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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 583

साखी । ( ५४१ )
हृदया भीतर आरसी, मुखतो देखि न जाय ॥
मुखतो तबहीं देखिहौं, जब दिलकी द्विविधा जाय॥२९॥
हृदय भीतर जौ आरसी है तौनेमें आपनेरूपको जो मुख सो नहीं देखों
जायहै वा बिचारकरिकै देखो जाइहै सो मुख जो तुम्हारो स्वरूप सो तबहीं
देखिहौं जब मैं मोर या द्विविधा जात रही कि, चित अचित रूप सब साहबैके
देखो गे ॥ २९ ॥
ऊँचे गाँव पहाड़ पर, औ मोटे की बाँह ॥
ऐसो ठाकुर सेइये, उवरिये जाकी छाँह ॥ ३० ॥
जोगांव ऊँचेपर होइहै तहां बूड़ाकी भयनहीं होइहै, जाके जबरेकी बांह
होइहै ताको डर नहीं होयहै ऐसे ऊँचो गांव जो साकेत, तहां साहब जे हैं
तिनकी जहां बांह है ऐसे जे साहबहैं तिनकी बाहैंकी छांहमें टिकौ जाते
उबरौ । उहां मायाके बूड़ाको डर नहीं है इहाँ मन मायादिकनमें परेहौ इनमें
कालते न बचोगे ॥ ३० ॥
ज्यहि मारग गे पण्डिता, तेही गई बहीर ॥
ऊँची घाटी रामकी, त्यहि चढ़ि रहे कबीर ॥ ३१ ॥
जौने मार्गमें राम नाम जाने बिना पण्डित गये, वही मार्ग ह्वै मूर्खो जात
भयें अर्थात् पापीपुण्यवान सबवहीयमपुरी गये । कबीर जी कहै हैं कि,
ऊँची घाटी जो रामनाम तामें आरूढ़ह्वैकै हे कायाके वीर कबीर माया के बूड़ाते
बचिजाउ ॥ ३१ ॥
हे कबीरतैं उतरि रहु, सँवल परोह न साथ ॥
सबल घटे औ पग थके, जीव विराने हाथ ॥ ३२ ॥
गुरुवालोग मोको समझायो हे कबीर ! तैं ऊँचीघाटी जो राम नाम तौनेते
उतरिरहु न तेरे संबलकहे कलेवा है न परोहनकहे बाहन साथहै । सो संबल
औ पगु जब थाकैगो तब जीव तो बिराने हाथ ह्वै जाइगो । जो हमारेपास
आवोगे तो ज्ञान योगादिक सम्बल बतावेंगे । अहंब्रह्मास्मि बाहनदेंगे तामें
आरूढ़ह्वैकै संसारसमुद्र पार ह्वै जाइगो ॥ ३२ ॥