिगा गाड़में, दूरि परे पछिताय ॥ ४४ ॥
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