कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी । ( ५३५ )
इहई कहै यहीं संसारमें सम्बल कहे कलेवा सम्पन्न करिले आगें ।
विषमी बाट कहे कठिन दुखदाई बाटको, सो श्री कबीरजी कहै हैं कि,
आगे न जाने कौनी योनि में परैगो और वहाँ कछु किये होइगो कि नहीं ।
अथवा जो या कहो कि, स्वर्गमें विसाहन करि लेउँगे अर्थात् सौदा करि-
लेउँगे अर्थात् वहँ साहबको जानन वारो कर्म करिलेउँगे । तो वहां न बनियां
है न हाट है अर्थात् वह तो भोगभूमि है कर्म भूमि नहीं है स्वर्ग के शरीर
से केवल मृत्यु लोकमें किये कर्मनको भोग होइहै कर्म करिवे को स्थानतो या
मनुष्य शरीर औरे या मृत्यु लोकही है । ताते श्री कबीरजी कहै है हे जीवो !
यहांहीं सुकर्म करि लेउ ॥ ९ ॥
जो जानौ जिव आपना, तो करहु जीवको सार ।
जियरा ऐसा पाहुना, मिलै न दूजी वार ॥ १० ॥
हे जीवो! जो अपने स्वरूप को जानो तो जीव का सार जो सार शब्द
तामें रकारके समीप मकार अपने स्वरूपको करौ अर्थात् साहबको जानि साहबको
होउ । सो हे जीवो ! रा अर्थात् रामनाम ऐसो पाहुना दूजी बार ना मिलैगो । भाव
यह है कि, याही मनुष्य शरीर में मिलैगो और कहीं ना मिलैगो ॥ १० ॥
जो जानहु पिव आपना, तो जानौ सो जीव ।
पानिपचावहु आपना, पानी मांगि न पीव ॥ ११ ॥
जो आपनां पीव जे साहब हैं तिनको जानौ तो हम तुमको जानें कि, तुम
जीव हौ । पानिप जो शोभा सो जो अपनी शोभा ( प्रतिष्ठा ) चाहो तौ
पानी जे गुरुवा लोगोंकी नाना वाणी है तिनको मांगिके ना पिउ अर्थात् गुरुवन
ते अपने साहबको ज्ञान मत लेउ वे तो ठग हैं तुझे ठग लेउँगे ॥ ११ ॥
पानि पियावत क्या फिरो, घर घर सायर बारि ।
तृषावन्त जो होयगा, पीवेगा झख मारि ॥ १२ ॥
साहब कहैं हैं श्रीकबीरजीसे । हे कबीर ! मेरो उपदेश रूप पानी जीवन
को पियावत घर घर का ( क्या ) फिरो हौ । सबके समुद्र भरो है अर्थात्