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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 582, कुल 766 में से

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पृष्ठ 582

( ५४० ) बीजक कबीरदास ।
मकार है। सो जरदबुन्द कहे जरद रज स्त्रीको और बुन्द वीर्य्य पुरुषको ये दुन-
हुनके संयोगते शरीररूप कुकुही जीवके लागि गई । जैसे खेतनमें कुकुही लगि
जाइ है सो कबीरजी कहै हैं कि, याको भीतर विचार करि देखो तो यहि जीव
को स्वरूप जानि परै । कुकुही छुड़ाइबो जैसे कुकुहीते अन्ननाश है जाइ है
ऐसे याहु शरीररूप कुकुही जीवके लगी है सो एकही शुद्धता को नाश कै
देइ है ॥ २५ ॥
पांच तत्त्व लै या तन कीन्हा, सो तन लै कह कीन्ह ।
कर्महिके वश जीव कहतहै, कर्महिको जिय दीन्ह २६
या पांच तत्त्वनको लैके या शरीर कियो सो या शरीर लैके तैं कौन काम
कीन्ह्यो, कर्मके बश हैकै मेरो अंश जो जीव सो कर्महि को देत भयो । मेरो
हैकै अर्थात् कर्मके बश हैकै संसारी भो जीव सो कौन बड़ो काम कियो जीव
कहवावन लग्यो ॥ २६ ॥
पांच तत्त्वके भीतरे गुप्त वस्तु अस्थान ॥
विरल मर्म कोइ पाइहै, गुरुके शब्द प्रमान ॥ २७ ॥
पांच तत्त्वको जो या शरीर ताके भीतर जो गुप्तवस्तु जीवात्मा है ताको
स्थान है ताको मर्म कोई बिरला पावै है कि, यह नित्य कौनको है यामें गुरु
जे साहब हैं तिनका शब्द जो रामनाम सोई प्रमाण है । तौनेको अर्थ विचार
करै तौ या जानि लेहि कि जीव साहेबको है ॥ २७ ॥
अशुनत खत अड़ि आसनै, पिण्ड झरोखे नूर ॥
ताके दिलमें हौं बसौं, सैना लिये हजूर ॥ २८ ॥
अशुन कहे शून्य नहीं वा निराकारके परे अशून्य जो साहबको तख्त आडिकै
तामैं आसन कैकै अर्थात् ध्यानमें रत पिण्ड जो है शरीर ताके झरोखा जे हैं
नेत्र तिनते साहबको जो कोई नूरदेखै कि, सब साहिबैको प्रकाश पूर्ण है सर्वत्र
ताके दिलमें आपने परिकरते सहित बसौहौं ॥ २८ ॥