कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(५५६) बीजक कबीरदास ।
बिरहकी जरी लांकरीहै अर्थात् याको साहब को बिरहभयो है सोवह बिर-
हते ओदी है याहीते सपचै है औगुंगुआयहै नानादुःखपावैहै सो जब पांचौशरीर
जारिजायहैं हंसशरीरपाय साहब के पासजायहै तब दुःखते बचैहै । जो कहौ
इहांतो सगरोशरीर को जरिजायबों कह्यो हंस शरीरको जरिबो काहे न कह्यों
तो हंसशरीर याको न होय वा साहबके दिये मिलै हैं त्यहिते याहीके पांचौ
शरीर जबजरैहैं तब सतई जगह भूमिकाते नाघिकै आठई भूमिकामें जायहै तब
चितमात्र रहिजायहै तब साहब हंसशरीर देइहैं तामें टिकिकै साहबके पासजा-
यहै सो पाछे लिखि आये हैं ॥ ७१ ॥
विरह बाण ज्यहि लागिया, औषध लगत न ताहि ॥
सुसुकि सुसुकि मरि मरि जियैं, उठै कराहिं कराहि ॥७२॥
साहबको विरहरूपीबाण जाकेलग्यो अर्थात् जिनको यहजानिपर्यो कि हमतें
साहबते बिछोहुद्वै गयोहै ते विरहवारनको ज्ञान योगादिक औषध नहींलगै है
बिरहबाणाग्निते तन जरै है मरिमरि जियैहै । याजो कह्यो सो बिरहाग्निते जरै
है स्थूलशरीरको जब अभिमान छूट्यो तब सूक्ष्मशरीरमें जियो, जबसूक्ष्म
शरीर छूट्यो तब कारण शरीरमें जियो, जब कारणशरीरछूट्यो तब महाकारण
शरीरमें जियो, जब महाकारण शरीर छूट्यो तब कैवल्यशरीरमें जियो, यही
मरिमरिजीबोहै । औ तहौं कराहि कराहि उठैहै कहे एकौ शरीर नहीं आछे
लगै हैं ॥ ७२ ॥
सांचा शब्द कबीरका, हृदया देखु विचार ॥
चितदै समझै मोहिं नहिं, कहत भयल युगचार ॥७३॥
साहब कहैं हैं कि साँचाशब्द जो कबीरका राम नाम ताको हृदयमें बिचा-
रिकै देखु तो तैं चित्तदैके नहीं समझै है । मोको चारोंयुग वेद शास्त्रमें कहत-
भयो । औ कबीरजे हैं तेऊ चारोंयुगमें कहतआये हैं । सत्ययुगमें
सत्यसुकृत नामते त्रेतामें मुनीन्द्रनामते । द्वापर में करुणामय ना-