कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ५४७ )
अनतही लगावैहै वेद शास्त्रका अर्थ करि काहेतें न पायो कि बांटनहारोजो ब्रह्मा
हैं सो लोभी रह्यो है कहे रजो गुणीहै सो बहुत चोराइकै कह्यो परोक्ष कह्यो जातें
कोई न पावै। औ जे जानतभये ब्रह्माको उपदेश ते गुरु जे ब्रह्माहैं तिनहूंते
अधिकह्वैगये अर्थात् गुरुगुरुही रह्यो चेला खांड ह्वैगयो अर्थात् गुरते मीठी
खांड होईहै काहेते ब्रह्माते अधिक ह्वैगये कि, ब्रह्मा गुणको धारण किये हैं औ
वे सगुण निर्गुणके परेकी बात जाने हैं ॥ ४६ ॥
मलयागिरिके बासमें, वृक्ष रहा सब गोइ ॥
कहिबेको चंदन भया, मलयागिरि ना होइ ॥ ४७ ॥
मलयागिरि चन्दनके वृक्षके बासमें सब वृक्ष गोइरहे कहे मलयागिरिकै बास
सबमें आँयगई, कछू मलयागिरि नहीं ह्वैगई । ऐसे तिनको साहबको ज्ञानभयो
तिनमें साहबको गुण आइगये शुद्धह्वै गये कछू साहब न ह्वैगयो । जो कहो
ब्रह्मातो चारिवेद छःवेदांग छःशास्त्र जे सोरठहैं तिनते सबको उपदेश कियो
ताको गुप्तार्थ और लोग काहे न समझ्यो एक साहबको जनैयै काहेते जान्यो तोने
को अर्थ दूसरी साखीमें दिखावै हैं ॥ ४७ ॥
मलया गिरिके वासमें, वेधा ढाक पलाश ॥
बेनाकबहूंन बेधिया, युगयुगरहियापास ॥ ४८ ॥
मलयागिरिके बासमें ढाक पलाश सब बेधि गये औ बेना जो है बांस सो
युगयुग मलयागिरि के पासरहै है पै वामें बास न बेधत भई ! अर्थात् और
वृक्षन भीतर सार रह्यो तेहिते बास बेधिगई ! औ बांसके भीतर सार न रह्यो
ताते बास न बेधत भई । अर्थात् और जे अज्ञानिउ रहे तिनके अन्तःकरणमें
शून्य नहीं रह्यो सो जो कोई उपदेश कियो तो साँच मानिकै समुझि लिये
औ जिनके भीतर वह शून्य ब्रह्मधोखा घुसो रह्यो ते और ऊपरते खण्डन कर-
नलगे और और अर्थ वेदशास्त्र के बनाइ लियो ते न बासि गये कहे उनको साहबको
रंग न लग्यो चारों युगमें वेदशास्त्र सब पढ़तई रहे ॥ ४८ ॥
चलते चलते पगुथका, नगर रहा नौ कोस ॥
बीचहिमें डेरा पर्यो, कहौ कौनको दोस ॥ ४९ ॥